खामोशियों का पुल

सिद्धार्थ और अनन्या की शादी को सात साल बीत चुके थे। जो भी उन्हें बाहर से देखता, यही कहता कि वे एक-दूसरे के लिए ही बने हैं। सिद्धार्थ एक मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट था और अनन्या एक स्वतंत्र लेखिका। उनका घर शहर के सबसे पॉश इलाके में था। घर में सुख-सुविधा की हर चीज़ मौजूद थी। दोनों सुबह उठते, साथ में बालकनी में बैठकर कॉफी पीते, दिन भर के कामों की एक-दूसरे को जानकारी देते और फिर अपने-अपने कामों में उलझ जाते। रात को डाइनिंग टेबल पर साथ खाना खाते। उनके बीच कभी कोई तेज आवाज में बहस नहीं हुई थी। कभी किसी ने दूसरे पर कोई बंदिश नहीं लगाई थी। उनकी जिंदगी एक शांत नदी की तरह बह रही थी, जिसमें कोई लहर नहीं थी, कोई तूफान नहीं था। लेकिन शायद उस नदी का पानी अब ठहर सा गया था।

ठहरे हुए पानी में और शांति में बहुत बारीक सा फर्क होता है। शांति सुकून देती है, जबकि ठहराव धीरे-धीरे काई जमने का कारण बन जाता है। सिद्धार्थ को लगता था कि उसने अपनी पत्नी को वह सब कुछ दे दिया है जो एक खुशहाल जीवन के लिए जरूरी है। सुरक्षा, सम्मान, स्वतंत्रता और पैसा। वह अपनी जगह बिल्कुल सही था। लेकिन वह यह भूल गया था कि प्रेम कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे एक बार तिजोरी में रखकर निश्चिंत हो जाया जाए। प्रेम एक पौधा है, जिसे हर दिन संवाद के पानी की जरूरत होती है।

एक दिन अनन्या एक साहित्यिक समारोह में गई। वहां उसकी मुलाकात कबीर से हुई। कबीर उसका कॉलेज के दिनों का दोस्त था। दोनों लगभग दस साल बाद मिल रहे थे। कबीर एक घुमक्कड़ फोटोग्राफर बन चुका था। उसकी आंखों में वही पुरानी चमक थी और बातों में वही बेफिक्री।

पहले दिन जब वे मिले, तो सिर्फ पुरानी यादें ताजा हुईं। कॉलेज की कैंटीन, पुराने प्रोफेसर, और दोस्तों की बातें। एक घंटे की मुलाकात के बाद दोनों अपने-अपने रास्तों पर लौट गए। लेकिन जाते-जाते कबीर ने उसका नंबर ले लिया था।

अगले कुछ दिनों तक कुछ नहीं हुआ। फिर एक शाम कबीर का मैसेज आया, “कैसी हो?”

अनन्या ने औपचारिक सा जवाब दिया, “बिल्कुल ठीक। तुम बताओ?”

कुछ मिनटों बाद कबीर का जवाब आया, “मैं यह नहीं पूछ रहा कि दुनिया की नजर में तुम कैसी हो। मैं पूछ रहा हूं कि तुम भीतर से कैसी हो? क्या तुम सच में खुश हो?”

अनन्या फोन की स्क्रीन को देखती रह गई। यह बहुत ही साधारण सा सवाल था, लेकिन पिछले कई सालों में किसी ने उससे यह नहीं पूछा था। सिद्धार्थ अक्सर पूछता था, “आज खाने में क्या है?” या “तुम्हारी नई किताब का काम कैसा चल रहा है?” लेकिन उसने कभी यह नहीं पूछा था कि वह भीतर से कैसा महसूस कर रही है।

उस रात अनन्या ने कबीर को कोई जवाब नहीं दिया। लेकिन वह ‘खुश हो?’ वाला सवाल उसके दिमाग में गूंजता रहा।

कुछ दिनों बाद दोनों की एक कॉफी शॉप में मुलाकात हुई। अनन्या ने कबीर को अपनी जिंदगी के बारे में बताया। उसने बताया कि कैसे सब कुछ कितना ‘परफेक्ट’ है। कोई कमी नहीं है। पति बहुत अच्छा है, घर बहुत सुंदर है।

कबीर उसे सुनता रहा। फिर अपनी कॉफी का सिप लेते हुए बोला, “तुम्हारी बातें सुनकर ऐसा लग रहा है जैसे तुम किसी और की जिंदगी की कहानी सुना रही हो, जिसमें सब कुछ परफेक्ट है, लेकिन उस कहानी में तुम खुद कहीं नहीं हो। तुम्हारी आंखों में वो पुरानी वाली आग नहीं है अनन्या।”

अनन्या को अचानक लगा जैसे किसी ने उसके सीने पर रखा एक भारी पत्थर हटा दिया हो। वह इंसान जिसे वह अपना जीवनसाथी मानती थी, वह उसकी खामोशी को उसकी संतुष्टि समझ बैठा था। और एक इंसान जो दस साल बाद मिला था, उसने उसकी आंखों की उदासी को एक पल में पढ़ लिया था।

यहां से एक नया सिलसिला शुरू हुआ। दोनों के बीच बातें बढ़ने लगीं। कभी मैसेज पर, कभी फोन पर।

एक दिन अनन्या की तबीयत बहुत खराब हो गई। उसे तेज बुखार था और शरीर दर्द से टूट रहा था। सिद्धार्थ सुबह ऑफिस जाने के लिए तैयार हो रहा था। उसने अनन्या के माथे पर हाथ रखा, डॉक्टर को फोन करके अपॉइंटमेंट फिक्स किया, टेबल पर दवाइयां और पानी रखा और कहा, “आराम करो, मैं शाम को जल्दी आने की कोशिश करूंगा।”

सिद्धार्थ ने एक जिम्मेदार पति का हर फर्ज निभाया था। उसमें कोई कमी नहीं थी। लेकिन जब सिद्धार्थ चला गया, तो बिस्तर पर लेटी अनन्या ने अपना फोन उठाया और कबीर को मैसेज किया, “आज बहुत अजीब सी उदासी और कमजोरी लग रही है। बुखार भी है।”

कबीर ने तुरंत कॉल किया। उसने कोई दवा नहीं बताई, कोई डॉक्टर का नंबर नहीं दिया। उसने बस इतना कहा, “मैं फोन लाइन पर हूं। तुम फोन स्पीकर पर रख कर आंखें बंद कर लो। मैं तुम्हें तुम्हारी पसंदीदा किताब की कुछ कविताएं पढ़कर सुनाता हूं। तुम्हें अच्छा लगेगा।”

आधे घंटे तक कबीर कविताएं पढ़ता रहा और अनन्या आंखें बंद किए सुनती रही। बुखार उसके शरीर में था, लेकिन उस दिन उसे अहसास हुआ कि दवा की जरूरत उसके मन को थी। कबीर ने कोई मर्यादा नहीं लांघी थी। उनके बीच कोई शारीरिक आकर्षण नहीं था। न कोई वादे थे, न साथ जीने-मरने की कसमें। लेकिन फिर भी, अनन्या के भीतर कुछ बहुत गहराई में टूट रहा था और कुछ नया बन रहा था।

जब आप अपनी हर छोटी-बड़ी खुशी, अपना हर छोटा-बड़ा दुख, अपने घर के उस इंसान के बजाय किसी और को बताने लगते हैं, तो समझ लीजिए कि आपके रिश्ते की इमारत दरकने लगी है। शरीर की बेवफाई को पकड़ना आसान है, क्योंकि उसके सबूत होते हैं। लेकिन मन की बेवफाई कोई सबूत नहीं छोड़ती। वह बस एक खालीपन छोड़ जाती है।

सिद्धार्थ बहुत प्रैक्टिकल इंसान जरूर था, लेकिन वह बेवकूफ नहीं था। उसने महसूस किया कि अनन्या बदल गई है। वह अब उससे छोटी-छोटी बातों पर शिकायत नहीं करती थी। वह अब इस बात पर नहीं चिढ़ती थी कि सिद्धार्थ वीकेंड पर भी काम कर रहा है। वह अब अपनी किताब की कहानियां सिद्धार्थ को नहीं सुनाती थी। वह खुश रहने लगी थी, लेकिन उसकी खुशी का स्रोत सिद्धार्थ नहीं था।

एक रात जब दोनों बालकनी में बैठे थे, हवा में एक अजीब सी खामोशी थी।

सिद्धार्थ ने अचानक पूछा, “क्या हमारी जिंदगी में कोई और आ गया है?”

अनन्या ने चौंक कर उसकी तरफ देखा। “तुम्हारा मतलब क्या है?”

“मेरा मतलब कबीर से है। मैंने देखा है कि तुम आजकल फोन पर बहुत मुस्कुराती हो। तुम अब मुझसे बात करने का इंतजार नहीं करती।”

अनन्या ने गहरी सांस ली और कहा, “ऐसा कुछ नहीं है सिद्धार्थ। वह सिर्फ एक पुराना दोस्त है। हमारे बीच वैसा कुछ भी नहीं है जैसा तुम सोच रहे हो। न उसने कभी मुझे छुआ है, न हमने कभी ऐसी कोई बात की है।”

सिद्धार्थ कुछ देर शांत रहा। फिर एक बहुत ही गहरी और चुभने वाली बात कही, “तो फिर मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि मैंने तुम्हें खो दिया है? अगर तुम उससे प्रेम नहीं करती, अगर तुम्हारे बीच कुछ हुआ नहीं है, तो मुझे इतनी घबराहट क्यों हो रही है?”

अनन्या की पलकें झुक गईं।

सिद्धार्थ ने आगे कहा, “शायद इसलिए, क्योंकि तुमने उसे अपना वह हिस्सा दे दिया है, जो कभी सिर्फ मेरा हुआ करता था। तुमने उसे अपनी बातें दे दी हैं। तुमने उसे अपना इंतजार दे दिया है। तुमने अपनी वह हंसी उसे दे दी है, जो मेरे एक जोक पर तुम्हारे चेहरे पर आती थी। तुमने अपने दुख उसे सौंप दिए हैं। शरीर का क्या है अनन्या, वह तो एक जगह बंधा रह सकता है। लेकिन तुमने उसे अपना मन दे दिया है।”

अनन्या के पास कोई जवाब नहीं था। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। उसने रोते हुए कहा, “क्योंकि तुम सुनते नहीं थे सिद्धार्थ! तुम हमेशा समस्याओं का समाधान खोजते थे। मुझे समाधान नहीं चाहिए था, मुझे बस कोई ऐसा चाहिए था जो मुझे सुने। जो यह देखे कि मैं क्या महसूस कर रही हूं। इस घर की दीवारों में मैं घुटने लगी थी।”

सिद्धार्थ ने बहुत ही धीमी आवाज में कहा, “तो तुमने मुझसे शिकायत क्यों नहीं की? तुमने मुझसे लड़ना क्यों बंद कर दिया? अगर मैं नहीं सुन रहा था, तो तुम्हें मुझे झकझोर कर सुनाना चाहिए था। तुमने एक आसान रास्ता चुना। तुमने एक नया इंसान ढूंढ लिया।”

यह बात पत्थर की लकीर की तरह सच्ची है। हम अक्सर उस तीसरे इंसान को खलनायक मान लेते हैं जो किसी रिश्ते में आता है। लेकिन सच तो यह है कि वह तीसरा इंसान कभी जबरदस्ती आपके रिश्ते में नहीं घुसता। वह उसी दरवाजे से अंदर आता है, जिसे घर के दो लोगों में से किसी एक ने खुला छोड़ दिया होता है। वह तीसरा व्यक्ति दरअसल कोई इंसान होता ही नहीं है, वह आपका अपना अकेलापन होता है। वह अनकही बातों का शोर होता है।

उस रात के बाद अनन्या कई रातों तक सो नहीं सकी। सिद्धार्थ के कहे शब्द उसके कानों में गूंजते रहे। उसने खुद से सवाल किया, क्या वह सही कर रही है? क्या कबीर से बात करने से उसकी शादी की समस्याएं खत्म हो गई हैं? नहीं। समस्याओं पर बस एक पर्दा पड़ गया था।

रिश्ते तब नहीं टूटते जब दो लोग एक-दूसरे पर गुस्सा करते हैं। रिश्ते तब टूटते हैं जब वे एक-दूसरे से उम्मीद करना छोड़ देते हैं। अनन्या ने सिद्धार्थ से उम्मीद करना छोड़ दिया था और वह उम्मीद कबीर से लगा ली थी।

अगले दिन अनन्या ने कबीर को फोन किया।

“कबीर, मुझे लगता है हमें अब बात नहीं करनी चाहिए,” अनन्या ने सीधी बात की।

कबीर उस तरफ कुछ पल शांत रहा। फिर पूछा, “क्या सिद्धार्थ को हमारे बारे में पता चल गया है? लेकिन हमने तो कोई गलत काम नहीं किया अनन्या।”

“गलत काम की परिभाषा सिर्फ जिस्मानी नहीं होती कबीर,” अनन्या ने कहा। “मैं खुद से झूठ बोल रही थी। मैं अपने ही घर में, अपने ही पति से एक ऐसा सच छिपा रही थी जो दरअसल मेरी आत्मा का सच था। मुझे डर लगने लगा है क्योंकि मेरी सुबह अब सिद्धार्थ की आवाज से नहीं, तुम्हारे मैसेज से होती है। मैं अपनी शादी से भाग रही थी, और तुमने अनजाने में ही सही, मुझे वह भागने का रास्ता दे दिया था। जब तक मन पूरी तरह से भटक न जाए, मुझे वापस लौट जाना चाहिए।”

कबीर एक समझदार इंसान था। वह मुस्कुराया और बोला, “अगर तुम्हें लगता है कि तुम्हारे लौटने से तुम्हारा रिश्ता बच सकता है, तो तुम्हें जरूर लौटना चाहिए। अपना ख्याल रखना अनन्या।”

फोन काटने के बाद अनन्या ने अपने फोन से कबीर का नंबर हमेशा के लिए डिलीट कर दिया। उसे ऐसा लगा जैसे कोई बहुत बड़ा बोझ उसके सीने से उतर गया हो। वह कमरे से बाहर आई।

सिद्धार्थ डाइनिंग टेबल पर बैठा अपने लैपटॉप में कुछ काम कर रहा था। उसके चेहरे पर एक अजीब सी उदासी और थकान थी।

अनन्या ने जाकर लैपटॉप की स्क्रीन बंद कर दी। सिद्धार्थ ने हैरानी से ऊपर देखा।

अनन्या ने उसके सामने वाली कुर्सी खींची, उस पर बैठी, सिद्धार्थ के दोनों हाथ अपने हाथों में लिए और कहा, “मुझे तुमसे बात करनी है। मुझे तुम्हें बताना है कि मुझे कैसा महसूस होता है। मुझे तुम्हें बताना है कि मुझे तुम्हारा वक्त चाहिए। और इस बार मैं तब तक बोलूंगी जब तक तुम पूरी तरह से सुन नहीं लेते।”

सिद्धार्थ की आंखों में एक चमक लौट आई। उसने अनन्य के हाथों को कसकर पकड़ लिया और कहा, “मैं सुन रहा हूं। आज सिर्फ तुम बोलोगी।”

प्रेम की असल परीक्षा यह नहीं है कि आपको कोई दूसरा आकर्षक, समझदार या बेहतर इंसान ना मिले। इस बड़ी सी दुनिया में आपको हमेशा कोई न कोई ऐसा मिल जाएगा जो आपके पार्टनर से ज्यादा आपको समझता हो, जो ज्यादा बेहतर तरीके से बात करता हो। लेकिन प्रेम यह है कि उस बेहतर इंसान के मिलने के बावजूद, आप वापस अपने उसी पुराने, अपूर्ण रिश्ते की तरफ लौटें और उसे संवारने की कोशिश करें।

अगर आपके रिश्ते में भी संवाद खत्म हो गया है, तो उसे दोबारा जिंदा कीजिए। अगर आप अपने पार्टनर से दूर महसूस कर रहे हैं, तो किसी तीसरे को अपनी कहानी का हिस्सा बनाने से पहले, अपने पार्टनर से लड़िए, झगड़िए, लेकिन बात कीजिए। क्योंकि जब बात होना बंद हो जाती है, तो दिल अपनी बात कहने के लिए नए ठिकाने ढूंढने लगता है। और मन का पता बदल जाना, किसी भी रिश्ते की सबसे दर्दनाक मौत होती है।

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