रिश्ते कभी खून के मोहताज नहीं होते

 उस दिन वंदना ने पूरे मोहल्ले में, हर एक घर में जाकर शुद्ध देसी घी के मोदक और मिठाइयां बांटीं। जब पड़ोसनों ने पूछा, “अरे वंदना, आज किस बात की इतनी खुशी है? सतीश भाई साहब के ठीक होने की या किसी और बात की?” तो वंदना ने गर्व से सिर उठाकर, नम आँखों से … Read more

आँचल की ममता

 मयंक ने अपनी बहन को देखा और उसके गले लगकर छोटे बच्चे की तरह फूट-फूट कर रो पड़े, “नीरजा… देख ना क्या हो गया। तेरी भाभी ने आँखें नहीं खोली हैं कल से। डॉक्टर कह रहे हैं कि अगले चौबीस घंटे बहुत नाज़ुक हैं। अगर उसे कुछ हो गया तो मैं कैसे ज़िंदा रहूँगा? उसने … Read more

बड़ी बहू

 दीपावली के पावन पर्व पर, श्वेता अपनी एक साल की बेटी और निशांत के साथ ग्वालियर हवेली पहुँची। जानकी देवी अब काफी हद तक स्वस्थ थीं और अपने पैरों पर चलकर दरवाज़े तक आईं। श्वेता ने जब माँ के चरण छुए, तो जानकी देवी ने उसे सीने से लगा लिया। पर अगले ही पल श्वेता … Read more

सासू मां की लाल डायरी

  घर के मुख्य द्वार पर बंधे आम के पत्तों के तोरण और आंगन में बिखरे रंगोली के रंग नई नवेली दुल्हन के आगमन की गवाही दे रहे थे। दुल्हन बनकर आई थी अनन्या। रूप-रंग और संस्कारों में अनन्या जितनी परिपक्व थी, रसोई के काम-काज में उतनी ही कच्ची। पढ़ाई-लिखाई में हमेशा अव्वल रहने वाली अनन्या … Read more

रिश्तों की धूप

 उस रात मीरा जब सोने के लिए लेटी, तो उसका मन बहुत हल्का था। वह सोच रही थी कि हमारे समाज में सास-बहू के रिश्ते को हमेशा एक कलंक और नफरत के चश्मे से देखा जाता है। टीवी सीरियलों और समाज की बातों ने यह धारणा बना दी है कि एक सास कभी मां नहीं … Read more

ममता की तराजू

“वकील बाबू, आपने जो मसौदा तैयार किया है, उसे कल दोपहर ठीक बारह बजे लेकर आइएगा। मैं किसी भी तरह का विलंब नहीं चाहती। मेरी तबीयत का कोई ठिकाना नहीं और मैं जीते-जी यह सब कुछ निपटा देना चाहती हूँ।” दूसरी तरफ से वकील श्रीकांत जी की आवाज़ उभरी, जिसमें साफ़ तौर पर हिचकिचाहट और … Read more

पराई छत से अपने आँगन तक

चाँदी से चमकते बालों के बीच से झांकती माथे की लकीरें तब और भी गहरी हो जाती थीं, जब गौरी के सूखे होंठों पर अचानक कोई बेवजह की मुस्कान खिल उठती थी। चौंसठ बरस की उम्र में भी उसके भीतर जैसे कोई अल्हड़ बच्ची सांस ले रही थी। वह आँगन में बैठी मटर छीलते-छीलते खुद … Read more

मायके की अमानत और पराये होते अपने

“अरे अवनि, क्या बात है? जब से छोटी दीदी मानसी के घर से लौटकर आई हो, तुम्हारे चेहरे पर बारह क्यों बजे हुए हैं? रास्ते में भी तुमने एक शब्द नहीं बोला और घर आकर भी गुमसुम बैठी हो। आखिर हुआ क्या है वहां?” प्रणव ने अपने ऑफिस के जूते उतारते हुए और टाई ढीली … Read more

दो माओं का आंगन

 शारदा जी का मन बहुत भारी और बेचैन था। सामने मेज पर उनका खुला हुआ सूटकेस रखा था, जिसमें वह आधे-अधूरे मन से अपनी साड़ियां तह करके रख रही थीं। तभी फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर ‘नेहा’ नाम चमक रहा था। शारदा जी ने एक गहरी सांस ली और फोन उठाया। “मां, आपने अपनी … Read more

रिश्तों की गर्माहट

“अम्मा जी, जरा अपनी आँखें तो खोलिए… देखिए आज हमारे आंगन में कौन आया है,” मृदुला ने अपनी सासू माँ सावित्री देवी के कमरे का पर्दा हटाते हुए बेहद चहकते हुए स्वर में कहा। सावित्री देवी, जो अपनी आरामकुर्सी पर बैठी माला जप रही थीं, उन्होंने अपनी झुर्रियों भरी आँखों पर मोटे फ्रेम का चश्मा … Read more

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