बेटी जैसा अधिकार

 सुरभि की आंखें भर आईं। आलोक जी ने आगे समझाया, “तुम्हारी माँ ने तुम्हें बड़े नाजों से पाला है। व्रत रखना या न रखना तुम्हारी अपनी व्यक्तिगत आस्था और मर्जी का विषय है। हमारे घर में कोई ऐसी बंदिश नहीं है कि तुम्हें अपनी सेहत की आहुति देकर परंपराएं निभानी पड़ें। तुम्हारी सासु माँ और शालिनी को सालों का अभ्यास है, वे अपनी क्षमता जानती हैं। लेकिन तुम अपनी सीमा से बाहर जाकर केवल दूसरों को खुश करने के लिए यह सब मत करो। भगवान कभी यह नहीं कहते कि उनके बच्चे भूखे रहकर तड़पें।”

  सुरभि का विवाह चार महीने पहले ही रोहन के साथ हुआ था। दोनों परिवारों की रजामंदी और भव्य समारोह के साथ यह विवाह बड़े ही उत्साह से संपन्न हुआ था। रोहन एक बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर था और उसकी पोस्टिंग पुणे में थी। शादी के तुरंत बाद सुरभि अपने पति के साथ पुणे चली गई थी, जहाँ दोनों ने अपने सपनों का एक छोटा सा आशियाना सजाना शुरू ही किया था।

शादी के शुरुआती दिन किसी हसीन सपने जैसे बीत रहे थे। नया शहर, नया घर और रोहन का बेशुमार प्यार। ससुराल से दूर रहने के कारण सुरभि को कभी उस पारिवारिक झिझक या डर का अहसास ही नहीं हुआ था, जो अक्सर हर नई दुल्हन को अपने ससुराल के बड़े-बुजुर्गों के सामने होता है। शादी के समय भी रोहन के माता-पिता, उसके बड़े भाई यानी जेठ आलोक जी और जेठानी शालिनी भाभी केवल कुछ ही दिनों के लिए शादी की रस्में निभाने आए थे और सब बहुत सुलझे हुए लगे थे। लेकिन एक छत के नीचे लंबे समय तक रहने का अनुभव सुरभि के लिए बिल्कुल नया होने वाला था।

अचानक एक दिन रोहन के दफ्तर से सूचना आई कि उसे छह महीने के लिए कंपनी के विशेष प्रोजेक्ट पर जर्मनी जाना होगा। यह उसके करियर के लिए बहुत बड़ा अवसर था, जिसे ठुकराया नहीं जा सकता था। स्वाभाविक रूप से योजना यही बनी कि सुरभि भी उसके साथ जाएगी। लेकिन जब कागजी कार्रवाई शुरू हुई, तो एक बड़ी अड़चन सामने आ गई। सुरभि के पासपोर्ट पर उसका मायके का नाम और पुराना पता दर्ज था। विवाह के बाद नाम परिवर्तन और पते के नवीनीकरण के लिए आवेदन तो कर दिया गया था, लेकिन पुलिस सत्यापन और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के चलते नया पासपोर्ट और वीजा मिलने में कम से कम दो से तीन महीने का वक्त लगना तय था।

रोहन के पास इंतजार करने का समय नहीं था, उसे अगले ही हफ्ते रवाना होना था। ऐसे में सुरभि को पुणे के उस फ्लैट में अकेले छोड़ना किसी को मंजूर नहीं था। आपसी बातचीत के बाद यह तय हुआ कि सुरभि पहले एक महीना अपने मायके जबलपुर में बिता लेगी और उसके बाद जब तक उसका पासपोर्ट और वीजा का काम पूरा नहीं हो जाता, वह ग्वालियर में अपने ससुराल ‘आनंद कुंज’ में रहेगी। रोहन ने उसे ढांढस बंधाते हुए कहा था, “चिंता मत करो सुरभि, माँ, भैया और भाभी बहुत अच्छे हैं। तुम्हें वहां बिल्कुल अपने घर जैसा लगेगा।”

मायके का एक महीना तो मां की ममता और पापा के लाड़-प्यार में पलक झपकते ही बीत गया। लेकिन जैसे ही ग्वालियर जाने की तारीख नजदीक आई, सुरभि के दिल की धड़कनें तेज होने लगीं। एक अनजान सा डर उसके मन में समा गया था। उसने अक्सर अपनी सहेलियों से ससुराल के सख्त कायदे-कानूनों, सास के कड़े अनुशासन और जेठानी-देवरानी के बीच की खींचतान के किस्से सुन रखे थे। ऊपर से रोहन भी साथ नहीं था, जो किसी भी असहज स्थिति में उसका ढाल बन सकता। वह बिल्कुल अकेली ससुराल जा रही थी।

जब सुरभि ग्वालियर रेलवे स्टेशन पर उतरी, तो उसके जेठ आलोक जी खुद उसे लेने स्टेशन पहुंचे थे। आलोक जी घर में सबसे बड़े बेटे थे, गंभीर, सुलझे हुए और बेहद जिम्मेदार। उन्होंने सुरभि का सूटकेस गाड़ी में रखा और मुस्कुराते हुए पूछा, “सफर में कोई परेशानी तो नहीं हुई छोटी बहू? रोहन से बात हुई थी, वो कह रहा था कि तुम रास्ते में ज्यादा सोती नहीं हो।”

आलोक जी की इस सहजता ने सुरभि के मन का बोझ थोड़ा हल्का किया, लेकिन ससुराल की चौखट पर कदम रखते ही उसकी धड़कनें फिर बढ़ गईं। घर में प्रवेश करते ही उसकी सास जानकी देवी ने उसे प्यार से गले लगाया और आरती उतारकर स्वागत किया। जेठानी शालिनी भाभी, जो उम्र में सुरभि से करीब पांच-छह साल बड़ी थीं, तुरंत ठंडे पानी का गिलास और शिकंजी लेकर आ गईं। उनके दो प्यारे बच्चे, आरव और मिष्टी, भी अपनी नई चाची के इर्द-गिर्द घूमने लगे। पहले दो दिन तो औपचारिकता और आवभगत में बहुत अच्छे से कट गए। सबने सुरभि को पूरा आराम दिया, लेकिन सुरभि के मन में एक अनजानी झिझक अभी भी बनी हुई थी। वह हर कदम फूंक-फूंक कर रख रही थी ताकि कोई यह न कह सके कि नई बहू में सलीका नहीं है।

तीसरे दिन घर में एक खास माहौल था। भाद्रपद का महीना चल रहा था और जानकी देवी तथा शालिनी भाभी ने लगातार दो दिनों का निर्जला-फलाहारी उपवास रखने का संकल्प लिया हुआ था। यह परिवार की कुल परंपरा का हिस्सा था। शाम को जब शालिनी भाभी पूजा की तैयारी कर रही थीं, तो सुरभि ने धीरे से कहा, “भाभी, अगर आप कहें तो कल से मैं भी यह व्रत रख लूँ? मायके में भी माँ यह व्रत करती थीं, तो मुझे थोड़ा बहुत नियम पता है।”

शालिनी भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा, “अरे सुरभि, तुम अभी नई-नई आई हो। सफर की थकान भी होगी। यह व्रत थोड़ा कठिन होता है, दो दिन का नियम रहता है। तुम परेशान हो जाओगी।”

लेकिन सुरभि को लगा कि अगर वह व्रत नहीं रखेगी, तो शायद सास और जेठानी यह न सोचें कि नई पीढ़ी की लड़कियां धर्म-कर्म से भागती हैं या आरामपसंद हैं। उसने जिद करते हुए कहा, “नहीं भाभी, मुझे कोई परेशानी नहीं होगी। मैं भी आप दोनों के साथ व्रत करूंगी।” जानकी देवी ने उसकी इस भावना को देखकर उसे आशीर्वाद दिया।

अगले दिन सुबह चार बजे ही घर में हलचल शुरू हो गई। सुरभि भी बिना किसी के जगाए बिस्तर छोड़कर उठ गई। उसने ठंडे पानी से स्नान किया, सुंदर सूती साड़ी पहनी और पूजा घर की सफाई में जुट गई। जानकी देवी और शालिनी भाभी के साथ मिलकर उसने विधि-विधान से पूजा संपन्न की। इसके बाद दोनों बहुएं पास के प्राचीन शिव मंदिर में दर्शन करने गईं। मंदिर में काफी भीड़ थी, कतार में खड़े-खड़े और नंगे पांव चलते-चलते सुरभि के पैर दुखने लगे थे।

सुबह के नौ बज चुके थे जब वे लौटकर घर आईं। सुरभि की आदत सुबह आठ बजे तक भरपूर नाश्ता और चाय लेने की थी। उसका सिर धीरे-धीरे भारी होने लगा था, लेकिन उसने चेहरे पर शिकन तक नहीं आने दी। मंदिर से आने के बाद आराम करने का कोई सवाल ही नहीं था। रसोई में पूरे परिवार के लिए और फिर व्रतधारियों के लिए फलाहार तैयार करने का काम शुरू हुआ। शालिनी भाभी साबूदाने की खिचड़ी, सिंघाड़े के आटे की पूरियां, उबले आलू की सब्जी और समा के चावल की खीर बनाने में व्यस्त हो गईं। सुरभि भी उनके साथ खड़ी होकर आलू छीलने, कूटू का आटा छानने और बर्तन समेटने में हाथ बंटाने लगी।

रसोई की गर्मी और लगातार खड़े रहने से सुरभि का शरीर टूटने लगा था। दोपहर के डेढ़ बज चुके थे। पेट में भूख की वजह से मरोड़ उठ रही थी और गला सूखकर कांटा हो रहा था। बीच में जानकी देवी ने रसोई में आकर देखा तो कहा, “सुरभि बेटा, तूने पहली बार इतना लंबा उपवास रखा है। जा, फ्रिज में सेब और अनार रखे हैं, थोड़े से काटकर खा ले। शालिनी तो अभ्यस्त है, तू भूखी मत रह।”

सुरभि ने संकोचवश शालिनी भाभी की तरफ देखा। शालिनी भाभी पसीने में तरबतर होकर पूरियां तल रही थीं और उन्होंने अभी तक पानी की एक बूंद भी नहीं पी थी। सुरभि के मन में संकोच की दीवार खड़ी हो गई। उसने सोचा, ‘जब घर की बड़ी बहू भूखी रहकर काम कर रही है, तो मैं छोटी होकर पहले कैसे खा सकती हूँ? लोग क्या कहेंगे कि सास के कहते ही फल खाने बैठ गई, जरा सा भी सब्र नहीं है।’ उसने मुस्कुराते हुए सास से कह दिया, “नहीं मम्मी जी, मुझे अभी भूख नहीं है। भाभी का काम खत्म हो जाए, फिर हम साथ में ही फलाहार करेंगे।”

दोपहर के करीब ढाई बजे सारा फलाहार बनकर तैयार हुआ। सबसे पहले डाइनिंग टेबल पर ससुर जी, जेठ आलोक जी और दोनों बच्चों को परोसा गया। सुरभि और शालिनी दोनों पंखा झलते हुए और गरम पूरियां परोसते हुए सबकी सेवा में लगी रहीं। आलोक जी दफ्तर के काम से लैपटॉप पर कुछ देख रहे थे, लेकिन उनकी नजरें लगातार सुरभि के उतरे हुए चेहरे और उसकी लड़खड़ाती चाल को भांप रही थीं। जब सबने खा लिया, बर्तन समेटे गए, तब कहीं जाकर दोपहर के सवा तीन बजे सुरभि और शालिनी भाभी के हिस्से में फलाहार की थाली आई। भूख के मारे सुरभि का बुरा हाल था, लेकिन संकोच के कारण वह ठीक से खा भी नहीं पाई और थोड़ा सा साबूदाना खाकर ही उठ गई।

जैसे-तैसे वह दिन बीता। रात को जब सुरभि अपने कमरे में गई, तो थकान और कमजोरी से उसका बदन टूट रहा था। उसे अपने मायके की बहुत याद आने लगी। मायके में जब भी वह कभी एकादशी या सावन का व्रत रखती थी, तो उसकी माँ सुबह ही बादाम वाला दूध उसके सिरहाने रख देती थी। हर दो घंटे में माँ कभी मौसमी का जूस, कभी मखाने की खीर तो कभी ताजे फल लेकर उसके कमरे में आ जाती थी और लाड़ से कहती थी, “मेरी गुड़िया भूखी नहीं रह सकती, पूजा भगवान मन से देखते हैं, भूखे रहकर देह को कष्ट देना भक्ति नहीं है।” लेकिन यहाँ तो पराया आँगन था, मर्यादाओं का पहरा था और मन में अनगिनत हिचकिचाहटें थीं। वह खुद से फ्रिज खोलकर एक फल भी निकालने का साहस नहीं जुटा पा रही थी। उसने रोहन को फोन लगाया, लेकिन उसका फोन नेटवर्क क्षेत्र से बाहर था। सुरभि ने आंसुओं को पल्लू में समेटा और भूखे पेट ही सो गई।

अगली सुबह व्रत का दूसरा दिन था। सुरभि जब सोकर उठी, तो उसका सिर चकरा रहा था और आंखों के आगे हल्का सा अंधेरा छा रहा था। फिर भी उसने खुद को संभाला, चेहरे पर पानी के छींटे मारे और रोज की तरह सुबह जल्दी उठकर स्नान कर लिया। घर के मंदिर में पूजा की और फिर शालिनी भाभी के साथ मंदिर की ओर चल पड़ी। मंदिर से लौटते वक्त उसके कदम डगमगा रहे थे।

घर पहुंचते ही वह रसोई की ओर बढ़ने लगी ताकि नाश्ते और फलाहार की तैयारी कर सके। तभी बैठक में अखबार पढ़ रहे जेठ आलोक जी ने उसे आवाज दी, “सुरभि, जरा इधर आना बेटा।”

सुरभि सहम गई। उसने सोचा कि शायद उससे कोई भूल हो गई है या कल के किसी काम में कोई कमी रह गई थी। वह सिर पर पल्लू ठीक करते हुए धीरे-धीरे बैठक में गई और नजरें झुकाकर खड़ी हो गई, “जी जेठ जी?”

आलोक जी ने अखबार एक तरफ रखा और बहुत ही आत्मीय, शांत और बड़े भाई जैसे स्नेह भरे स्वर में बोले, “सुरभि, इधर सोफे पर बैठो।”

सुरभि संकोच में पड़ गई, “नहीं जेठ जी, मैं ठीक हूँ। कुछ काम था क्या?”

“मैंने कहा बैठो,” आलोक जी ने मुस्कुराते हुए थोड़ा अधिकार से कहा। सुरभि चुपचाप एक किनारे बैठ गई।

आलोक जी ने सामने टेबल पर रखे एक बड़े कांच के गिलास की ओर इशारा किया, जिसमें बादाम, काजू और केसर से सजा हुआ गाढ़ा मैंगो मिल्कशेक रखा हुआ था। साथ में एक प्लेट में ताजे कटे हुए सेब, अनार और भुने हुए मखाने रखे थे।

आलोक जी ने बहुत ही सहजता से कहा, “पहले तुम ये मिल्कशेक पियो और ये फल खाओ।”

सुरभि ने हड़बड़ा कर कहा, “पर जेठ जी… आज तो व्रत का दूसरा दिन है। अभी पूजा का भोग लगेगा, दोपहर को फलाहार बनेगा… और मम्मी जी तथा भाभी ने भी तो कुछ नहीं…”

आलोक जी ने हाथ उठाकर उसे प्यार से रोक दिया। उनके चेहरे पर एक ऐसी समझदारी और करुणा थी, जिसने सुरभि के मन के सारे संकोच को एक झटके में पिघला दिया।

आलोक जी ने कहा, “सुरभि, मेरी एक बात हमेशा याद रखना। यह घर अब तुम्हारा है। तुम इस घर की बहू बाद में हो, पहले इस परिवार की बेटी और हमारी जिम्मेदारी हो। रोहन तुम्हें हम सबके भरोसे छोड़कर गया है। कल दोपहर से मैं देख रहा हूँ कि तुम भूख और प्यास से बेहाल हो, लेकिन सिर्फ औपचारिकता और इस डर से कि कोई क्या सोचेगा, तुम अपने शरीर को कष्ट दे रही हो।”

सुरभि की आंखें भर आईं। आलोक जी ने आगे समझाया, “तुम्हारी माँ ने तुम्हें बड़े नाजों से पाला है। व्रत रखना या न रखना तुम्हारी अपनी व्यक्तिगत आस्था और मर्जी का विषय है। हमारे घर में कोई ऐसी बंदिश नहीं है कि तुम्हें अपनी सेहत की आहुति देकर परंपराएं निभानी पड़ें। तुम्हारी सासु माँ और शालिनी को सालों का अभ्यास है, वे अपनी क्षमता जानती हैं। लेकिन तुम अपनी सीमा से बाहर जाकर केवल दूसरों को खुश करने के लिए यह सब मत करो। भगवान कभी यह नहीं कहते कि उनके बच्चे भूखे रहकर तड़पें।”

तभी पीछे से जानकी देवी और शालिनी भाभी भी आ गईं। जानकी देवी ने आगे बढ़कर सुरभि के सिर पर हाथ फेरा और कहा, “अरे आलोक बिल्कुल सच कह रहा है सुरभि। कल भी मैंने तुझसे कहा था, पर तूने संकोच कर लिया। मुझे लगा तू शालिनी की झिझक में नहीं खा रही। बहू, अगर ससुराल में आकर भी तुझे भूख सहनी पड़े और अपना हक मांगने में डर लगे, तो हमारे इस परिवार का क्या मान रह जाएगा?”

शालिनी भाभी ने मुस्कुराते हुए मिल्कशेक का गिलास उठाकर सुरभि के हाथों में थमा दिया और बोलीं, “और छोटी, अगली बार से अगर भूख लगे ना, तो सीधे रसोई में जाकर जो मन करे खा लेना। मुझसे पूछने की भी जरूरत नहीं है। देवरानी हो मेरी, कोई पराई मेहमान नहीं जो इजाजत मांगेगी।”

आलोक जी ने हंसते हुए कहा, “सुना तुमने? घर में दूध, फल, मेवे सब तुम्हारे हैं। जब भूख लगे, हक से लो। और आज का तुम्हारा व्रत यहीं समाप्त होता है। अब चुपचाप यह मिल्कशेक खत्म करो, वरना मैं रोहन को फोन लगाकर शिकायत कर दूंगा कि तुम्हारी पत्नी अपना ख्याल नहीं रख रही है।”

आलोक जी के इस अपनत्व, संवेदनशीलता और घर के बड़े की गरिमा से भरे शब्दों ने सुरभि के दिल की सारी हिचकिचाहट और पराएपन की दीवारों को हमेशा के लिए ढहा दिया। उसकी आंखों से आंसू टपक कर गालों पर बह निकले, लेकिन ये आंसू दुख या अकेलेपन के नहीं, बल्कि उस असीम तृप्ति और सौभाग्य के थे जो एक स्त्री को ससुराल में ‘अपना’ माने जाने पर मिलती है।

उसने भरे गले से मुस्कुराते हुए मिल्कशेक का घूंट भरा। उसे महसूस हुआ कि यह सिर्फ दूध और फलों का स्वाद नहीं था, बल्कि यह उस भरोसे और सम्मान की मिठास थी, जो एक समझदार परिवार अपनी नई बहू को देता है। जिस ससुराल को वह अब तक नियमों और बंधनों का घेरा समझ रही थी, वह वास्तव में उसके अपने मायके से भी ज्यादा मजबूत और सुरक्षित छाँव साबित हुआ था।

सुरभि ने मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दिया कि उसे ऐसा जीवनसाथी ही नहीं, बल्कि ऐसा सुलझा हुआ परिवार और पिता तुल्य जेठ जी मिले, जिन्होंने बिना कहे उसके मौन दर्द को समझ लिया था।

हर बेटी जब अपना घर, अपनी मां की छांव और अपना बचपन छोड़कर एक नए संसार में कदम रखती है, तो वह धन-दौलत या गहनों की नहीं, केवल उसी प्यार, समझदारी और अपनेपन की भूखी होती है। अगर हर घर में एक ऐसा समझदार सदस्य हो जो बहू की अनकही झिझक को भांपकर उसे अपनी बेटी जैसा अधिकार दे सके, तो कोई भी ससुराल कभी पराया नहीं लगेगा।

क्या आपको भी लगता है कि ससुराल में परंपराओं और रीति-रिवाजों से ज्यादा किसी इंसान की सेहत और उसकी सहजता का ध्यान रखना जरूरी है? आपके घर में बहुओं के साथ ऐसा अपनत्व भरा माहौल कैसा रहता है, अपने विचार कमेंट करके जरूर साझा करें।

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