पत्थर की छाँव में

बचपन से ही काव्या के लिए उसकी माँ, सुमित्रा, किसी तानाशाह से कम नहीं थीं। जहाँ दूसरी लड़कियाँ अपनी माँ के आँचल में छिपकर लाड़ लड़ाती थीं, उनके साथ सहेलियों की तरह बातें करती थीं, वहीं काव्या के हिस्से में सिर्फ नियम, अनुशासन और सख्त हिदायतें आई थीं। काव्या जब भी कोई नई फरमाइश करती, … Read more

फ़र्ज़ की बेड़ियाँ

शाम के धुंधलके ने अभी घर के आँगन में कदम ही रखा था कि तभी अंदर के कमरे से एक ज़ोरदार आवाज़ आई। मीरा दौड़कर अपनी सास, शांति देवी के कमरे में पहुँची। शांति देवी ज़मीन पर बेसुध पड़ी थीं। उनके हाथ से पानी का गिलास छूटकर टूट चुका था। मीरा की साँसें जैसे गले … Read more

रेशमी धागों की चुभन

लाल सुर्ख रंग, उस पर चमकता हुआ असली ज़री का सुनहरा काम और रेशम की वो मखमली छुअन… मालती की गोद में रखी वो बनारसी साड़ी किसी नवविवाहिता के सपनों जैसी हसीन लग रही थी। लेकिन मालती की आँखों से गिरते आंसुओं की अनवरत धारा उस रेशम पर गिरकर गहरे धब्बे बना रही थी। अभी … Read more

“हम सब साथ हैं” – लक्ष्मी कानोडिया ‘अनिका’

आगरा की व्यस्त गलियों के बीच, राजा मंडी में एक तीन मंज़िला पुराना लेकिन मजबूत घर था, जहां शर्मा परिवार कई पीढ़ियों से साथ रह रहा था। घर की सबसे ऊपरी मंज़िल पर दादी-जी रहती थीं—सफेद बाल, मुस्कुराती आँखें और कहानियों का खजाना। बीच वाली मंज़िल पर रमेश शर्मा, उनकी पत्नी काव्या और दो बच्चे—ध्रुव … Read more

चेहरे के ऊपर चेहरा रखती हो तुम बहू – मंजू ओमर

और भाई अम्मा कहां है दिखाई नहीं दे रही  हैं। अजय ने बड़े भाई विजय से पूछा, अरे वह अंदर है, वह देखो आ गई। अरे अजय आया है क्या आज। हां माँ बहुत दिन हो गए थे तुमसे मिले हुए तो आ गया तुमसे मिलने । अजय  और पत्नी सुमन ने झुक कर माँ  … Read more

वात्सल्य का नया सवेरा

शिखा ने एक गहरी सांस ली। “विकास, मैं पिछले कई हफ्तों से देख रही हूं कि माँ जी अंदर ही अंदर घुल रही हैं। वह रात-रात भर सोती नहीं हैं, कल रात भी ढाई बजे बरामदे में अकेली बैठी थीं। उनका खाना-पीना भी नाम मात्र का रह गया है। बाबूजी के अचानक चले जाने का … Read more

“अंधेरे में एक रौशनी”

शाम ढल चुकी थी, लेकिन घर के आंगन में पसरा सन्नाटा जैसे और भी गहरा होता जा रहा था। यह वही आंगन था जहाँ कुछ महीनों पहले तक बच्चों की किलकारियां, बड़ों की हंसी-ठिठोली और चाय की चुस्कियों के साथ दिन भर की बातें गूंजा करती थीं। लेकिन बाबूजी, यानी रामनाथ जी के अचानक हुए … Read more

असली पूँजी

“मौसा जी, आप देखिए इन चेहरों को। इनमें से कोई भी आज यहाँ रस्म अदायगी के लिए नहीं आया है। ये सब वो लोग हैं जिनके घरों का चूल्हा पापा की वजह से जला है, जिनकी ज़िंदगियां पापा ने बचाई हैं। मेरे बैंक अकाउंट में करोड़ों रुपये हैं, लेकिन मेरे मरने पर शायद ही कोई … Read more

दौलत का अंधापन

इस विचार मात्र से ही प्रकाश की रूह काँप उठी। उसे अपने बाबूजी के वो आखिरी शब्द याद आने लगे—’जब ठोकर लगेगी तब समझ आएगा’। आज उसे वो ठोकर लग चुकी थी। उसे समझ आ गया था कि जिस पेड़ से टूटकर वह खुद को आज़ाद समझ रहा था, असल में वह सूख रहा था। … Read more

ज़िंदगी की ढलती शाम

 निर्मला ने अपने पति को बड़े गौर से देखा। जैसे यह समझने की कोशिश कर रही हो कि यह आदमी आज अचानक यह कैसी बातें कर रहा है। फिर उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान तैर गई और वह एक समझदार मां की तरह बोली, “आपको सच में बहुत फुर्सत मिल गई है बैठे-बैठे। … Read more

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