त्याग का तराजू

 पल्लवी ने एक गहरी साँस ली और आगे कहा, “लेकिन आज जब दोनों देवर लाखों कमाने लगे, अपने लिए गाड़ियाँ और फ्लैट खरीदने लगे, और जब अपनी सगी बहन की शादी में हाथ बँटाने की बारी आई तो उन्होंने अपने हाथ पीछे खींच लिए। जब मयंक जी ने सिर्फ इतना कहा कि घर का बोझ … Read more

जंजीर और आईना

“बहू… मुझे माफ कर दे,” मनोरमा देवी का गला रुंध गया था। आवाज कांप रही थी। “आज तूने मेरे सामने वो आईना रख दिया जिसे देखने से मैं वर्षों से भाग रही थी। मैं भूल गई थी कि जो दर्द मुझे मेरी सास ने दिया, मैं उसी दर्द को अपनी आदत बना बैठी थी। मुझे … Read more

जब अपनों की चौखट पर पराए हो गए

 “शेखर बेटा…” गायत्री देवी की आँखों से आंसुओं की धार बह निकली। वह कांपते कदमों से आगे बढ़ीं और शेखर के हाथ पकड़ने की कोशिश की, “हमें माफ कर दे बेटा! हमने तेरे साथ बहुत बड़ा अन्याय किया। सोहन का कारोबार लुट गया, कुणाल कर्ज में डूब गया और बैंक वाले उस घर को नीलाम … Read more

धूप-छांव का आशियाना

 “अरे शारदा, ये क्या कर रही हो? छोड़ो, मैं ठीक हूं।” “आप बिल्कुल ठीक नहीं हैं,” शारदा जी ने मजबूती से उनका पैर थामते हुए बड़ी ममता से कहा। “जब ब्याह होकर इस दहलीज पर आई थी, तब से आज तक आपकी पेशानी की एक-एक शिकन को पहचानती हूं। कल जब से मयंक ने मेरी … Read more

पिंजरे की वो आख़िरी रात

पारुल वकील मालती सक्सेना के दफ़्तर के सामने वाली कुर्सी पर बैठी थी। साधारण सूती साड़ी, करीने से संवारे हुए हल्के सफ़ेद बाल और चेहरे पर एक अजीब सा ठहराव। न आँखों में आँसू थे, न आवाज़ में कोई थरथराहट। मालती जी ने चश्मा ठीक करते हुए सामने रखी फ़ाइल पर नज़र डाली और फिर … Read more

बड़ी बहू

 दीपावली के पावन पर्व पर, श्वेता अपनी एक साल की बेटी और निशांत के साथ ग्वालियर हवेली पहुँची। जानकी देवी अब काफी हद तक स्वस्थ थीं और अपने पैरों पर चलकर दरवाज़े तक आईं। श्वेता ने जब माँ के चरण छुए, तो जानकी देवी ने उसे सीने से लगा लिया। पर अगले ही पल श्वेता … Read more

ससुराल का आंगन बहुओं के दम से ही महकता है

रश्मि ने उठकर अल्पना को गले लगा लिया और बोली, “दीदी, आज से यह घर सिर्फ मेरा नहीं, आपका भी उतना ही है। और मां की जिम्मेदारी अब किसी पर अहसान नहीं, मेरा सबसे बड़ा सौभाग्य होगी। अब से मां को साल भर का इंतजार नहीं करना पड़ेगा, उनकी आंखों की चमक रोज ऐसे ही … Read more

चूड़ियों की खनक और सधी हुई डोर

“मम्मी, आज आपने मेरी आंखें खोल दीं,” शालिनी का गला भर आया। “मैं अपनी कड़वाहट को सही मानकर बैठ गई थी और सोच रही थी कि जो दर्द मैंने सहा, उसी रास्ते से सबको गुजरना चाहिए। मैं भूल गई थी कि परंपराएं तकलीफ़ की नहीं, प्यार की आगे बढ़नी चाहिए। आपने बिल्कुल सच कहा, घर … Read more

 मान की डोर

 शौर्य की इस अगाध विनम्रता, बड़प्पन और मीठी वाणी ने उस कमरे में जमी सारी बर्फ को एक ही झटके में पिघला दिया। फूफाजी, जो बरसों से अपनी कड़क मिजाजी के लिए जाने जाते थे, उनका दिल भी इस नौजवान के आगे पिघल गया। उनका कठोर चेहरा एक आत्मीय मुस्कान में बदल गया। उन्होंने अपनी … Read more

नजरिए का दर्पण

अंजलि की आंखें अचरज और कृतज्ञता से भर आईं। जिस बात के लिए उसे हमेशा घर में झिझक महसूस होती थी, आज उसी बात की इजाजत सासू मां ने खुद आगे बढ़कर दी थी। अंजलि के होंठों पर एक ऐसी सुकून भरी मुस्कान खिल गई जो शायद कल्याणी जी ने पहले कभी नहीं देखी थी। … Read more

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