बचपन से ही हर लड़की की तरह मैंने भी अपनी शादी को लेकर न जाने कितने ही सपने संजोए थे। लाल जोड़ा, हाथों में रची गहरी मेहंदी, ढोल-नगाड़ों की थाप और एक ऐसा राजकुमार जो मुझे ब्याह कर ले जाएगा। लेकिन इन तमाम खुशनुमा सपनों के बीच एक डरावना सच भी हमेशा मेरे जहन में घूमता रहता था—मेरी विदाई। मैं, अंजलि, अपने घर की लाड़ली थी। पापा की परी, माँ की परछाई और अपने छोटे भाई कबीर की इकलौती दुश्मन कम और दोस्त ज्यादा।
जब मेरी शादी तय हुई, तो घर में खुशी का माहौल था। मेरे होने वाले पति, विक्रम, एक बहुत ही सुलझे हुए और अच्छे इंसान थे। सब कुछ एकदम परफेक्ट था, लेकिन जैसे-जैसे शादी की तारीख करीब आ रही थी, मेरे अंदर एक अजीब सी घबराहट बढ़ती जा रही थी। मैं अक्सर रात को अपने कमरे की छत को घूरती रहती और सोचती कि जिस घर में मैंने अपने जीवन के पच्चीस साल बिताए हैं, उसे मैं हमेशा के लिए कैसे छोड़ दूंगी?
शादी की तैयारियों में पूरा घर व्यस्त था। कभी गहनों की खरीदारी, कभी कपड़ों की फिटिंग, तो कभी मेहमानों की लिस्ट। दिन तो ऐसे पंख लगाकर उड़ रहे थे कि पता ही नहीं चलता था कब सुबह से रात हो गई। लेकिन हर रात जब मैं बिस्तर पर लेटती, तो मेरी आँखें भर आतीं। मुझे लगता कि काश ये वक्त यहीं रुक जाए, काश शादी के ये दिन थोड़े और लंबे हो जाएं।
एक दिन ऐसे ही मैं अपनी माँ के साथ बाज़ार से लौट रही थी, तो मोहल्ले की एक बुज़ुर्ग आंटी ने मुझे रोक लिया और बड़े ही भावुक स्वर में बोलीं, “अरे अंजलि बेटा, अब तो कुछ ही दिन रह गए हैं तेरे इस घर में। तेरे जाने के बाद तेरे माँ-बाप का क्या हाल होगा, ये सोचकर ही मुझे रोना आ रहा है।” उनकी इस बात ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया। अब तक मैं सिर्फ अपने बिछड़ने के दुख में डूबी थी, लेकिन मैंने ये तो सोचा ही नहीं था कि मेरे जाने के बाद मेरे घरवालों का क्या होगा।
उसी शाम मैंने तय किया कि मैं सबसे पूछूंगी कि वो मुझे कितना याद करेंगे। मैं घर पहुँची और बिना कपड़े बदले सीधे डाइनिंग टेबल पर जा बैठी जहाँ पापा, माँ और कबीर चाय पी रहे थे। मैंने बहुत ही गंभीर चेहरा बनाकर पूछा, “आप लोगों ने सोचा है कि मेरे जाने के बाद आप सबका क्या होगा? आप लोग मुझे कितना मिस करेंगे?” मुझे उम्मीद थी कि मेरा सवाल सुनते ही माँ की आँखें छलक उठेंगी, पापा भावुक होकर मुझे गले लगा लेंगे और कबीर भी थोड़ा उदास हो जाएगा। लेकिन वहाँ जो हुआ, उसने मेरे होश उड़ा दिए।
कबीर ने अपना चाय का कप रखा और जोर से हँसते हुए बोला, “अरे दीदी, मिस क्या करना है? आजकल तो वीडियो कॉल का ज़माना है। जब मन करेगा, स्क्रीन पर तुम्हारा चेहरा देख लेंगे। वैसे भी तुम्हारे जाने से मेरा कमरा मुझे पूरी तरह से मिल जाएगा, मैं तो उसी की प्लानिंग कर रहा हूँ।” पापा ने भी कबीर की बात में हामी भरते हुए कहा, “बिल्कुल सही कह रहा है कबीर। रोने-धोने का क्या मतलब है? खुशी-खुशी जा रही हो, हम भी खुश रहेंगे।” माँ तो जैसे एक कदम और आगे निकल गईं, “अरे मुझे तो इस बात की खुशी है कि अब मुझे सुबह-सुबह उठकर तुम्हें उठाने के लिए चिल्लाना नहीं पड़ेगा।”
उनका ये जवाब सुनकर मैं सन्न रह गई। मेरे गले में जैसे कुछ अटक गया था। मैंने सोचा था कि मेरी बात सुनकर सब इमोशनल हो जाएंगे, लेकिन यहाँ तो भावुकता का दूर-दूर तक कोई नामोनिशान नहीं था। मुझे अंदर ही अंदर गुस्सा आने लगा। मैंने सोचा कि अगर ये लोग विदाई के वक्त भी ऐसे ही हँसते-खिलखिलाते रहे, तो मेरे ससुराल वालों के सामने मेरी क्या इज्जत रह जाएगी? लोग क्या सोचेंगे कि इस लड़की से इसके घरवाले इतना परेशान थे कि इसके जाने पर खुशियाँ मना रहे हैं? मैंने अपनी इज्जत बचाने के लिए एक बार फिर पैंतरा बदला और साफ-साफ पूछ लिया, “देखिए, मुझे नहीं पता, पर विदाई के वक्त आप सबको रोना पड़ेगा। अगर आप लोग नहीं रोए, तो मेरी बहुत बेइज्जती होगी।”
इस पर तीनों एक साथ हँस पड़े। पापा ने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “अरे पागल लड़की, विदाई कोई मातम का वक्त थोड़ी है जो हम रोएं? तू अपनी नई ज़िंदगी शुरू करने जा रही है, हम तुझे रोते हुए कैसे विदा कर सकते हैं?” उनके इस जवाब ने मुझे पूरी तरह से तोड़ दिया। मुझे यकीन हो गया कि मेरे घरवालों ने सबके सामने मेरा मज़ाक बनवाने की पूरी कसम खा ली है। मैंने भी मन ही मन ठान लिया कि चाहे जो हो जाए, मैं इनसे विदाई में दो बूँद आँसू तो निकलवा कर ही रहूंगी। मैंने अगले कुछ दिनों तक घर में खूब ड्रामा किया। कभी इमोशनल गाने चलाकर बैठ जाती, कभी पुरानी एल्बम खोलकर भावुक बातें करने लगती। लेकिन मेरे घरवाले भी जैसे पत्थर के बने हुए थे। उन पर मेरे किसी भी इमोशनल ब्लैकमेल का कोई असर नहीं हुआ।
आखिरकार वो दिन आ ही गया जिसका मुझे बेसब्री से इंतज़ार भी था और डर भी। शादी की रस्में बहुत अच्छे से पूरी हुईं। फेरे हो गए, सिंदूर दान हो गया और अब वक्त था मेरी विदाई का। मेरा दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। मेरी आँखें आंसुओं से भरी हुई थीं। मुझे लग रहा था कि अब तो पक्का मेरे घरवालों का सब्र टूट जाएगा और वो फूट-फूट कर रोने लगेंगे। मैं अपनी माँ के गले लगी। मुझे लगा कि अब वो रोएंगी, लेकिन तभी कबीर पीछे से आया और बोला, “मम्मी, जल्दी करो, जीजा जी बाहर कार में इंतज़ार कर रहे हैं। ज़्यादा टाइम मत लगाओ।” मैंने कबीर को घूर कर देखा और गुस्से में कहा, “तुझे क्या परेशानी है? विदाई है मेरी, मुझे अपनी माँ से ठीक से मिल तो लेने दे। देख नहीं रहा माँ की आँखें भर आई हैं?” इस पर कबीर ने बहुत ही फिल्मी अंदाज़ में कहा, “दीदी, तुम तो हमेशा यही चाहती थी न कि माँ रोए, पर मैं वो बेटा हूँ जो अपनी माँ की आँखों में कभी आँसू नहीं देख सकता।”
उस वक्त मुझे कबीर पर इतना गुस्सा आया कि मन किया उसकी अच्छी खासी पिटाई कर दूँ। मेरी विदाई हो रही है और ये लड़का यहाँ भी डायलॉगबाज़ी कर रहा है! मैं पापा के गले लगी, तो पापा ने बहुत ही चौड़ी मुस्कान के साथ मुझे विक्रम को सौंपते हुए कहा, “बेटा विक्रम, आज से ये तुम्हारी ज़िम्मेदारी है। अगर कभी ज़्यादा परेशान करे, तो हमें मत बताना, खुद ही हैंडल करना।” ये सुनकर विक्रम भी ज़ोर से हँस पड़े। मैंने चारों तरफ देखा, बुआ, मौसी, चाचा-चाची—सबके चेहरों पर एक अजीब सी खुशी और मुस्कुराहट थी। कोई भी नहीं रो रहा था। मैं अपनी नम आँखों से सबको इशारे कर रही थी कि कम से कम दिखावे के लिए ही सही, थोड़ा रो लो। लेकिन मेरी मिन्नतों का उन पर कोई असर नहीं हुआ। उल्टे वो लोग मुझे रोता देखकर और मुस्कुरा रहे थे।
मेरा दुख अब मायके से बिछड़ने का नहीं, बल्कि इस बात का था कि मेरे जाने का किसी को कोई अफसोस ही नहीं है। गाड़ी में बैठते ही कबीर ने ऐसे हाथ हिलाकर बाय किया जैसे मैं कोई बहुत बड़ी मुसीबत थी जो हमेशा के लिए घर से जा रही हो। गाड़ी आगे बढ़ी और मैंने देखा कि विक्रम मुझे देखकर मुस्कुरा रहे थे। शायद वो मेरे घरवालों का रवैया देखकर सब समझ गए थे। उनका इस तरह मुस्कुराना मेरे जले पर नमक छिड़कने जैसा था।
ससुराल पहुँचते ही वही हुआ जिसका मुझे सबसे ज़्यादा डर था। गृहप्रवेश की रस्म के दौरान विक्रम की एक दूर की बुआ ने मेरी सास से फुसफुसाते हुए कहा, “अरे बहन जी, लड़की के घरवाले तो बड़े ही पत्थर दिल निकले। एक भी बूँद आँसू नहीं बहाया किसी ने। ऐसा लग रहा था जैसे बोझ हल्का हो गया हो उनका।” मेरी सास ने भी हामी भरते हुए कुछ कहा जो मुझे सुनाई नहीं दिया, लेकिन उनका अंदाज़ चुभने वाला था। मेरी जेठानी ने तो सीधे मुझसे ही पूछ लिया, “क्या बात है अंजलि, तुम्हारी विदाई में तो कोई रोया ही नहीं? हमारे यहाँ तो जब मेरी विदाई हुई थी, तो पूरा मोहल्ला रो पड़ा था।” मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे मुंह पर तमाचा मार दिया हो। जब अपने ही खोटे हों, तो गैरों से क्या शिकायत करना।
विक्रम ने भी मुझे चिढ़ाना शुरू कर दिया। जब भी हम अकेले होते, वो मज़ाक में कहते, “तुम्हारे घरवालों को देखकर तो लगता है कि उन्होंने कोई बहुत बड़ी जंग जीत ली हो तुम्हें विदा करके। सच में बहुत खुश थे वो लोग।” उनकी इन बातों से मेरा गुस्सा रोज़-रोज़ बढ़ता जा रहा था। एक दिन तो मेरे सब्र का बांध टूट ही गया और मैंने विक्रम पर भड़ास निकालते हुए कह दिया, “हाँ, थी मैं मुसीबत उनके लिए। खुश हैं वो लोग मुझे विदा करके। पर अब ये मुसीबत आपके गले पड़ गई है और आपके पास तो मुझे विदा करने का कोई मौका भी नहीं है। अब आप अपनी ज़िंदगी भर की परेशानी के बारे में सोचिए!” मेरी बात सुनकर विक्रम ज़ोर से हँस पड़े और मुझे गले लगा लिया, लेकिन मेरे दिल की चुभन कम नहीं हुई।
इस बात को लगभग दो महीने बीत चुके थे। इन दो महीनों में ऐसा कोई दिन नहीं गया जब मायके से फोन न आया हो। पापा, माँ, कबीर—सब बारी-बारी से रोज़ मुझसे घंटों वीडियो कॉल पर बात करते। मैं बात तो करती, लेकिन मेरे अंदर की वो टीस हमेशा बनी रहती। मैं कभी भी उन्हें ये ज़ाहिर नहीं होने देती थी कि मैं उन्हें मिस कर रही हूँ, क्योंकि मुझे लगता था कि जब उन्हें मेरी कोई परवाह ही नहीं है, तो मैं क्यों अपनी भावनाएं दिखाऊँ।
एक दिन पापा का फोन विक्रम के पापा यानी मेरे ससुर जी को आया। पापा ने उनसे विनती की कि मुझे कुछ दिनों के लिए मायके भेज दिया जाए। ससुर जी बहुत अच्छे इंसान थे, उन्होंने तुरंत हाँ कर दी। सास ने भी कहा कि नई-नई शादी है, लड़की को भी अपने मायके की याद आ रही होगी और उसके घरवालों को भी। लेकिन मुझे तो कोई खास खुशी नहीं हो रही थी। मैंने तो अपनी विदाई के दिन ही सोच लिया था कि मैं कभी पलटकर उस घर में नहीं जाऊंगी जहाँ मेरे जाने का किसी को कोई दुख न हो। पर आखिर थी तो मैं उसी घर की बेटी। जब जाने की बात पक्की हुई, तो अंदर ही अंदर एक अजीब सी हलचल शुरू हो गई। मुझे लगा कि शायद अब उन्हें मेरी अहमियत समझ आ गई है, शायद अब वो मुझे बहुत मिस कर रहे होंगे तभी तो इतने प्यार से बुला रहे हैं।
मेरी जेठानी ने मुझे चिढ़ाते हुए कहा, “शादी के बाद पहली बार मायके जा रही हो, देखना क्या ज़बरदस्त खातिरदारी होगी। जब मैं पहली बार गई थी, तो मेरी माँ ने मेरी पसंद की बीसियों डिश बनाई थीं। तुम्हारे घर से तो फोन आ ही रहे होंगे कि क्या-क्या खाना है?” उनकी बात सुनकर मेरा दिल फिर बैठ गया। मेरे घर से किसी ने एक बार भी नहीं पूछा था कि मैं क्या खाना पसंद करूंगी।
जाने वाले दिन मैं चुपचाप अपना सूटकेस पैक कर रही थी। मेरा चेहरा उतरा हुआ था। तभी विक्रम कमरे में आए और मुझे देखकर हैरान होते हुए बोले, “ये क्या अंजलि? मायके जाने के नाम पर तो लड़कियों के चेहरे गुलाब की तरह खिल जाते हैं। मेरी माँ आज भी अपने मायके जाने के नाम पर चहकने लगती हैं, और तुम इस दुनिया की इकलौती लड़की हो जिसका मायके जाने वाले दिन मुंह लटका हुआ है। क्या बात है?”
मैंने अपनी नज़रें चुराते हुए एक झूठा बहाना बनाया, “कुछ नहीं, बस मैं आपको बहुत मिस करूंगी न, इसलिए थोड़ी उदास हूँ।”
विक्रम ने एक ज़ोरदार ठहाका लगाया और बोले, “अच्छा जी! पिछले दो महीनों में तो मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि तुम मुझसे इतना गहरा प्यार करती हो कि दो-चार दिन की दूरी भी बर्दाश्त न कर सको। सच-सच बताओ, कहीं तुम्हारे घरवालों ने ऐन मौके पर आने से मना तो नहीं कर दिया?” उनका ये मज़ाक मेरे बर्दाश्त के बाहर था। मैं तमकते हुए बोली, “किसी ने मना नहीं किया है! और मुझे किसी की कोई याद नहीं आने वाली।” ये कहकर मैं कमरे से बाहर निकल गई।
कुछ ही देर में पापा मुझे लेने आ गए। मैं उनके साथ गाड़ी में बैठ गई। रास्ते भर पापा लगातार पंचायत की बातें, पड़ोसियों के किस्से और न जाने क्या-क्या बताते रहे, लेकिन मैं सिर्फ ‘हाँ’, ‘हूँ’ में जवाब देती रही। मेरा दिमाग अभी भी उसी उधेड़बुन में फंसा था। घर पहुँची, तो सब खुश थे। सबने अच्छे से स्वागत किया, लेकिन वो ड्रामा और इमोशन वहाँ भी गायब था जो मैं फिल्मों या कहानियों में देखती आई थी। कोई रो नहीं रहा था, कोई गले लगकर भावुक नहीं हो रहा था।
मैं थोड़ी उदास होकर अपने कमरे में गई और फ्रेश होकर बाहर आई। डाइनिंग टेबल पर खाना लगा हुआ था। जब मैंने टेबल की तरफ देखा, तो मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। टेबल पर वो सब कुछ था जो मुझे पसंद था—पनीर टिक्का, दाल मखनी, गाजर का हलवा, और मेरी फेवरेट पुदीने की चटनी। मैंने हैरान होकर माँ की तरफ देखा।
मैं हल्की सी खुशी छिपाते हुए बोली, “वाह माँ, आज तो सारी मेरी पसंद की चीज़ें बनी हैं।”
तभी कबीर ने बीच में टपकते हुए कहा, “हाँ दीदी, और ये सब बनवाने के लिए माँ ने सुबह से मेरी जान निकाल रखी है। बाज़ार से सामान लाने से लेकर सब्ज़ियां काटने तक, सब मुझसे करवाया है। अब तुम आ गई हो, तो कल से किचन की पूरी ज़िम्मेदारी तुम्हारी। मेरी छुट्टी!”
मैं मुस्कुरा दी और चुपचाप खाना खाने लगी। तभी कबीर ने फिर फरमाइश कर दी, “कल तो तुम्हें कड़ाही पनीर और नान बनाना पड़ेगा दीदी। पापा ने फ्रिज में बहुत सारी ताज़ा सब्ज़ियां भर रखी हैं।”
मुझे थोड़ा गुस्सा आ गया, मैंने धीरे से कहा, “मैं यहाँ काम करने नहीं आई हूँ। कुछ नहीं बनाऊंगी, जो करना है कर लो।”
कबीर मुस्कुराया और बोला, “अरे बना देना मेरी प्यारी बहना। और हाँ, जब तक यहाँ हो, रोज़ कुछ न कुछ बढ़िया बनाकर हम सबको खुश कर दो। फिर देखना, जब इस बार तुम्हारी विदाई होगी, तो हम लोग इतना ज़ोर-ज़ोर से रोयेंगे कि आवाज़ पूरे मोहल्ले में गूंज जाएगी।”
कबीर ने मेरी उसी दुखती रग पर हाथ रख दिया था जिसे मैं महीनों से दबा कर बैठी थी। मेरा गुस्सा फूट पड़ा। मैंने चिढ़ते हुए कहा, “तुम लोगों को मेरा मज़ाक बनाने की कोई ज़रूरत नहीं है। मैंने किसी से नहीं कहा था मेरे लिए रोने को। तुम लोग खुश थे न मुझे घर से निकालकर, तो अब ये ड्रामा क्यों?”
कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया। माँ ने अपना हाथ रोक लिया और कबीर भी चुप हो गया। पापा, जो अब तक चुपचाप खाना खा रहे थे, उन्होंने अपनी प्लेट खिसकाई और बहुत ही धीमी, भारी आवाज़ में बोले, “अंजलि, तुम्हें लगता है कि तुम्हारी विदाई पर हम खुश थे?”
मैंने नज़रें नीचे किए हुए कहा, “तो और क्या? सब तो हँस रहे थे। मेरे ससुराल वालों ने भी मुझे कितना ताना मारा। कोई भी तो नहीं रोया।”
पापा ने एक गहरी सांस ली। उनकी आँखों में वो नमी साफ छलक रही थी जिसे मैंने विदाई के दिन ढूँढा था। उन्होंने रुंधे हुए गले से कहा, “बेटा, जब एक बाप अपनी बेटी को विदा करता है, तो उसके लिए आँखों से आँसू बहाना बहुत आसान होता है। अपनी बेटी को रोते हुए देखकर कोई भी पत्थर दिल इंसान रो पड़े। लेकिन… उस वक्त उन आंसुओं को रोककर, चेहरे पर झूठी मुस्कान लाना, दुनिया का सबसे मुश्किल काम होता है। तुम्हारी शादी से एक रात पहले हम तीनों पूरी रात सोए नहीं थे। हम सिर्फ एक दूसरे को देखकर रोते रहे। लेकिन हमने आपस में तय किया था कि जब तुम इस घर की चौखट पार करोगी, तो हम में से कोई नहीं रोएगा।”
मैं हैरान होकर पापा को देख रही थी। पापा ने आगे कहा, “हम चाहते थे कि तुम्हारी नई ज़िंदगी की शुरुआत आंसुओं से नहीं, मुस्कुराहट से हो। हम तुम्हें ये एहसास दिलाना चाहते थे कि शादी कोई सज़ा या जुदाई नहीं है, बल्कि एक नया और खूबसूरत सफर है। अगर हम रोते, तो तुम वहाँ जाकर भी उदास रहतीं। तुम्हारा ससुराल तुम्हारा नया घर है, और हम चाहते थे कि तुम वहाँ पूरे दिल और खुशी के साथ जाओ। कहते हैं न… रिश्ता वही, सोच नई। हमने बस उस नई सोच के साथ तुम्हें विदा करने की कोशिश की थी।”
पापा की बातें सुनकर मेरे हाथों से निवाला छूट गया। मेरी आँखों से आंसुओं की धार बह निकली। मैंने अब तक जिसे अपनी बेइज्जती समझा था, वो दरअसल मेरे परिवार का मेरे लिए किया गया सबसे बड़ा बलिदान था। उन्होंने अपने दर्द को पीकर मुझे खुशी देनी चाही थी। मैं उठी और दौड़कर पापा के गले लग गई। मैं फूट-फूट कर रो रही थी और पापा मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए खुद भी अपने आँसू नहीं रोक पा रहे थे।
तभी माँ ने माहौल को थोड़ा हल्का करने की कोशिश करते हुए कहा, “लो भई, बाप-बेटी का ये आंसुओं वाला महासंग्राम अगर खत्म हो गया हो, तो खाना खा लें? खाना ठंडा हो रहा है।”
कबीर ने फिर से अपनी चिर-परिचित मुस्कान के साथ कहा, “वही न माँ, एक ये दीदी है जो हमेशा पापा को रुला देती है, और एक मैं हूँ जो कभी नहीं चाहता कि मेरे पापा की आँखों में कोई आँसू आए।”
कबीर का ये डायलॉग सुनते ही हम सब, जो अभी तक रो रहे थे, एक साथ ज़ोर से हँस पड़े। उस दिन मुझे समझ आ गया कि प्यार जताने का तरीका सिर्फ आँसू बहाना नहीं होता, कभी-कभी किसी की मुस्कुराहट के पीछे भी दुनिया का सबसे गहरा और निस्वार्थ प्यार छिपा होता है।
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#मुस्कुराहट के पीछे छिपे आँसू: एक बेटी की विदाई