तीज की चुनरी, भारत का तिरंगा – लक्ष्मी कानोडिया ‘अनिका’

सावन जब धरती पर उतरता है, तब वह केवल वर्षा नहीं लाता; वह स्मृतियों की भीगी हुई पोटली, लोकगीतों की गूँज, मेहंदी की महक और भारतीय स्त्री के मन का अनंत उत्सव भी साथ लाता है। पीपल की डाल पर पड़ा झूला केवल रस्सियों का सहारा नहीं होता, वह पीढ़ियों से चली आती संस्कृति का … Read more

त्याग की मूरत

कमरे में एक भारी सन्नाटा छा गया। प्रेरणा के चेहरे पर एक अजीब सी शून्यता आ गई। उसने अपनी आँखों में आए आँसुओं को पलकों के पीछे ही रोक लिया। कुछ पल बाद, प्रेरणा ने गहरी सांस ली, अपने चेहरे पर एक झूठी लेकिन मजबूत मुस्कान लाई और आशा  के पास जाकर उसके सिर पर … Read more

एहसास के धागे

 श्रुति तो जैसे पत्थर की मूरत बन गई थी। विक्रम के कमरे से बाहर जाते ही उसके अंदर का लावा फूट पड़ा। “माँ आ रही हैं? मतलब मेरी सास! इन्हें भी आज ही आना था? जब भी हम दोनों कहीं बाहर जाने का, अपने लिए कुछ वक्त निकालने का सोचते हैं, तो महारानी जी मुंह … Read more

गलती इंसान से ही होती है

“भाभी, मेरे देवर की शादी है, आप सपरिवार आमंत्रित हैं।” मेरे पड़ोस में रहने वाली विनीता ने खुशी से चहकते हुए एक लाल रंग का निमंत्रण पत्र मेरे हाथों में थमा दिया। मैं विनीता के देवर, प्रतीक को जानती थी। वह एक बहुत ही होनहार और एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर था। … Read more

अतीत की यादें

विराज यह सब सुनकर भीतर तक हिल गया। उसे लगा जैसे सुहानी ने अपनी पूरी जिंदगी का सबसे भारी बोझ उसके सामने रख दिया हो। विराज ने बहुत ही संयम और कोमलता से सुहानी की तरफ देखते हुए कहा, “सुहानी, मैं आपके उस अतीत को तो नहीं बदल सकता, और न ही मैं आपसे यह … Read more

“बस बहुत हो गया” – कमलेश आहूजा

दीवाली का दूसरा दिन था।सरोज ने पति रमेश से कहा-“चलो जी इस बार हम लोग ही सबके घर जाते हैं दीवाली की राम राम कहने।” “फिर समय से निकलना क्योंकि सबके लिए गिफ्ट्स व मिठाई के डिब्बे भी लेने हैं।” रमेश बोला। “बस मिठाई ही लेनी है गिफ्ट तो बहुत सारे पड़े हैं पिछले साल … Read more

*बस बहुत हो गया* – तोषिका

“*बस बहुत हो गया*। मेरी बेटी अब एक पल भी इस घर में नहीं रहेगी।” माही के पिता रामचरण ने बोला। “अरे पापा, आप ऐसा क्यों बोल रहे है, छोटी सी बात है इसमें घर ले जाने वाली कौन सी बात हो गई। शादी को अभी एक साल भी नहीं हुआ है।” माही के पति … Read more

बेटियाँ दो-दो कुलों का नाम रोशन करती हैं – डॉ आभा माहेश्वरी

एक छोटे से कस्बे में रामप्रसाद नाम का छोटा सा कपड़े का व्यापारी अपनी पत्नी सावित्री और बेटी नंदिनी के साथ रहता था। रामप्रसाद मेहनती तो था, लेकिन उसकी एक ही चिंता थी कि उसके घर बेटा नहीं है। वह अक्सर कहता, “काश! मेरे घर भी एक बेटा होता, जो मेरा नाम आगे बढ़ाता।” उसकी … Read more

ऑंखें खुल जाना – एम. पी. सिंह “मोहि”

राजू के पैदा होते ही उसकी मां गुजर गई थी और जब वो 7 साल का था, उसके पिता भी गुजर गए थे। दादी थी नहीं, इसलिए दादा ने जैसे-तैसे बड़ा किया। 15 साल की उम्र में दादा भी साथ छोड़ गए। पेट भरने के लिए उसने पढ़ाई छोड़ दी और एक स्कूटर रिपेयर की … Read more

*चाची* – उषा भारद्वाज

    मोहल्ला भले ही छूट गया हो, लेकिन उसकी यादें आज भी मेरे मन में वैसे ही बसी हैं। आज मां ने दही बड़ा बनाया। मुझे बचपन से बड़े बहुत पसंद हैं। जैसे ही मैंने खाना शुरु किया। अचानक मोहल्ले की चाची याद आ गईं। पूरा मोहल्ला उन्हें चाची के नाम से ही जानता था। छोटे-बड़े … Read more

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