सुमित्रा स्नेह छाया – रश्मि झा मिश्रा 

पीली मखमली गद्देदार कुर्सी पर सुमित्रा देवी को बड़े ही आदर के साथ बैठाया गया था। घर के सबसे बड़े हॉल के बीचों-बीच, जहाँ से वो पूरे घर पर नज़र रख सकती थीं। आज ‘रघुवंशी सदन’ में चहल-पहल कुछ ज़्यादा ही थी। घर की सबसे बुजुर्ग और मुखिया होने के नाते सुमित्रा देवी का सम्मान … Read more

दूसरी माँ – मुकेश पटेल

“दीदी, एक बात पूछूं? आप बुरा तो नहीं मानेंगी ना? मैं पिछले छह महीने से आपके यहाँ काम कर रही हूँ, घर का कोना-कोना चमक जाता है, लेकिन आपका चेहरा कभी नहीं चमकता। मैंने आपको कभी खुलकर हंसते हुए नहीं देखा। आपकी आँखों में हमेशा एक ऐसा सन्नाटा क्यों रहता है जैसे कोई बहुत बड़ा … Read more

सास के तेवर से बचकर रहना। – गरिमा चौधरी 

विदाई की शहनाई की गूंज अभी कानों में ताज़ा ही थी कि मायके की दहलीज छूट गई और ससुराल का भव्य दरवाजा सामने आ खड़ा हुआ। नैना, जिसने अभी-अभी नई-नवेली दुल्हन के रूप में इस ‘चौधरी विला’ में कदम रखा था, का दिल किसी सूखे पत्ते की तरह कांप रहा था। गाड़ी से उतरते ही … Read more

बेटियां कब पराई हो जाती है पता भी नहीं चलता – विभा गुप्ता

कार की खिड़की से पीछे छूटते पेड़ों को देखते हुए सुमन के चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान थमी हुई थी जिसे दुनिया की कोई भी चिंता मिटा नहीं सकती थी। शादी के पूरे चार महीने बाद वह अपने मायके जा रही थी। बगल में ड्राइविंग सीट पर बैठे उसके पति, रजत, बार-बार उसे कनखियों से … Read more

धोखा – सुनीता साहनी

नैना ने अपनी कुर्सी पर बैठते हुए पानी की बोतल खोली ही थी कि उसकी नज़र सामने वाली डेस्क पर टिकी सुहानी पर जा रुकी। ऑफिस की वह डेस्क, जो हमेशा हंसी-ठिठोली और चाय के कपों की खनक से गूंजती रहती थी, आज वहां एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था। सुहानी, जो इस दफ्तर … Read more

किस्मत वाले – संगीता अग्रवाल

रामनाथ बाबू अपनी पुरानी आराम कुर्सी पर बैठे, चश्मे के मोटे शीशों के पीछे से दीवार पर टंगी उस बड़ी सी तस्वीर को निहार रहे थे। तस्वीर में तीन जवान लड़के और एक गर्वित माता-पिता मुस्कुरा रहे थे। यह तस्वीर पंद्रह साल पुरानी थी। आज उस फ्रेम पर धूल की एक बारीक परत जम गई … Read more

बेटा क्यों हमारी नाक कटवाने पर तुला है – मुकेश पटेल

दिवाकर बाबू अपने ड्राइंग रूम में बेचैनी से टहल रहे थे। उनके माथे पर पसीने की बारीक बूंदें थीं, जबकि कमरे का एसी पूरी ठंडक दे रहा था। सोफे के एक कोने में उनकी पत्नी, सुमति जी, सिर पकड़े बैठी थीं। घर में एक अजीब-सा भारीपन था, जैसा अक्सर तूफ़ान आने से पहले होता है। … Read more

अपने लिए जीना भी जरूरी है – मीता राकेश 

  रात के ग्यारह बज चुके थे। रसोई की सिंक में बर्तनों का एक पहाड़ खड़ा था और डाइनिंग टेबल पर बिखरे हुए जूठे प्लेट इस बात की गवाही दे रहे थे कि आज घर में दावत थी। वंदना ने एक गहरी सांस ली और अपनी कमर पर हाथ रखकर उसे सीधा करने की कोशिश की। … Read more

खाने का असली स्वाद तो बहू के हाथों में होता है, – डॉ अनुपमा श्रीवास्तव 

रात के सन्नाटे में अस्पताल की मशीनों की बीप-बीप आवाज़ रोहन के कानों में हथौड़े की तरह बज रही थी। आईसीयू के बाहर बेंच पर बैठा वह अपने हाथों में अपना सिर थामे हुए था। उसकी आँखों के सामने बार-बार वही दृश्य घूम रहा था—रसोई के फर्श पर बेसुध पड़ी सुमन और उसके चारों ओर … Read more

पछतावे की राख – डॉ पारुल अग्रवाल

पड़ोसियों और रिश्तेदारों की बातें सुनकर कावेरी देवी का गुस्सा थोड़ा शांत जरूर हुआ था, लेकिन उनके चेहरे पर अभी भी तमतमाहट साफ़ झलक रही थी। वे अपने बड़े बेटे, विक्रम, की बातों पर आँख मूंदकर विश्वास करती थीं, और आज विक्रम ने जो मंज़र पेश किया था, उसने कावेरी देवी के दिल में छोटे … Read more

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