खामोशियों का पुल

सिद्धार्थ और अनन्या की शादी को सात साल बीत चुके थे। जो भी उन्हें बाहर से देखता, यही कहता कि वे एक-दूसरे के लिए ही बने हैं। सिद्धार्थ एक मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट था और अनन्या एक स्वतंत्र लेखिका। उनका घर शहर के सबसे पॉश इलाके में था। घर में सुख-सुविधा की हर चीज़ … Read more

वो छाँव जो कभी बोझ नहीं बनी: एक पोते का समर्पण

शहर के उस शांत और एकांत श्मशान घाट पर आज आसमान भी जैसे मातम मना रहा था। हल्की-हल्की बूंदाबांदी हो रही थी और हवा में एक अजीब सी उदासी घुली हुई थी। श्मशान के बीचों-बीच जलती हुई चिता की लपटें बारिश की बूंदों से संघर्ष कर रही थीं। चिता के ठीक सामने पच्चीस साल का … Read more

मुस्कुराहट के पीछे छिपे आँसू: एक बेटी की विदाई

बचपन से ही हर लड़की की तरह मैंने भी अपनी शादी को लेकर न जाने कितने ही सपने संजोए थे। लाल जोड़ा, हाथों में रची गहरी मेहंदी, ढोल-नगाड़ों की थाप और एक ऐसा राजकुमार जो मुझे ब्याह कर ले जाएगा। लेकिन इन तमाम खुशनुमा सपनों के बीच एक डरावना सच भी हमेशा मेरे जहन में … Read more

वो धड़कन जो मेरी नहीं थी

पुणे शहर की भागदौड़ भरी जिंदगी में मीरा का जीवन एक सीधी रेखा की तरह चल रहा था। एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर काम करने वाली मीरा अपने काम से काम रखने वाली लड़की थी। तीन साल पहले हुई एक गंभीर हार्ट सर्जरी के बाद उसने अपनी जिंदगी को एक … Read more

नियति का खेल और वो बंद दरवाज़ा

रमाकांत जी के घर में इन दिनों उत्सव का माहौल था। उनके इकलौते बेटे सुमित की शादी तय हो गई थी और पूरे घर में रौनक छाई हुई थी। रमाकांत जी की पत्नी, सरला देवी की तबीयत अक्सर खराब रहती थी, इसलिए घर और शादी की सारी ज़िम्मेदारी उनकी बेटी काव्या के कंधों पर आ … Read more

शीशे के रिश्ते और पत्थर का गुरूर

ट्रेन की खिड़की के बाहर भागते हुए पेड़ और बारिश की हल्की फुहारें एक अजीब सा सुकून दे रही थीं। मैं अपनी सीट पर बैठी एक पत्रिका के पन्ने पलट रही थी, जिसमें आधुनिक युग में टूटते पारिवारिक ढांचों पर एक गंभीर लेख छपा था। डब्बे में ज़्यादा भीड़ नहीं थी। मेरे ठीक सामने वाली … Read more

*कुछ बंधन तोड़ देना ही अच्छा होता है* – तोषिका

आपने ऐसा क्यों किया मां? मीरा ने अपनी मां से पूछा। तभी उसकी मां रमा ने बोला “*कुछ बंधन तोड़ देना ही अच्छा होता है* क्योंकि कई बार आत्मसम्मान से ऊपर कुछ नहीं होता है।” “ऐसा क्या हुआ था मां की आपने पापा को छोड़ दिया?” मीरा ने हैरानी में पूछा। रमा का उन पुरानी … Read more

बंधन – खुशी

मीरा एक सुखी परिवार से थी।सुखी परिवार की परिभाषा का अर्थ था जिसमें हर कोई एक दूसरे को वक्त दे जो एक दूसरे का दर्द समझे ।जहां मां के आवाज लगाते ही सब एक जगह इक्कठा हो जाते और खाना खातें गप्पे मारते दिन भर की बातें साझा करते।पापा शाम को ऑफिस से आते तो … Read more

स्वाभिमान की उड़ान

शहर के जाने-माने कपड़ा व्यापारी रघुनाथ जी की जिंदगी में सब कुछ बहुत ही सुचारू रूप से चल रहा था। उनका साड़ियों का थोक व्यापार था, जिसे उन्होंने अपनी बरसों की कड़ी मेहनत और ईमानदारी से सींचा था। उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा गुरूर और उनकी सबसे बड़ी खुशी उनकी इकलौती बेटी, काव्या थी। काव्या … Read more

रिश्तों की एकतरफ़ा पगडंडी और एक करारा जवाब

सुमित्रा स्वभाव से बहुत ही शांत, सुलझी हुई और दूसरों का खयाल रखने वाली महिला थी। उसके पति, सुधीर, एक सरकारी बैंक में मैनेजर थे। उनका परिवार एक बहुत ही सुंदर और शांत हाउसिंग सोसाइटी में रहता था। उसी सोसाइटी के एक दूसरे ब्लॉक में सुधीर के छोटे भाई का परिवार रहता था। सुधीर के … Read more

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