नया आँगन, वही ममता
राधिका जब भी मायके जाने के लिए तैयार होती, तो उसकी आँखों में एक अलग ही चमक होती थी। सुमित्रा जी खुद उसके लिए मिठाइयाँ और शगुन के कपड़े पैक करवातीं। “जा बेटा, कुछ दिन अपनी माँ के लाड़-प्यार में जी ले। यहाँ तो ज़िम्मेदारियाँ ही ज़िम्मेदारियाँ हैं,” सुमित्रा जी हँसते हुए कहतीं। और जब … Read more