दहलीज की धूप

 “नहीं देवांश, मुझे आज अपनी बात पूरी करने दीजिए,” अवनि ने हाथ उठाकर बहुत शांति से अपने पति को रोका। फिर वह दीनानाथ जी की आँखों में आँखें डालकर बोली, “बाबूजी, आपने मुझे हमेशा बेटी कहा, लेकिन मुझे कभी उस बेटी जैसा अधिकार नहीं दिया जो आपकी विरासत को आगे बढ़ा सके। आपने मुझे एक … Read more

सात फेरों से परे एक नई सुबह

अनिमेष ने ऋचा  के आंसुओं को पोंछा और बड़े संयम से कहा, “ऋचा , पलायन किसी समस्या का समाधान नहीं है। नौकरी छोड़ना तुम्हारी मेहनत और तुम्हारी पहचान का अपमान होगा। मां गलत नहीं हैं, बस उनका दृष्टिकोण उस युग में गढ़ा गया है जहां औरतें केवल चारदीवारी में रहती थीं। हमें उनसे लड़कर नहीं, … Read more

रिश्तों की अनकही धूप-छांव

 देवेन्द्र ने अपमान से बचने का एक ही रास्ता निकाला था—मौन। उन्होंने धीरे-धीरे बोलना ही बंद कर दिया था। वह केवल उतना ही बोलते जितना बेहद जरूरी होता। कादम्बरी का मूड देखकर ही कमरे में कदम रखते। कई बार उन्होंने हाथ जोड़कर कादम्बरी से कहा भी, “कादम्बरी, जिंदगी की शाम हो चुकी है। अब तो … Read more

आँगन की गूंज: एक अनमोल वसीयत

 देवकी जी के झुर्रीदार गालों पर आँसुओं की धारा बह निकली। रुंधे हुए गले से उन्होंने बताया कि आकाश दुबई में एक नई बहुराष्ट्रीय कंपनी शुरू करना चाहता है और इसके लिए उसे करोड़ों रुपयों की सख्त जरूरत है। आकाश ने उन्हें फोन करके एक तरह का अल्टीमेटम दे दिया था कि ‘आनंदमयी’ जैसे बड़े … Read more

अपना पराया

 घर के इस तनाव का सबसे आसान और मूक शिकार बना माधव। सरिता को लगता था कि घर के सारे संकटों की जड़ माधव ही है। “यह दिन भर खाता है, कपड़े गंदे करता है, कभी नल खुला छोड़ देता है तो कभी बर्तन तोड़ देता है! इसके इलाज और दवाओं में हर महीने दो-तीन … Read more

घर की धड़कन

अनामिका की आँखों से पश्चाताप के आँसू बह निकले। उसने रुंधे गले से कहा, “भाभी, हमें माफ कर दीजिए। हम अपनी डिग्रियों और नौकरियों के अहंकार में अंधी हो गई थीं। हम सोचते थे कि सिर्फ पैसा कमाना ही सबसे बड़ी योग्यता है। पर आज आपने हमारी आँखें खोल दीं। हम कुछ घंटे भी इस … Read more

जब घर फिर से मुस्कुरा उठा

 मानस ने उसके आँसू पोंछे और कहा, “तू नकारा नहीं है समर्थ। तू तो हम सबमें सबसे ज्यादा संवेदनशील है। ज़िंदगी में ठोकरें सबको लगती हैं। कल से हम दोनों मिलकर तेरे विषयों की पढ़ाई शुरू करेंगे। मैं देखता हूँ कि तू कैसे पास नहीं होता!” समर्थ के दिल से जैसे कई मन का बोझ … Read more

आँगन में धूप की दस्तक

उस मासूम बच्ची के इन भोले शब्दों ने सुभद्रा जी के संयम का बाँध तोड़ दिया। वे वहीं सोफे पर बैठ गईं और फूट-फूटकर रोने लगीं। उनके हाथ-पांव सुन्न पड़ गए थे। उन्हें लग रहा था कि यह सांसें यहीं थम जाएंगी। जिस घर में अभी-अभी हँसी की गूँज थी, वहाँ फिर से वही अंतहीन, … Read more

दिल के रिश्ते

  “बाबूजी, आप हमसे नाराज हो लीजिए, हमें डांट लीजिए, लेकिन भगवान के लिए अब अपनी यह जिद छोड़ दीजिए। अगर कल रात माँ को कुछ हो जाता, तो हम जिंदगी भर खुद को माफ नहीं कर पाते। हमारा यह सारा पैसा, यह पद, यह प्रतिष्ठा किस काम की, अगर हम अपने माँ-बाप के काम ही … Read more

स्मृतियों का आंगन

सुमन ने जब से होश संभाला था, अपने छोटे भाइयों, आलोक और सुमित के लिए वह बहन कम और माँ ज्यादा थी। माता-पिता के असमय निधन के बाद, सुमन ने अपनी पढ़ाई और अपनी खुशियों को ताक पर रखकर दोनों भाइयों को पाला। जब सुमन की शादी राजीव से हुई, तो उसे लगा कि भाइयों … Read more

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