अंगूठे से हस्ताक्षर तक

 “बाबूजी, यह आपकी बड़ी बहू की सरकारी नौकरी का नियुक्ति पत्र है। यह किसी धोखे का कागज नहीं है, यह उसकी चौदह साल की तपस्या और आपके बेटे के विश्वास की जीत है।” प्रभाकर जी की आवाज़ में एक ऐसा ठहराव और गरिमा थी कि कमरे का माहौल एकदम बदल गया। ससुर जी ने चौंककर … Read more

संस्कारों की बेड़ियाँ

 अवंतिका ने अपने पिता के आँसू पोंछते हुए बहुत ही सौम्यता से कहा, “बाबूजी, आपको माफी मांगने की ज़रूरत नहीं है। आपने मुझे जो संस्कार दिए थे, मैं उनके खिलाफ कभी नहीं थी। लेकिन मुझे यह समझ आ गया कि त्याग का अर्थ खुद को मिटा देना नहीं होता। अगर कोई स्त्री अपने हिस्से का … Read more

रेत की दीवारें

 “आठ लाख रुपये? क्या पागलपन है! माँ, आपको समझ भी आता है कि आठ लाख होते क्या हैं? इस उम्र में इतनी बड़ी सर्जरी का कोई तुक है? अगर ऑपरेशन के बाद भी आप चलने लायक नहीं हुईं तो? सारा पैसा पानी में बह जाएगा। आजकल डॉक्टर सिर्फ बिल बनाने के लिए सर्जरी की सलाह … Read more

आत्मसम्मान की दहलीज

 मास्टर जी और रघुवीर सिंह ने किसी तरह अवनि को सहारा दिया और उसे लेकर उसके घर पहुंचे। अवनि के पिता दीनानाथ और मां यशोदा अपनी लाडली बेटी की यह हालत देखकर सुध-बुध खो बैठे। घर में कोहराम मच गया। अवनि मां के सीने से लगकर फूट-फूटकर रोने लगी। पिता का दिल टुकड़े-टुकड़े हो गया। … Read more

उड़ान अभी बाकी है

 झूले को देखते ही कौशल्या का दिल मचल उठा। उनके भीतर छिपी वह दस साल की नटखट बच्ची अचानक जाग उठी। बचपन में सावन के झूले, जब वह सखियों के साथ आसमान छूने की होड़ लगाती थीं। उन्होंने इधर-उधर देखा। कोई उनकी तरफ ध्यान नहीं दे रहा था। उनके होठों पर एक शरारती मुस्कान बिखर … Read more

स्वाभिमान की महक

तान्या ने माँ के दोनों हाथ अपने हाथों में थाम लिए। उसकी आँखों में गुस्सा और दर्द दोनों साफ झलक रहे थे। “मम्मी, आखिर कब तक? कब तक आप इस घर में एक बेनाम मजदूर की तरह जीती रहेंगी? क्या आपकी अपनी कोई पहचान नहीं है? क्या आपका अपना कोई सम्मान नहीं है? आप क्यों … Read more

देवी का सच्चा दरबार

 वंदना ने झुककर एक-एक बच्ची के नन्हे-मुन्ने पाँव पीतल की परात में रखे, अपने हाथों से गंगाजल से उनके चरण धोए, उन पर महावर और रोली का लेप लगाया और झुककर उनके पाँव छुए। उन बच्चियों के चेहरों पर जो निश्छल, पवित्र और बेदाग आनंद था, वह किसी भी सांसारिक वैभव से परे था। बच्चियों … Read more

साक्षात देवी के चरण

रंजना ने शिखा के कंधे पर हाथ रखते हुए बेहद आत्मीयता से समझाया, “शिखा, ईश्वर ने न कोई जाति बनाई है, न कोई वर्ण। मां भगवती किसी कुल या अमीरी-गरीबी की मोहताज नहीं हैं। जहां अभाव है, जहां भूख है, वहीं सेवा का सच्चा अर्थ है। जो पहले से ही तृप्त हैं, उन्हें और खिलाना … Read more

ज़िंदगी का असली सुकून

अचानक काव्या के मन का सारा मलाल, सारा गुस्सा और सारी मायूसी एक झटके में कहीं बह गई। उसे लगा जैसे किसी ने उसके तपते हुए मन पर सुकून की ठंडी फुहार डाल दी हो। जिस नौकरी को वह कुछ घंटों पहले एक बोझ समझ रही थी, आज उसी ने उसे वो खुशी दी थी … Read more

‘फर्ज’ और ‘हक’

सुमेधा ने हंसते हुए कहा, “दीदी, आप ‘फर्ज’ और ‘हक’ को अपनी सुविधानुसार नहीं चुन सकतीं। अगर बेटा ‘श्रवण कुमार’ बनकर सारे दुख और कर्ज ढोए, तो बेटी सिर्फ ‘लक्ष्मी’ बनकर पैसा लेकर नहीं जा सकती। अगर आप मॉडर्न जमाने की बात करती हैं और कानून का सहारा लेती हैं, तो कानून यह भी कहता … Read more

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