बहू को बेटी बनने समय तो लगता है

अलार्म की तीखी आवाज़ ने काव्या की नींद तोड़ दी। उसने फोन की स्क्रीन पर समय देखा—सुबह के साढ़े पाँच बज रहे थे। नवंबर की हल्की ठंड में रजाई से बाहर निकलने का बिल्कुल मन नहीं था, लेकिन रसोई की जिम्मेदारियां उसे पुकार रही थीं। काव्या की शादी को अभी महज़ आठ महीने ही हुए … Read more

संस्कारों की कद्र

“सुषमा जी, देखिए हमारे पंडित जी ने कहा है कि अगले महीने की पंद्रह तारीख का मुहूर्त सबसे उत्तम है। इसके बाद तो सीधा छह महीने तक कोई शुभ मुहूर्त नहीं है। हम चाहते हैं कि शादी इसी मुहूर्त में हो जाए। आखिर हमें भी तो अपने रिश्तेदारों को जवाब देना होता है।” फोन के … Read more

प्यार हमेशा पाने का नाम नहीं होता

जब वह लाल जोड़े में सजी, रोते हुए गाड़ी में बैठ रही थी, तो उसकी नज़रें भीड़ में मुझे ही तलाश रही थीं, लेकिन मैं एक खंभे के पीछे छिप गया था। मैं उसे अलविदा कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाया था। आज उसकी शादी को छः महीने बीत चुके हैं। कल ही वह पहली … Read more

एक माँ का दिल

रमा देवी गैस के पास खड़ी होकर अपने पच्चीस साल के बेटे कबीर के लिए टिफिन पैक कर रही थीं। डाइनिंग टेबल पर बैठे उनके पति, आनंद जी, अपने चश्मे को नाक पर टिकाए अख़बार की सुर्ख़ियों में खोए हुए थे। घर का माहौल बिल्कुल वैसा ही था जैसा किसी भी आम मध्यमवर्गीय परिवार का … Read more

अहंकार

समीर ने अपने चमचमाते जूतों के फीते बांधते हुए झल्लाहट भरी आवाज में कहा, “मीरा, मेरा नीला रूमाल कहां है? तुम दिन भर घर में रहकर एक काम ढंग से नहीं कर सकती? नाश्ते में नमक कम है और मेरी फाइल भी टेबल पर नहीं है।” मीरा, जो पसीने से लथपथ रसोई में बच्चों का … Read more

झूठी शान

अपनी आलीशान कांच की इमारत के सबसे ऊपरी माले पर बनी अपनी शानदार केबिन में, बाहर हो रही बारिश को देखते हुए अवनि ने अपनी ब्लैक कॉफ़ी का कप अभी होंठों से लगाया ही था कि उसके दिमाग के किसी कोने में पच्चीस साल पुरानी वो खौफनाक रात फिर से जिंदा हो उठी। वो रात … Read more

असली न्याय

अदालत के उस विशाल और शांत कमरे में आज एक अजीब सा सन्नाटा पसरा था। यह सन्नाटा किसी डर का नहीं, बल्कि एक स्तब्ध कर देने वाले सच का था। कटघरे में अट्ठाईस वर्षीय देविका खड़ी थी। उसके चेहरे पर न तो कोई पछतावा था, न कोई खौफ और न ही किसी तरह की घबराहट। … Read more

संस्कार के बीज

रात के लगभग ग्यारह बज रहे थे। पैंसठ वर्षीय सुमित्रा देवी अपनी पंसदीदा किताब के कुछ पन्ने पलट कर बस सोने की ही तैयारी कर रही थीं। उनका यह पच्चीस सौ स्क्वायर फुट का दो मंजिला घर, जिसे उन्होंने अपने पति के गुजर जाने के बाद अपनी पाई-पाई जोड़कर बनाया था, अब उनकी एकांत दुनिया … Read more

अपनों का साथ! – डाॅ संजु झा

आशा जी  एक आम गृहिणी की भाॅंति अपने गाॅंव के बड़े मकान में सुकून के साथ रहतीं थीं।बच्चे,पति , परिवार,समाज ही उनकी दुनियाॅं थी। अपनों के साथ समय कैसे बीत जाता था, उन्हें  पता ही नहीं चलता।कहावत है परिवर्त्तन समय का नियम है।समय के साथ बच्चे बड़े होकर शहर की राह पकड़ चुके थे। साल … Read more

“अपनों  का साथ ” – उमा वर्मा

सुमित्रा चार महीने से बिस्तर पर पड़ी हुई है ।बस लेटे रहना और खाना यही दिन चर्या बन गई है।अपने से कुछ कर नहीं सकती है ।बहु और बेटी सेवा में लगी रहती है ।व्हील चेयर पर बिठा कर बाथरूम ले जाना, नहलाना,सफाई सबकुछ के लिये दूसरे पर आश्रित हो गई है।बहुत तकलीफ होती है … Read more

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