शहर के उस शांत और एकांत श्मशान घाट पर आज आसमान भी जैसे मातम मना रहा था। हल्की-हल्की बूंदाबांदी हो रही थी और हवा में एक अजीब सी उदासी घुली हुई थी। श्मशान के बीचों-बीच जलती हुई चिता की लपटें बारिश की बूंदों से संघर्ष कर रही थीं। चिता के ठीक सामने पच्चीस साल का एक नौजवान, आर्यन, बुत बनकर खड़ा था। उसकी आँखों से आँसू सूख चुके थे, लेकिन चेहरे पर एक ऐसा ठहराव था जो उसकी उम्र के लड़कों में अमूमन नहीं देखा जाता।
आर्यन के पास ही एक पुरानी लकड़ी की बेंच पर उसकी दादी, सावित्री देवी, सफेद साड़ी में लिपटी सुबक रही थीं। उनके जीवन का साठ साल पुराना साथी, उनके पति पंडित हरिशंकर आज हमेशा के लिए उन्हें छोड़कर जा चुके थे। वहां मौजूद भीड़ में रिश्तेदारों से ज्यादा आर्यन के दोस्त और मोहल्ले के वो लोग थे, जिन्होंने पिछले कुछ सालों में इस पोते का अपने दादा-दादी के प्रति अटूट प्रेम देखा था।
पर उस भीड़ में एक कानाफूसी लगातार चल रही थी। हर कोई दबी जुबान में एक ही बात पूछ रहा था कि आखिरी वक्त में इकलौता बेटा कहाँ है? एक बुजुर्ग रिश्तेदार, जो अब तक खामोश थे, आर्यन के पास आए और उसके कंधे पर हाथ रखते हुए बोले, “बेटा आर्यन… तुम्हारे पापा, यानी विकास को खबर तो की थी न? बाप का अंतिम संस्कार है, उसे तो आना ही चाहिए था।”
आर्यन ने बिना पलक झपकाए चिता की उठती हुई लपटों को देखा। फिर बहुत ही शांत, लेकिन ठंडी आवाज में बोला, “माफ कीजिएगा चाचा जी, लेकिन मेरे दादाजी का कोई बेटा नहीं था। उनका सिर्फ एक पोता था, जो उनके सामने खड़ा है। रही बात मेरे पिता की, तो उनके लिए ये रिश्ता और मेरे दादाजी, दोनों आज से पंद्रह साल पहले ही मर चुके थे।”
बुजुर्ग रिश्तेदार आर्यन का जवाब सुनकर सन्न रह गए और चुपचाप पीछे हट गए। लेकिन आर्यन के इन कड़वे शब्दों के पीछे कोई एक दिन का गुस्सा नहीं था, बल्कि पंद्रह सालों की वो घुटन और दर्द था, जिसने एक छोटे से बच्चे को समय से पहले ही बड़ा कर दिया था। इस कहानी की जड़ें उस समय में छिपी थीं जब आर्यन ने दुनिया को समझना शुरू ही किया था।
हरिशंकर जी रेलवे में एक साधारण क्लर्क थे। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी की कमाई और पाई-पाई जोड़कर अपने इकलौते बेटे विकास को पढ़ाया-लिखाया था। विकास पढ़ने में होशियार था, इसलिए उसे एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छी नौकरी मिल गई। नौकरी मिलने के कुछ ही समय बाद विकास की शादी सुरभि से हो गई। हरिशंकर और सावित्री देवी के लिए उनकी दुनिया अब पूरी हो चुकी थी। जब आर्यन का जन्म हुआ, तो हरिशंकर जी की तो जैसे खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा। वो रिटायर हो चुके थे और उनका पूरा दिन सिर्फ अपने पोते आर्यन के इर्द-गिर्द घूमता था।
आर्यन जब घुटनों के बल चलना सीख रहा था, तो हरिशंकर जी भी उसके साथ जमीन पर घोड़े बनते। वो उसे अपने कंधों पर बिठाकर पूरे मोहल्ले की सैर कराते। आर्यन के लिए उसके दादाजी सिर्फ एक बुजुर्ग नहीं, बल्कि उसके सबसे अच्छे दोस्त, उसके सुपरहीरो थे। जब भी आर्यन गिरता और रोने लगता, तो हरिशंकर जी उसे सीने से लगाकर कहते, “मेरे शेर रोते नहीं हैं। जो गिरकर दोबारा उठना सीख लेता है, जिंदगी में वही सबसे आगे जाता है।”
लेकिन समय के साथ घर की परिस्थितियाँ बदलने लगीं। विकास का प्रमोशन हुआ और उसकी सैलरी कई गुना बढ़ गई। सुरभि, जो हमेशा से एक लग्जरी लाइफस्टाइल की चाह रखती थी, उसने विकास पर दबाव डालना शुरू कर दिया कि वो लोग इस छोटे से पुराने मकान को छोड़कर शहर की किसी पॉश सोसाइटी में शिफ्ट हो जाएं। विकास ने भी पत्नी की बात मान ली और एक बड़ा सा फ्लैट खरीद लिया।
नए घर में शिफ्ट होते ही हरिशंकर और सावित्री देवी की हैसियत घर के मालिक से बदलकर घर के एक कोने में पड़े अनचाहे मेहमानों जैसी हो गई। उनके लिए फ्लैट का सबसे छोटा कमरा तय कर दिया गया, जहाँ धूप भी बमुश्किल पहुँचती थी। आर्यन अब दस साल का हो चुका था और वो अपना ज्यादातर वक्त अपने दादा-दादी के उसी छोटे से कमरे में गुजारता।
जैसे-जैसे हरिशंकर जी की उम्र ढल रही थी, बीमारियां उन्हें घेरने लगीं। उन्हें दिल की बीमारी हो गई और सावित्री देवी को गठिया ने जकड़ लिया। दोनों की दवाइयों का खर्च बढ़ने लगा। सुरभि को अब हर बात पर चिढ़ होने लगी थी। उसे लगता कि इन बूढ़े लोगों की वजह से उनकी ‘हाई-क्लास’ जिंदगी में रुकावट आ रही है।
एक रात आर्यन पानी पीने के लिए उठा तो उसने अपने माता-पिता के कमरे से आती तेज आवाजें सुनीं। सुरभि झल्लाते हुए कह रही थी, “विकास, मैं तंग आ चुकी हूँ। हर महीने इन दोनों की दवाइयों, डॉक्टरों के चक्कर और इनके परहेज वाले खाने पर हमारी आधी सैलरी चली जाती है। हमें आर्यन के भविष्य के लिए भी तो सोचना है! हम कब तक इनका ये बोझ उठाते रहेंगे?”
विकास ने भी झुंझलाते हुए कहा, “तो मैं क्या करूँ सुरभि? मेरे ही माँ-बाप हैं, मैं उन्हें जहर तो नहीं दे सकता।”
सुरभि ने तुरंत उपाय सुझाते हुए कहा, “जहर देने को कौन कह रहा है? आपके गाँव वाला पुश्तैनी मकान खाली तो पड़ा है। इन्हें वहीं भेज दो। हर महीने कुछ पैसे भेज दिया करेंगे। यहाँ रहेंगे तो हमारे स्टैंडर्ड का भी तो कबाड़ा होता है। कल मेरी किटी पार्टी की सहेलियाँ आई थीं, तो तुम्हारी माँ उनके सामने पुराने मैले स्वेटर में आ गईं। मुझे कितनी शर्मिंदगी उठानी पड़ी!”
दरवाजे की ओट में खड़ा दस साल का आर्यन ये सब सुनकर कांप गया। लेकिन वो अकेला नहीं था जिसने ये सब सुना था। आर्यन के ठीक पीछे हरिशंकर जी खड़े थे। उनकी आँखों में आँसू नहीं थे, बल्कि एक ऐसी शून्यता थी जो किसी इंसान के अंदर से टूट जाने पर आती है। उन्होंने आर्यन के सिर पर हाथ फेरा, उसे चुप रहने का इशारा किया और अपने कमरे में चले गए।
अगली सुबह घर का माहौल बिल्कुल शांत था। हरिशंकर जी ने अपना और अपनी पत्नी का पुराना सूटकेस पैक कर लिया था। जब विकास नाश्ते की मेज पर आया, तो हरिशंकर जी ने बहुत ही शांत स्वर में कहा, “विकास, हम लोग आज गाँव जा रहे हैं। शहर की आबोहवा अब रास नहीं आ रही। हमें वहीं छोड़ आ।”
विकास एक पल के लिए चौंका, लेकिन फिर उसने राहत की सांस लेते हुए नजरें चुरा लीं। “ठीक है पापा, अगर आपकी यही मर्जी है तो मैं आज ही टिकट करवा देता हूँ। आपको कोई तकलीफ नहीं होगी, मैं हर महीने खर्चे के पैसे भिजवा दिया करूँगा।”
आर्यन दौड़कर अपने दादा के पैरों से लिपट गया। “नहीं दादू, आप मुझे छोड़कर मत जाओ। मैं भी आपके साथ चलूँगा।” हरिशंकर जी ने रोते हुए आर्यन को गले से लगा लिया और उसके कान में फुसफुसाकर बोले, “मेरा शेर रोता नहीं है। तू यहाँ रहकर खूब मन लगाकर पढ़ना और एक अच्छा इंसान बनना। हम इंतज़ार करेंगे तेरा।”
उस दिन विकास अपने माँ-बाप को उस जर्जर पुश्तैनी मकान में छोड़ आया, जिसकी छत बरसात में टपकती थी।
वक्त पंख लगाकर उड़ने लगा। आर्यन शरीर से तो अपने माता-पिता के साथ उस आलीशान घर में रहता था, लेकिन उसकी आत्मा गाँव की उस कच्ची मिट्टी में अपने दादा-दादी के पास भटकती रहती थी। उसने अपने माता-पिता से बात करना बिल्कुल कम कर दिया था। वो सिर्फ अपनी पढ़ाई पर ध्यान देता। सुरभि और विकास को लगता कि उनका बेटा बहुत होनहार और आज्ञाकारी है, लेकिन उन्हें इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि आर्यन के सीने में उनके खिलाफ कितनी गहरी नफरत पल रही है।
पंद्रह साल बीत गए। पच्चीस साल के आर्यन ने अपनी इंजीनियरिंग पूरी की और कैंपस प्लेसमेंट में उसे शहर की सबसे बड़ी आईटी कंपनी में शानदार पैकेज पर नौकरी मिल गई। विकास और सुरभि खुशी से फूले नहीं समा रहे थे। उन्होंने शहर के एक बड़े होटल में आर्यन की नौकरी की खुशी में पार्टी रखी थी।
पार्टी की सुबह विकास ने आर्यन से कहा, “बेटा, आज शाम की पार्टी के लिए मैंने तेरे लिए एक बहुत महंगा सूट लिया है। आज तू मेरे दोस्तों के सामने मेरा सिर गर्व से ऊँचा कर देगा।”
आर्यन ने अपना सूटकेस पैक करते हुए बहुत ही ठंडे स्वर में जवाब दिया, “सूट आप खुद पहन लीजिएगा मिस्टर विकास। क्योंकि मैं इस घर में नहीं रुकने वाला।”
सुरभि दौड़ती हुई आई, “ये क्या बकवास कर रहा है आर्यन? तेरी इतनी अच्छी नौकरी लगी है, अब तो हमारी जिंदगी और भी मजे से कटेगी। तू कहाँ जा रहा है?”
आर्यन ने अपना बैग उठाया और अपनी माँ की आँखों में आँखें डालकर कहा, “मैं वहाँ जा रहा हूँ, जहाँ मेरी असली जिम्मेदारी मेरा इंतज़ार कर रही है। पंद्रह साल पहले आपने जिन्हें इस घर से ये कहकर निकाल दिया था कि वो आपकी तरक्की में बोझ हैं, मैं उस बोझ को अपने कंधों पर उठाने जा रहा हूँ। आपने मुझे जन्म दिया, इसके लिए मैं हमेशा आपका कर्जदार रहूँगा, लेकिन आपने मेरे दादू को मुझसे छीना था, इसके लिए मैं आपको कभी माफ नहीं करूँगा।”
विकास गुस्से से चिल्लाया, “तू पागल हो गया है आर्यन? उन बूढ़ों के चक्कर में तू अपना शानदार करियर और ये आलीशान जिंदगी छोड़ देगा? मैंने तुझे इसलिए पढ़ाया-लिखाया था कि तू एक दिन मुझे छोड़कर चला जाए?”
आर्यन दरवाजे पर रुका, मुड़ा और बोला, “दादू ने भी तो आपको अपनी पूरी जिंदगी की कमाई लगाकर पढ़ाया था। क्या मिला उन्हें? बुढ़ापे में तिरस्कार और एक टपकती हुई छत! मैं आपका बेटा जरूर हूँ, लेकिन मैं आपके जैसा नहीं बनना चाहता। और हाँ, मेरी नौकरी शहर में ही है, मैंने ऑफिस के पास ही एक छोटा सा घर किराए पर ले लिया है। अब मेरे दादा-दादी वहीं रहेंगे।”
आर्यन ने उस दिन वो घर छोड़ दिया। वो सीधा गाँव गया। जब उसने उस टूटे हुए मकान का दरवाजा खोला, तो हरिशंकर जी खाट पर पड़े खांस रहे थे और सावित्री देवी उनके पैर दबा रही थीं। आर्यन को देखकर दोनों की आँखों से आंसुओं की धार बह निकली। आर्यन ने दोनों के पैर छुए और उन्हें अपने साथ शहर ले आया।
अगले दो साल आर्यन ने अपनी जिंदगी पूरी तरह से अपने दादा-दादी को समर्पित कर दी। ऑफिस से लौटकर वो खुद उनके लिए खाना बनाता, उन्हें डॉक्टर के पास ले जाता और रात को दादू के पैर दबाते हुए उनकी पुरानी कहानियाँ सुनता। हरिशंकर जी को लगा जैसे उन्हें स्वर्ग मिल गया हो। आर्यन की देखभाल और प्यार ने उनकी जिंदगी के कुछ साल और बढ़ा दिए थे।
लेकिन उम्र और बीमारियों के आगे किसी की नहीं चलती। कल रात हरिशंकर जी को दिल का एक जोरदार दौरा पड़ा और आर्यन की गोद में ही उन्होंने अपनी आखिरी सांस ली। मरते वक्त उनके होठों पर एक सुकून भरी मुस्कान थी और उनका हाथ आर्यन के सिर पर था।
चिताओं की लकड़ियों के चटकने की आवाज ने आर्यन को उसकी यादों से बाहर निकाला। श्मशान घाट के गेट पर एक सफेद रंग की चमचमाती कार आकर रुकी। उसमें से विकास और सुरभि बदहवास हालत में बाहर निकले। विकास दौड़ता हुआ चिता की तरफ आया और नकली आँसू बहाते हुए बोला, “पापा… ये आपने क्या किया? मुझे एक बार देख तो लेने देते।”
आर्यन ने विकास का रास्ता रोक लिया। उसकी आँखों में शोले भड़क रहे थे। “रुक जाइए मिस्टर विकास! इस चिता के पास आने का आपको कोई हक नहीं है।”
विकास ने गुस्से से कहा, “मैं उनका इकलौता बेटा हूँ आर्यन! अंतिम संस्कार का हक मेरा है।”
आर्यन ने बिना किसी हिचकिचाहट के जवाब दिया, “बेटा होने का हक तो आपने उसी दिन खो दिया था जब आपने उनके सांसों की कीमत अपनी सैलरी से तौलनी शुरू कर दी थी। जिसने जिंदगी भर पानी का एक घूंट नहीं पूछा, उसे आग देने का कोई अधिकार नहीं है। मेरे दादू का बेटा नहीं था, सिर्फ एक पोता था, और वो पोता अपना फर्ज निभा रहा है। आप यहाँ से जा सकते हैं।”
श्मशान में मौजूद हर शख्स की आँखें नम थीं। विकास और सुरभि शर्मिंदगी से सिर झुकाए वहाँ से लौट गए। आर्यन ने अपने दादू की चिता की परिक्रमा की, उन्हें आखिरी बार नमन किया और मुखाग्नि दे दी। बारिश की बूंदें अब भी गिर रही थीं, लेकिन आर्यन के मन में एक गहरा सुकून था। उसने अपने सुपरहीरो को वो सम्मान दिया था जिसके वो हकदार थे। उसने साबित कर दिया था कि माँ-बाप कभी बोझ नहीं होते, वो तो वो छाँव होते हैं जो खुद तपकर अपनी औलाद को शीतलता देते हैं।
दोस्तों, समाज में आज भी ऐसे कई विकास हैं जो अपनी सहूलियत के लिए अपने जन्मदाताओं को भुला देते हैं, लेकिन हमें गर्व है आर्यन जैसे युवाओं पर जो रिश्तों की असली कीमत समझते हैं।
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