मन का दर्पण
रात के करीब दस बज रहे थे। घर में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था, जिसे सुमित्रा जी की तेज और गुस्से से कांपती हुई आवाज़ ने चीर दिया। “राघव! मेरे कमरे में आ अभी के अभी!” सुमित्रा जी का चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ था और उनकी सांसें तेज़ चल रही थीं। राघव, … Read more