जड़ों की उड़ान

“मैं इस घर को नहीं बेचूंगी विकास, बल्कि मैं इस घर को एक नया जीवन दूंगी,” कल्याणी देवी की आंखों में एक नई चमक थी। “मैं शांति कुंज के इस बड़े से दालान में एक ‘कला केंद्र’ खोलूंगी। मैं मोहल्ले की उन औरतों और लड़कियों को मुफ्त में पेंटिंग, सिलाई और हैंडीक्राफ्ट सिखाऊंगी जो कुछ … Read more

पुनर्जन्म 

“साहिल, तुमने कभी उस पुराने खंडहर को ध्यान से देखा है?” नीरा ने अचानक पूछा, अपनी कॉफी का कप टेबल पर रखते हुए। हम दोनों कैफे की खिड़की के पास बैठे थे। बाहर बारिश हो रही थी, वैसी ही बारिश जैसी उस दिन हो रही थी जब मैं पहली बार नीरा से मिला था। नीरा, … Read more

दोहरे मापदंड 

रास्ते भर सुमन का दिमाग उबलता रहा। उसे याद आया कि कल रात जब उसने राकेश से कहा था कि ‘आज बर्तन तुम धो दो, मेरी कमर दुख रही है’, तो राकेश ने साफ़ मना कर दिया था। “मैं मर्द हूँ सुमन, ये औरतों वाले काम मुझसे नहीं होते,” यह कहकर वह टीवी देखने बैठ … Read more

धुंधली आँखे

“बाबूजी, अब बहुत हो गया,” रवि ने गंभीर स्वर में कहा। “मैंने सिडनी में सब इंतज़ाम कर लिया है। मेरा घर बहुत बड़ा है, वहां पार्क है, इंडियन कम्युनिटी है। आप यहाँ अकेले इस टूटे हुए घर में कैसे रह रहे हैं? मुझे रात-रात भर नींद नहीं आती आपकी चिंता में। इस बार मैं आपको … Read more

स्वार्थी मैं ही हूँ

वंदना की आँखों से आंसू बह निकले, लेकिन इस बार ये गुस्से के नहीं, शर्मिंदगी के थे। उसे याद आया कि कैसे निलेश उसे रोक रहा था, कैसे सास ने कहा था कि ‘बेटा, अगर तुझे दिक्कत है तो हम साथ मिलकर करेंगे’, पर उसने किसी की नहीं सुनी। “माँ, मैंने बहुत बड़ी गलती कर … Read more

आस्था, अंधविश्वास और प्रेम की विजय

सुशीला देवी दरवाज़े के बाहर बैठी मंत्र जाप कर रही थीं, यह सोचकर कि वह अपनी बेटी का उद्धार कर रही हैं, जबकि असल में वह अपनी ही बेटी की हत्यारी बन रही थीं। उस दिन पल्लवी ने किसी तरह रोते हुए श्रुति से कहा था, “मुझे यहाँ से निकाल ले श्रुति, वरना मैं घुट-घुट … Read more

सार्थकता की छाँव

निहारिका जब लाल जोड़े में सजी, अपनी आँखों में अनगिनत सपने लिए सेठ रामनाथ जी के विशाल और भव्य बंगले ‘आशीर्वाद’ की चौखट पर पहुँची थी, तो उसके मन में एक अजीब सी घबराहट थी। मायके का वो मध्यमवर्गीय लेकिन खुला माहौल, जहाँ उसे हमेशा पढ़ने-लिखने और आगे बढ़ने की आज़ादी मिली थी, क्या इस … Read more

तपकर निखरता कुंदन

  ऑफिस से लौटते ही उसने अपना लैपटॉप बैग सोफे के एक किनारे पटका और बिना किसी से कुछ कहे, अपनी आँखें मूँद कर निढाल सा लेट गया। उसकी माँ, कल्याणी देवी, पास ही बैठी थीं और किसी से धीमी आवाज़ में बात कर रही थीं। रोहन का मन इतना उलझा हुआ था कि उसने ध्यान … Read more

रिश्तों की बुनियाद

पल्लवी ने अपने बच्चों को टोकने के बजाय रेवती से कहा, “भाभी, बच्चे तो वही कहेंगे न जो वो देखते हैं। हमारे घर में तो बाथरूम में भी एसी लगा है। खैर, मुझे आपसे और भैया से कुछ जरूरी बात करनी है।” शाम को चाय के समय जब पूरा परिवार एक साथ बैठा, तो पल्लवी … Read more

खामोश प्रीत का मुखर उपहार

 आज वह स्मृति रघुनाथ जी के सीने में किसी खंजर की तरह चुभ रही थी। “इस उम्र में क्या ज़रूरत है?” क्या प्यार और उपहार की कोई उम्र होती है? क्या सुमित्रा का मन नहीं करता होगा कि उसका पति भी उसे खास महसूस कराए? रघुनाथ जी की आँखों से पहली बार आँसू छलक पड़े। … Read more

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