देहरी की सूनी आस

 रात को घर पहुंचकर स्नेहा ने सूटकेस से कपड़े वापस निकालने शुरू किए। रिया ने मासूमियत से पूछा, “मम्मा, हम नानी के घर कब जाएंगे?” स्नेहा ने अपने आंसू छुपाते हुए उसे गले से लगा लिया और कहा, “इस बार नहीं बेटा, अगले साल जरूर जाएंगे।” लेकिन सबसे मुश्किल काम था बनारस फोन करना। स्नेहा … Read more

एक झूठा कलंक

 “साहब, यह सब सरासर झूठ है। मेरी बहन तो यहाँ रहती भी नहीं है। मेरे पिता हार्ट पेशेंट हैं, वे किसी पर हाथ कैसे उठा सकते हैं? मैंने आज तक अपनी पत्नी से एक रुपये की मांग नहीं की।” अविनाश ने पुलिस वाले के सामने हाथ जोड़ते हुए कहा। लेकिन वहाँ सुनने वाला कोई नहीं … Read more

कर्मों का खाता: एक अनकही उधारी

कैलाश की आँखों में भी अब आंसू आ गए थे। उनके चेहरे पर एक संतोष भरी मुस्कान थी। आदित्य ने कहा, “मैंने रोते हुए आपके पैर पकड़ लिए थे और खुशी के मारे आपको पच्चीस हजार रुपये इनाम के तौर पर देने चाहे थे। मेरे पास शब्द नहीं थे। लेकिन काका, क्या आपको याद है … Read more

रिश्तों की छाँव: जब आंगन सूना हो गया

 अम्मा जी कभी निहारिका के सामने उसकी तारीफ नहीं करती थीं। उन्हें लगता था कि ज्यादा तारीफ करने से बहू सिर पर चढ़ जाएगी। इसलिए वह अक्सर कमियां ही निकालती थीं—”सब्जी में नमक थोड़ा कम है”, “कपड़े ठीक से तह नहीं किए”। लेकिन निहारिका को उनकी असलियत तब पता चली, जब एक दिन वह बाज़ार … Read more

उम्र की दहलीज और बचपन का हाथ

कबीर ने अपने जूते के फीते बांधते हुए बहुत ही मासूमियत लेकिन एक गहरी समझ के साथ कहा, “पापा, आपको याद है जब हम पिछले साल ट्रिप पर गए थे? मम्मा ने मेरा कितना सारा सामान पैक किया था। मेरी दवाइयां, मेरे खिलौने, मेरे गर्म कपड़े, मेरा मनपसंद खाना। मम्मा कहती हैं कि बच्चों को … Read more

ज़िंदगी की दूसरी सुबह

सुमित्रा देवी ने डरते-डरते नज़रें उठाईं। उनके होंठ कांप रहे थे। उन्होंने माइक को बिना छुए ही अपनी रुंधी हुई आवाज़ में कहना शुरू किया, “मुझे… मुझे कोई पैसा या ज़ायदाद नहीं चाहिए। मैं बहुत पढ़ी-लिखी भी नहीं हूँ, बस रामचरितमानस पढ़ लेती हूँ। मुझे बस… बस एक ऐसा कोना चाहिए जहाँ मैं बिना किसी … Read more

साँसों से भारी ज़िम्मेदारियाँ

सुधा की उम्र यही कोई पैंतालीस के आस-पास रही होगी। वह उन आम भारतीय महिलाओं में से एक थी, जिनके दिन की शुरुआत घर के सबसे छोटे सदस्य के जागने से पहले होती थी और रात तब होती थी जब घर का आखिरी बल्ब बुझ जाता था। सुधा का परिवार एक टिपिकल मध्यमवर्गीय परिवार था। … Read more

एक जीवन, सात रिश्ते

मैं आज तक उसे सिर्फ एक ‘लड़ाकू’, ‘चिकचिक करने वाली’ और ‘अनपढ़ गृहणी’ समझता रहा। मैं अपनी झूठी शान, अपने पैसों और अपने अहंकार में इतना अंधा हो गया था कि मैंने कभी यह देखने की कोशिश ही नहीं की कि मेरे घर की उस चारदीवारी के अंदर, नमिता  मेरे लिए माँ, बहन, पिता, दोस्त … Read more

वो मीठा सा झूठ

 “बाबूजी कोई बच्चे नहीं हैं अनिकेत। उन्होंने दुनिया देखी है। वो जानते थे कि तुम झूठ बोल रहे हो, लेकिन उन्होंने तुम्हारा झूठ इसलिए सच मान लिया क्योंकि वो तुम्हारी खुशी देखना चाहते थे। और तुमने भी झूठ इसलिए बोला क्योंकि तुम उन्हें तकलीफ में नहीं देख सकते थे। ये जो झूठ बोलने की बीमारी … Read more

कच्ची मिट्टी का पक्का घर

मीरा थोड़ी आगे बढ़ी और अपने ससुर दीनानाथ जी की कुर्सी के पीछे जाकर खड़ी हो गई। उसने उनके कंधे पर अपना हाथ रखा और कहा, “क्या आपको पता है अंकल, जब हम शहर के बाज़ार से गुज़रते थे, तो लोग मेरे ससुर जी को देखकर सम्मान से रास्ता छोड़ देते थे। उनका नाम सुनकर … Read more

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