ममता की तराजू: पच्चीस साल बनाम एक महीना

शालिनी का मन आज सुबह से ही एक अजीब सी बेचैनी और उदासी के भंवर में गोते खा रहा था। घर का हर कोना उसे काटने को दौड़ रहा था। आज उसकी इकलौती बेटी काव्या की शादी को ठीक एक महीना पूरा हो गया था। यह एक महीना शालिनी के लिए किसी युग के बीतने … Read more

खामोश समझौते: एक बेटी की अनकही चिट्ठी

आज आसमान में काले बादल घिरे हुए थे और हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। जब भी मौसम ऐसा होता है, काव्या के मन के किसी गहरे कोने में दबी हुई यादें ताज़ा हो जाती हैं। खिड़की के पास खड़ी काव्या के हाथ में एक पुरानी तस्वीर थी—उसके बाबूजी की। पच्चीस साल बीत गए थे बाबूजी … Read more

कांच के रिश्ते और सपनो की गुल्लक

मेरे बचपन की यादें मेरी माँ की साड़ी के पल्लू और उनके हाथों से बने गाजर के हलवे की खुशबू से जुड़ी थीं। जब तक माँ थीं, हमारा घर एक घर था। पिताजी दफ्तर से आते, तो पूरा घर उनकी हंसी से गूंज उठता था। लेकिन मेरे चौदहवें जन्मदिन से ठीक दो महीने पहले, एक … Read more

उम्मीदों के नए रंग

सुबह की पहली किरण के साथ ही घर में बर्तनों की खटपट शुरू हो गई थी। चौंतीस वर्षीय सुमन अपनी दाईं ओर हल्का सा झुककर चलती हुई रसोई की तरफ बढ़ रही थी। बचपन में पोलियो का शिकार होने के कारण उसके पैर में जो लचक आ गई थी, वह उम्र के साथ और भी … Read more

खामोश दीवारें और सुलगते जज़्बात

“मैडम जी, दरवाज़ा तो खोलिए, कितनी देर से आवाज़ लगा रही हूँ!” कामवाली शांता की ऊँची आवाज़ सुनकर अंजलि जैसे किसी गहरे सपने से जागी। उसने झटके से अपने आँसू पोंछे, चेहरे पर एक बनावटी मुस्कान लाई और जाकर दरवाज़ा खोल दिया। पुणे के एक बेहद पॉश इलाके में बने उस आलीशान विला को बाहर … Read more

सपनों की राख और गृहस्थी की बेड़ियाँ

“मैंने तो तुझे पहले ही आगाह किया था विकास! यह लड़की सिर्फ तेरे पैसों पर ऐश करना जानती है। पढ़ाई-लिखाई तो बस एक बहाना है काम से बचने का। अगर सच में इसने किताबें खोली होतीं, तो आज इसका यह हाल न होता। तू ही अपनी पत्नी के मोह में अंधा हो गया था। अब … Read more

अधूरी कोख, मुकम्मल ममता

नंदिनी की उम्र बत्तीस साल हो चुकी थी और उसने यह मान लिया था कि उसकी ज़िंदगी की किताब में ‘परिवार’ नाम का पन्ना कभी नहीं जुड़ेगा। पुणे शहर की एक पुरानी और शांत कॉलोनी में पली-बढ़ी नंदिनी हमेशा से एक भरा-पूरा परिवार चाहती थी। लेकिन ज़िंदगी हमेशा वैसी नहीं होती जैसी हम उसे ख्यालों … Read more

आँगन का गुलमोहर

“बाबा, आप बिल्कुल मत घबराइए। मैं अभी के अभी वहाँ के लिए निकल रही हूँ। किसी की हिम्मत नहीं है जो हमारी नंदिनी को हाथ भी लगा सके। आप बस हौसला रखिए,” राधिका ने दृढ़ स्वर में कहा। उसने तुरंत ऑफिस से छुट्टी ली, अपनी कार निकाली और मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे होते हुए सातारा की ओर … Read more

वो अनचाही नेमत: एक बेटी का वजूद

“माँ! ओ माँ! कहाँ हो आप? जल्दी से बाहर आइए, मेरा शुभ मुहूर्त निकला जा रहा है। आज मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा दिन है, मुझे अपने हाथों से दही-चीनी खिलाकर विदा कीजिए।” घर के आंगन में गूंजती यह चहकती हुई आवाज़ डॉ. नव्या की थी। रसोई से अपने पल्लू में हाथ पोंछती हुई सुमित्रा … Read more

खामोशी की दरारें

दीवार पर टंगी घड़ी की टिक-टिक आज विकास को हथौड़े की चोट जैसी लग रही थी। वह डाइनिंग टेबल के एक छोर पर बैठा अखबार के पन्नों में उलझने का नाटक कर रहा था, और ठीक उसके सामने बैठी नीता बिना कोई आवाज़ किए अपने कप की चाय खत्म कर रही थी। दोनों के बीच … Read more

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