वो धड़कन जो मेरी नहीं थी

पुणे शहर की भागदौड़ भरी जिंदगी में मीरा का जीवन एक सीधी रेखा की तरह चल रहा था। एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर काम करने वाली मीरा अपने काम से काम रखने वाली लड़की थी। तीन साल पहले हुई एक गंभीर हार्ट सर्जरी के बाद उसने अपनी जिंदगी को एक नया अर्थ दिया था। वह हर पल को जीना चाहती थी, लेकिन पिछले कुछ हफ्तों से उसकी यह शांति जैसे कहीं खो गई थी। कारण था एक अधेड़ उम्र की औरत, जो हर जगह साये की तरह उसका पीछा कर रही थी।

मीरा जब सुबह अपने अपार्टमेंट से निकलकर कैब का इंतज़ार करती, तो वह औरत सड़क के उस पार खड़ी उसे देखती रहती। जब वह ऑफिस के पास उतरती, तो न जाने कैसे वह औरत वहां भी मौजूद होती। शुरुआत में मीरा को लगा कि शायद यह कोई इत्तेफाक है। एक इतनी बड़ी आबादी वाले शहर में किसी का दो-चार बार दिख जाना कोई बड़ी बात नहीं थी। लेकिन जब यह सिलसिला हफ्तों तक चलने लगा, तो मीरा के मन में खौफ पैदा होने लगा। वह औरत हमेशा एक सूती की साधारण सी साड़ी पहने होती थी, बाल हल्के बिखरे हुए और उसकी आँखों में एक अजीब सी उदासी और ठहराव होता था। वह कभी मीरा के पास नहीं आती थी, कभी उससे बात करने की कोशिश नहीं करती थी, बस दूर से उसे एकटक निहारती रहती थी। कभी-कभी जब मीरा की नज़र अचानक उस पर पड़ती, तो वह औरत अपनी नज़रें झुका लेती या फिर उसके होठों पर एक बहुत ही फीकी, लेकिन ममता भरी मुस्कान आ जाती।

मीरा को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आखिर यह हो क्या रहा है। क्या वह कोई पागल है? क्या वह किसी गिरोह की सदस्य है जो अकेली लड़कियों को अपना शिकार बनाते हैं? मीरा ने यह बात अपनी ऑफिस की दोस्तों को बताई। सबने उसे डरा दिया। किसी ने कहा कि आजकल शहर में ऐसे गिरोह घूम रहे हैं जो रेकी करते हैं और फिर मौका पाकर हमला कर देते हैं। इन सब बातों ने मीरा के मन में एक गहरा खौफ भर दिया। अब मीरा को अपने ही साये से डर लगने लगा था। उसने अकेले पैदल चलना छोड़ दिया, ऑफिस से निकलते ही वह सीधे दोस्तों के साथ कैब में बैठ जाती। लेकिन वो औरत थी कि हार मानने का नाम ही नहीं ले रही थी। वह कभी मेट्रो स्टेशन के पिलर के पीछे खड़ी दिख जाती, तो कभी ऑफिस की बिल्डिंग के बाहर चाय की टपरी के पास।

एक दिन पानी सिर से ऊपर चला गया। मीरा ऑफिस में किसी प्रोजेक्ट को लेकर बहुत तनाव में थी। बॉस से डांट भी पड़ी थी। जब वह शाम को थकी-हारी अपनी सोसाइटी के गेट पर पहुंची, तो उसने देखा कि वह औरत आज उसके अपार्टमेंट के गेट के बिल्कुल पास खड़ी है। मीरा के सब्र का बांध टूट गया। डर की जगह अब एक भयंकर गुस्से ने ले ली थी। उसने मन ही मन तय कर लिया कि आज तो वह इस औरत को सबक सिखा कर ही रहेगी। जैसे ही मीरा गेट के पास पहुंची, वह औरत अचानक उसके सामने आ गई। आज वह दूर नहीं खड़ी थी। उसके हाथ कांप रहे थे और उसने अपने हाथों में एक छोटा सा स्टील का टिफिन बॉक्स पकड़ा हुआ था।

वह औरत कुछ बोलने ही वाली थी कि मीरा जोर से चीख पड़ी, “क्या परेशानी है तुम्हारी? पिछले एक महीने से तुम मेरा पीछा कर रही हो! क्या चाहिए तुम्हें? पैसे चाहिए या मुझे मारना चाहती हो?” मीरा की तेज़ आवाज़ सुनकर वहां सोसाइटी का गार्ड और कुछ लोग इकट्ठा हो गए। वह औरत एकदम घबरा गई, उसके होंठ कांपने लगे, आँखों में आंसू भर आए। उसने अपने कांपते हाथों से वह टिफिन बॉक्स मीरा की तरफ बढ़ाते हुए कुछ कहना चाहा, लेकिन मीरा का गुस्सा सातवें आसमान पर था। मीरा ने बिना कुछ सोचे-समझे उस औरत के हाथ पर जोर से मारा। टिफिन बॉक्स छिटक कर दूर सड़क पर जा गिरा और उसका ढक्कन खुल गया। अंदर रखा हुआ गाजर का हलवा मिट्टी में सन गया।

“अगर आज के बाद तुमने मुझे कहीं भी दिखने की कोशिश की, तो मैं पुलिस को बुलाकर तुम्हें जेल में सड़ा दूंगी! शक्ल से तो शरीफ लगती हो लेकिन हरकतें चोरों वाली हैं!” मीरा ने सबके सामने उसे बुरी तरह जलील किया। वह औरत चुपचाप जमीन पर गिरे हुए हलवे को देखती रही। उसकी आँखों से आंसुओं की धार बह निकली। उसने एक बार मीरा को देखा, अपने दोनों हाथ जोड़कर बिना एक शब्द कहे वहां से मुड़ी और धीरे-धीरे चलते हुए भीड़ में कहीं गायब हो गई। उस दिन मीरा को लगा जैसे उसने एक बहुत बड़ी मुसीबत से छुटकारा पा लिया है।

दिन बीतते गए, हफ्ते महीनों में बदल गए। जैसा कि मीरा ने सोचा था, उस दिन की बेइज्जती के बाद वह औरत फिर कभी उसे दिखाई नहीं दी। मीरा की जिंदगी वापस अपनी पटरी पर लौट आई थी। सब कुछ सामान्य हो गया था। लगभग छह महीने बाद, दिवाली के समय मीरा अपना फ्लैट खाली करके दूसरे शहर शिफ्ट होने की तैयारी कर रही थी। पैकिंग का काम चल रहा था। तभी सोसाइटी का पुराना गार्ड रामू काका उसके पास आया। उसके हाथ में एक मैला सा, मुड़ा-तुड़ा लिफाफा था। “मैडम जी,” रामू काका ने झिझकते हुए कहा, “छह महीने पहले जिस पागल औरत को आपने गेट पर डांटा था ना… वह उसी रात को दोबारा आई थी। उसने बहुत रोते हुए यह लिफाफा मुझे दिया था और कहा था कि यह आप तक पहुंचा दूं। फिर मैं छुट्टी पर गांव चला गया और यह लिफाफा मेरे बक्से में ही रह गया। आज सफाई करते हुए मिला तो सोचा आपको दे दूं।”

मीरा के माथे पर सिलवटें पड़ गईं। इतने महीनों बाद उस औरत का जिक्र सुनकर उसे थोड़ा अजीब लगा। उसने लिफाफा लिया और रामू काका को भेज दिया। कमरे में बैठकर मीरा ने वह लिफाफा खोला। अंदर से एक पुरानी तस्वीर निकली। यह तस्वीर एक बीस-बाईस साल की बहुत ही खूबसूरत और चुलबुली सी लड़की की थी, जो मीरा जैसी बिल्कुल नहीं दिखती थी। तस्वीर के साथ एक कागज भी था, जिस पर टूटी-फूटी हिंदी में कुछ लिखा हुआ था। मीरा ने पत्र पढ़ना शुरू किया।

“मेरी प्यारी बच्ची, मुझे माफ कर देना। मेरा मकसद तुम्हें डराना या परेशान करना बिल्कुल नहीं था। मेरा नाम सावित्री है। यह तस्वीर जो तुम देख रही हो, यह मेरी इकलौती बेटी स्नेहा की है। तीन साल पहले… एक कार एक्सीडेंट में मेरी स्नेहा हमेशा के लिए मुझे छोड़कर चली गई। वह मेरी दुनिया थी, मेरे जीने का इकलौता सहारा थी। जब डॉक्टरों ने मुझे बताया कि वह अब नहीं बच सकती, तो उन्होंने मुझसे उसके अंग दान करने की बात कही। मेरी बच्ची बहुत नेक थी, इसलिए मैंने रोते हुए हाँ कर दिया। स्नेहा का दिल किसी और के शरीर में धड़कने के लिए भेज दिया गया।

मैं महीनों तक पागलपन के दौरे में रही। मुझे बस यह जानना था कि मेरी बच्ची का दिल किसके सीने में धड़क रहा है। अस्पताल वालों ने नियम के कारण मुझे कुछ नहीं बताया। लेकिन एक दिन वहां के एक वार्ड बॉय ने मेरे आंसुओं पर तरस खाकर मुझे तुम्हारा नाम और ऑफिस का पता बता दिया। मैं बस तुम्हें देखना चाहती थी। जब मैंने पहली बार तुम्हें मेट्रो स्टेशन पर देखा, तो मुझे लगा जैसे मेरी स्नेहा वापस आ गई है। मैं जानती हूँ कि तुम मेरी बेटी नहीं हो, लेकिन तुम्हारे सीने में जो दिल धड़कता है, वह मेरी स्नेहा का है। मैं जब भी तुम्हें देखती थी, तो मुझे अपनी बेटी के जिंदा होने का अहसास होता था। मैं तुम्हें जी भर कर जीना और मुस्कुराना देखना चाहती थी, क्योंकि तुम्हारी हर धड़कन में मेरी बच्ची जिंदा थी।

जिस दिन तुमने मुझे डांटा, उस दिन मेरी स्नेहा का जन्मदिन था। उसे मेरे हाथ का बना गाजर का हलवा बहुत पसंद था। मैं बस एक बार, अपनी बच्ची के जन्मदिन पर, तुम्हें अपने हाथ से वह हलवा खिलाना चाहती थी, यह सोचकर कि शायद इस तरह वह हलवा मेरी स्नेहा तक पहुँच जाएगा। लेकिन शायद मेरी ही किस्मत खराब थी। मुझे एहसास हो गया है कि मेरी वजह से तुम कितनी डर गई थी। एक अनजान औरत इस तरह पीछा करेगी तो कोई भी डर जाएगा। इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं है बेटा। मैं हमेशा के लिए यह शहर छोड़कर अपने गांव वापस जा रही हूँ, क्योंकि अब मेरे पास यहां कुछ नहीं बचा है। बस भगवान से यही दुआ करती हूँ कि तुम्हारी उम्र बहुत लंबी हो और तुम हमेशा खुश रहो। तुम्हारी धड़कनें सलामत रहें, क्योंकि उनमें मेरी स्नेहा बसती है।”

खत मीरा के हाथों से छूटकर जमीन पर गिर पड़ा। उसके कानों में अचानक एक अजीब सा सन्नाटा छा गया था, जिसे केवल उसके खुद के दिल की तेज़ धड़कनें तोड़ रही थीं। वह दिल… जो किसी और का था, उस औरत की बेटी का था, जिसे उसने सबके सामने बेइज्जत किया था। मीरा की आँखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। वह फूट-फूट कर रोने लगी। उसे अपने आप पर इतनी गहरी नफरत हो रही थी जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता था। “मैंने क्या कर दिया…” वह बार-बार खुद से यही कह रही थी। जिस माँ ने अपनी मृत बेटी के दिल के सहारे उसे एक नई जिंदगी दी थी, उस माँ के हाथों से मीरा ने उसकी बेटी के जन्मदिन का प्रसाद सड़क पर फेंक दिया था।

मीरा पागलों की तरह रामू काका के पास दौड़ी, उस औरत का गांव या कोई पता पूछने के लिए, लेकिन रामू काका के पास कोई जानकारी नहीं थी। मीरा उस अस्पताल भी गई जहां उसका ऑपरेशन हुआ था, लेकिन कोई भी सावित्री के बारे में कुछ नहीं जानता था। वह औरत एक गुमनाम साये की तरह आई थी और मीरा की जिंदगी में एक ऐसा घाव देकर चली गई थी जो कभी भरने वाला नहीं था।

आज इस घटना को कई साल बीत चुके हैं। मीरा आज भी वह लिफाफा और तस्वीर अपनी डायरी में संभाल कर रखती है। जब भी वह अकेले में अपने सीने पर हाथ रखती है और धड़कनों को महसूस करती है, तो उसे उस सूती साड़ी वाली औरत का वह रोता हुआ चेहरा याद आ जाता है। वह हर दिन इस पछतावे की आग में जलती है कि काश… काश उसने उस दिन एक पल रुककर उस औरत की बात सुन ली होती। काश वह उस गाजर के हलवे का एक निवाला खा लेती। लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। कुछ रिश्ते अनकहे होते हैं, और जब तक हम उन्हें समझते हैं, वे हमसे बहुत दूर जा चुके होते हैं।

दोस्तों, अगर आप मीरा की जगह होते तो क्या करते? क्या कभी अनजाने में आपने भी किसी सच्चे इंसान को गलत समझा है और बाद में आपको पछतावा हुआ हो? अपने विचार नीचे कमेंट में जरूर बताएं।

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