देहरी की सूनी आस

 रात को घर पहुंचकर स्नेहा ने सूटकेस से कपड़े वापस निकालने शुरू किए। रिया ने मासूमियत से पूछा, “मम्मा, हम नानी के घर कब जाएंगे?” स्नेहा ने अपने आंसू छुपाते हुए उसे गले से लगा लिया और कहा, “इस बार नहीं बेटा, अगले साल जरूर जाएंगे।” लेकिन सबसे मुश्किल काम था बनारस फोन करना। स्नेहा … Read more

कर्मों का खाता: एक अनकही उधारी

कैलाश की आँखों में भी अब आंसू आ गए थे। उनके चेहरे पर एक संतोष भरी मुस्कान थी। आदित्य ने कहा, “मैंने रोते हुए आपके पैर पकड़ लिए थे और खुशी के मारे आपको पच्चीस हजार रुपये इनाम के तौर पर देने चाहे थे। मेरे पास शब्द नहीं थे। लेकिन काका, क्या आपको याद है … Read more

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