वसीयत के पन्ने

मीरा को कहां मालूम था कि इस बार जब वह अपने बाबूजी, रमाकांत जी को लेकर अस्पताल की सीढ़ियां चढ़ रही है, तो वे सीढ़ियां वापसी का रास्ता कभी नहीं दिखाएंगी। पिछले चौदह महीनों से अस्पताल और घर के बीच मीलों का सफ़र तय करते-करते मीरा की ज़िंदगी एक मशीन बन गई थी। बाबूजी की … Read more

रूप का अहंकार

अनिरुद्ध एक पढ़ा-लिखा और सुलझा हुआ इंसान था। उसने राधिका की इस बद्तमीज़ी पर अपना आपा नहीं खोया, बल्कि बहुत ही गरिमा के साथ जवाब दिया, “मिस राधिका, फोटो स्टूडियो वाले अक्सर तस्वीरों को थोड़ा बहुत एडिट कर देते हैं, लेकिन मैंने कभी अपने रंग को छिपाने की कोशिश नहीं की। मैं एक डॉक्टर हूँ, … Read more

सच्चाई का आईना

इंसानियत और संस्कारों से बड़ी कोई जात नहीं होती। उनके घर में भी वही संस्कार हैं, जो हमारे यहाँ हैं। अगर अद्विका ने कोई गलत रास्ता चुना होता या किसी गलत इंसान का हाथ पकड़ा होता, तो मैं खुद उसका सबसे बड़ा दुश्मन बन जाता। लेकिन जब मेरी बेटी ने एक नेक और सच्चे इंसान … Read more

ख़ुशियों की पासबुक

पार्वती देवी का जीवन किसी तपस्या से कम नहीं था। शादी के महज पांच साल बाद ही उनके पति का एक सड़क दुर्घटना में देहांत हो गया था। उस वक्त उनकी बेटी शिखा बमुश्किल तीन साल की थी। ससुराल वालों ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि पार्वती के भाग्य में ही खोट है। उस … Read more

समझदार पत्नी

शादी को अभी महज़ डेढ़ साल ही बीता था, लेकिन इस छोटे से अरसे में ही नंदिनी  ने विशाल के घर को पूरी तरह से अपना बना लिया था। विशाल के घर की परिस्थितियां आम घरों जैसी नहीं थीं। शादी से करीब एक साल पहले ही विशाल की माँ, सुशीला जी को लकवे का एक … Read more

पछतावा

रात के ग्यारह बज चुके थे। पूरे घर में खामोशी छा गई थी। सास-ससुर को दवाइयां देकर सुलाने, ननद और देवर के नखरे उठाकर उन्हें मनपसंद भोजन कराने, और अंत में पति को खाना परोसने के बाद, मीरा ने रसोई समेटी थी। हमेशा की तरह बर्तन मांजने के बाद जो थोड़ा-बहुत ठंडा खाना बचा था, … Read more

एक दूसरे का सम्मान

सुधा अपने शहर के उस बड़े से मकान में पिछले छह सालों से बिल्कुल अकेली रह रही थी। पति के गुजर जाने के बाद जिंदगी जैसे एक ठहरा हुआ पानी बन गई थी। उनकी इकलौती बेटी, शिखा, पिछले कुछ सालों से नौकरी के सिलसिले में बेंगलुरु में रह रही थी। सुधा का ज्यादातर समय पुरानी … Read more

बेटे की शादी

सुशीला बहन, तुम्हारी नजर में कोई ऐसी सीधी-सादी और घरेलू लड़की है क्या, जो मेरे सुमित को संभाल सके? हम दहेज में एक पैसा नहीं मांगेंगे, बस लड़की हमारे बेटे को सुधार दे।” सुशीला तुरंत अपनी साड़ी का पल्लू ठीक करते हुए चहक उठी, “अरे मेरे मायके के पड़ोस में एक बहुत ही गरीब लेकिन … Read more

राखी

पिताजी की आवाज रुंध गई थी। उन्होंने आगे कहा, “जब मैं विमला की भेजी हुई इस साधारण सी सूती राखी को अपनी कलाई पर बांधता हूं, तो मुझे ऐसा लगता है जैसे मेरी छोटी बहन ने अपना सारा दर्द, अपना सारा संघर्ष इस धागे में पिरोकर मुझे भेज दिया है। यह राखी मुझे याद दिलाती … Read more

ईंट की दीवारें

“दीदी, तू आ गई! मुझे लगा तू भी मुझसे पराई हो गई।” मयंक रो पड़ा। स्मृति भी बाहर आ गई और शालिनी के पैर छूकर रोने लगी। शालिनी ने दोनों को बिठाया और भरे हुए गले से पूछा, “मयंक, ये सब क्या है? बाबूजी और अम्मा के जाने के बाद तुम दोनों ने इस घर … Read more

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