चौखट का मोह

“मुझे माफ़ कर दो मेरे बच्चों…” गजेंद्र बाबू का गला रुंध गया। “मैं अपनी झूठी ठसक और इस मिट्टी के मोह में अंधा हो गया था। मैं भूल गया था कि ज़िंदगी का असली सुख चारदीवारी में नहीं, अपनों की बाहों के घेरे में होता है। आज इस मकान का मोह खत्म हुआ। अब हम … Read more

रिश्तों की डोर

 पति-पत्नी के रिश्ते में काहे की हेकड़ी और कैसी अकड़ दीदी? झुकने से अगर अपना घर बचता है, तो झुक जाना कोई हार तो नहीं होती।” तुलसी के इन सीधे, अनगढ़ और ठेठ शब्दों ने अवनि के कानों में पिघले हुए शीशे की तरह असर किया। अवनि अवाक रह गई। वह कुर्सी पर वापस बैठ … Read more

 ममता की छांव

पापा! मम्मी! देखो हम सब आ गए! सबसे आगे पल्लवी, वैशाली, तन्वी, हिमानी और चारु जैसी वे बेटियां थीं, जिनका कन्यादान मनसुख भाई ने पहले किया था। उनके चेहरों पर मायके आने की वही रौनक और खिलखिलाहट थी, जो किसी भी लाडली बेटी के चेहरे पर होती है। उनके पीछे उनके पति यानी मनसुख भाई … Read more

बाबुल की छांव और सौ खुशियां

सूरत के तापी नदी के किनारे बने एक भव्य रिसॉर्ट में सुबह से ही चहल-पहल अपने चरम पर थी। चारों तरफ पीले गेंदे और सफेद चमेली के ताजे फूलों की महक फैली हुई थी। मंडप के बीचों-बीच लगे विशाल शामियाने में लगभग इक्यावन छोटे-छोटे वेदी कुंड सजाए जा रहे थे। हर वेदी के सामने पीतल … Read more

अपना–पराया

इस खूबसूरत जिंदगी में हजारों मोड़ आते हैं, ना जाने किस मोड़ पर किस अजनबी से मुलाकात हो जाए। कभी-कभी इन अपने-पराया से इतना खुशी मिल जाती है कि संभाले नहीं संभलती और कभी कभी ऐसा गम जो सिर्फ दर्द का एक रिश्ता बन कर रह जाता है। ठेकेदार ने जोर जोर से शारदा को … Read more

ममता की रिहाई

“एक मां ने अपनी ही कोख से जन्मी औलाद को बेहतर भविष्य के नाम पर दूसरों की गोद में सौंप दिया, पर जब वही बेटी जिंदगी और मौत की दहलीज पर खड़ी होकर अपनी मां का आंचल तलाशने लगी, तब जो सच सामने आया उसने रूह कंपा दी…” हॉस्पिटल के आईसीयू वार्ड में मशीनों की … Read more

बंधन या सुकून?

“मैं यह क्या कर बैठा…” अंकुर की आंखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। वह ज़मीन पर घुटनों के बल बैठ गया और बच्चों की तरह फफक-फफक कर रोने लगा। “राधिका! हमने क्या कर दिया? वो आज़ादी किस काम की जो हमें अपने ही भगवान जैसे मां-बाप से अलग कर दे? हम इतने अंधे कैसे … Read more

ममता का दूसरा जन्म

साढ़े तीन साल का नन्हा कबीर अपने छोटे-छोटे हाथों में लकड़ी की टूटी हुई रेलगाड़ी लिए बैठक के कोने में चुपचाप बैठा था। उसके मासूम चेहरे पर गहरी असमंजस की लकीरें खिंची हुई थीं। दरवाजे की चौखट पर उसके पिता आलोक खड़े थे और उनके साथ एक शांत, सौम्य चेहरे वाली स्त्री खड़ी थी, जिसकी … Read more

एक भाई का निस्वार्थ प्रेम

उनकी कराहने की आवाज़ सुनकर बगल के कमरे से चंद्रकांत भैया उठकर आ गए। उन्होंने सूर्यकांत का तड़पता हुआ चेहरा देखा तो उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें खिंच गईं। बिना एक शब्द कहे भैया सीधे रसोई में गए। उन्होंने सरसों के तेल में लहसुन डालकर उसे हल्का गर्म किया। फिर वो वापस आए, सूर्यकांत … Read more

रिश्तों की जमा-पूंजी

“भाई साहब, अगले ही दिन मैंने छुट्टी ली और अपनी पत्नी सरिता के मायके पहुंच गया। वो मुझे देखकर बहुत हैरान और नाराज थी। उसने मुझसे बात तक नहीं की। जब वो खाना खाने बैठी, तो मैं चुपचाप उसके पास जाकर बैठ गया। मैंने उसकी प्लेट से एक रोटी उठाई और कहा, ‘क्या जिंदगी भर … Read more

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