पत्थर की छाँव में

बचपन से ही काव्या के लिए उसकी माँ, सुमित्रा, किसी तानाशाह से कम नहीं थीं। जहाँ दूसरी लड़कियाँ अपनी माँ के आँचल में छिपकर लाड़ लड़ाती थीं, उनके साथ सहेलियों की तरह बातें करती थीं, वहीं काव्या के हिस्से में सिर्फ नियम, अनुशासन और सख्त हिदायतें आई थीं। काव्या जब भी कोई नई फरमाइश करती, … Read more

रिश्तों की नई बुनियाद: एक पिता का सर्वोच्च धर्म

  शिखा , जो दरवाजे के पास खड़ी सब सुन रही थी, धीरे से कमरे में आई। उसकी आंखों में एक अजीब सी दृढ़ता थी। उसने अपने माता-पिता के हाथ पकड़े और आंसुओं को रोकते हुए कहा, “नहीं पिताजी, मैं आपके साथ वापस नहीं जा सकती। जिस दिन मेरा कन्यादान हुआ था, उसी दिन से यह … Read more

फ़र्ज़ की बेड़ियाँ

शाम के धुंधलके ने अभी घर के आँगन में कदम ही रखा था कि तभी अंदर के कमरे से एक ज़ोरदार आवाज़ आई। मीरा दौड़कर अपनी सास, शांति देवी के कमरे में पहुँची। शांति देवी ज़मीन पर बेसुध पड़ी थीं। उनके हाथ से पानी का गिलास छूटकर टूट चुका था। मीरा की साँसें जैसे गले … Read more

कच्चे धागे और अहंकार की दीवार

रिया के इन कड़वे और जहरीले शब्दों ने डाइनिंग टेबल पर एक गहरा सन्नाटा बिखेर दिया। हर कोई सन्न रह गया। मीरा, जिसने हमेशा अमन को अपने छोटे भाई या यूं कहें कि अपने बेटे की तरह माना था, उसके लिए यह आरोप किसी खंजर के घोंपे जाने से कम नहीं था। उसकी आँखों से … Read more

प्रतिष्ठा का मुखौटा

दीनदयाल जी अपनी बात पूरी कर पाते, उससे पहले ही शेखर सेठ ने उनकी बात काटते हुए तल्ख लहज़े में कहा, “दीनदयाल जी! बात पाँच-सात लाख रुपये के खर्च की नहीं है, बात हमारी ‘हैसियत’ की है। बुआ जी के ससुराल वालों, हमारे पूरे खानदान और शहर के रसूखदार लोगों को पता तो चलना चाहिए … Read more

रेशमी धागों की चुभन

लाल सुर्ख रंग, उस पर चमकता हुआ असली ज़री का सुनहरा काम और रेशम की वो मखमली छुअन… मालती की गोद में रखी वो बनारसी साड़ी किसी नवविवाहिता के सपनों जैसी हसीन लग रही थी। लेकिन मालती की आँखों से गिरते आंसुओं की अनवरत धारा उस रेशम पर गिरकर गहरे धब्बे बना रही थी। अभी … Read more

रिश्तों की गर्माहट: एक अनकहा एहसास

 “अगले दिन विहान ने दादी से बहाना बनाया कि आपने उसे दो जैकेट दिलवाई हैं। एक स्कूल के लिए और एक घर के लिए। उसने कहा कि नीली वाली जैकेट उसे चुभती है इसलिए वह इसे नहीं पहनेगा। वो मासूम अपनी दादी को वह जैकेट ओढ़ाकर सुला देता है। और क्योंकि उसका खुद का कमरा … Read more

रिश्ता और स्वाभिमान – ज्योति गुप्ता

 रविवार का दिन था, किंतु शहर के जाने-माने व्यापारी और व्यापारी मंडल के अध्यक्ष राजेंद्र जी अपनी आलीशान कोठी के शानदार शयनकक्ष में उदास अकेले बैठे थे। व्यापार जगत में उनकी धाक थी; हर छोटा-बड़ा व्यापारी उनकी बात सिर-आँखों पर रखता था। मगर आज उनकी आँखों के सामने बीती रात का वह कड़वा दृश्य बार-बार … Read more

“हम सब साथ हैं” – लक्ष्मी कानोडिया ‘अनिका’

आगरा की व्यस्त गलियों के बीच, राजा मंडी में एक तीन मंज़िला पुराना लेकिन मजबूत घर था, जहां शर्मा परिवार कई पीढ़ियों से साथ रह रहा था। घर की सबसे ऊपरी मंज़िल पर दादी-जी रहती थीं—सफेद बाल, मुस्कुराती आँखें और कहानियों का खजाना। बीच वाली मंज़िल पर रमेश शर्मा, उनकी पत्नी काव्या और दो बच्चे—ध्रुव … Read more

*स्वाभिमान मेरा भी* – तोषिका

“कहा जा रही हो बेटा? आज तुम्हे लड़के वाले आ रहे है देखने।” मोहन ने अपनी बेटी निशा को पीछे से टोकते हुए बोला। निशा घूमी और उसने बोला “बस बाहर थोड़ा कॉलेज के लिए समान लेने जा रही हू, जल्दी ही आ जाऊंगी।”  तभी मोहन ने ताने मारते हुए बोला “सारा दिन बाहर घूम … Read more

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