वसीयत के पन्ने
मीरा को कहां मालूम था कि इस बार जब वह अपने बाबूजी, रमाकांत जी को लेकर अस्पताल की सीढ़ियां चढ़ रही है, तो वे सीढ़ियां वापसी का रास्ता कभी नहीं दिखाएंगी। पिछले चौदह महीनों से अस्पताल और घर के बीच मीलों का सफ़र तय करते-करते मीरा की ज़िंदगी एक मशीन बन गई थी। बाबूजी की … Read more