रमाकांत जी के घर में इन दिनों उत्सव का माहौल था। उनके इकलौते बेटे सुमित की शादी तय हो गई थी और पूरे घर में रौनक छाई हुई थी। रमाकांत जी की पत्नी, सरला देवी की तबीयत अक्सर खराब रहती थी, इसलिए घर और शादी की सारी ज़िम्मेदारी उनकी बेटी काव्या के कंधों पर आ गई थी। काव्या ने भी बिना किसी शिकायत के सब कुछ संभाल लिया था। सुबह उठकर मज़दूरों को काम समझाना, हलवाई की लिस्ट बनाना, रिश्तेदारों के रुकने का इंतज़ाम करना, और यहाँ तक कि अपनी होने वाली भाभी के लिए शगुन की साड़ियों पर गोटा-पत्ती लगाने का काम भी वह खुद ही रात-रात भर जागकर कर रही थी।
सरला देवी अक्सर अपनी पड़ोसनों से कहती थीं, “मेरी काव्या ने तो बेटे की शादी में खुद को झोंक दिया है। बस अब बहू आ जाए, तो मेरी बच्ची को थोड़ा आराम मिले। बहू घर आएगी तो काव्या की शादी में वही सारे काम संभालेगी। आखिर भाभी ही तो ननद की शादी में असली रौनक होती है।” काव्या भी मन ही मन एक ऐसी ही कल्पना बुन रही थी। उसे लगता था कि घर में एक नई दोस्त, एक बड़ी बहन आ जाएगी, जिसके साथ वह अपने सुख-दुख बांट सकेगी।
सुमित की शादी बहुत धूमधाम से संपन्न हुई। मोहल्ले भर में इस बात की चर्चा थी कि कैसे अकेली काव्या ने पूरी शादी का इंतज़ाम इतने बेहतरीन तरीके से किया कि कहीं कोई कमी नहीं रही। लेकिन, घर में नई बहू, शिखा के कदम रखते ही सरला देवी और काव्या के सारे अरमानों पर पानी फिरने लगा। शिखा स्वभाव से बेहद आत्मकेंद्रित और कामचोर थी। घर में जब भी कोई मेहमान आता या कोई काम होता, वह सिरदर्द या थकान का बहाना बनाकर अपने कमरे का दरवाज़ा बंद कर लेती। सरला देवी की खराब तबीयत के बावजूद, शिखा ने कभी रसोई में जाकर यह नहीं पूछा कि क्या मदद चाहिए। काव्या ने फिर भी बुरा नहीं माना, उसने सोचा कि शायद शिखा को नए घर में ढलने में अभी और वक्त लगेगा।
कुछ महीनों बाद काव्या के लिए रिश्ते आने शुरू हुए। एक दिन एक बहुत ही संभ्रांत परिवार काव्या को देखने आया। लड़के वाले शहर के जाने-माने व्यापारी थे और लड़का खुद का बिज़नेस संभालता था। काव्या ने हमेशा की तरह अपनी मुस्कान और शालीनता से सबका दिल जीत लिया। उसने अपने हाथों से तरह-तरह के व्यंजन बनाए थे, जिसकी लड़के वालों ने खूब तारीफ की। सब कुछ बहुत सकारात्मक लग रहा था।
उसी शाम, जब लड़के की माँ और शिखा कमरे में बैठी थीं, तो शिखा ने बातों ही बातों में ऐसा ज़हर घोला जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। उसने बड़ी ही चालाकी से कहा, “काव्या तो बहुत अच्छी है, बस थोड़ी ज़िद्दी है। वैसे मेरी एक छोटी बहन है, रचना। बिल्कुल गाय जैसी सीधी है। वो तो इस घर में भी सबका इतना ख्याल रखती है कि क्या बताऊँ।” बातों ही बातों में शिखा ने अपनी बहन की तस्वीर उन्हें दिखा दी और उनके मन में एक ऐसा बीज बो दिया जिसने काव्या के रिश्ते की जड़ें काट दीं।
चार दिन बाद लड़के वालों का संदेश आया कि उन्हें लड़की तो पसंद है, लेकिन वे शिखा की बहन रचना को भी देखना चाहते हैं, क्योंकि किसी ने उन्हें बताया है कि रचना उनके परिवार के लिए अधिक उपयुक्त रहेगी। रमाकांत जी यह सुनकर सन्न रह गए। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि उनके अपने ही घर की बहू ऐसी साज़िश कैसे कर सकती है। काव्या के लिए यह एक बड़ा मानसिक आघात था, लेकिन उसने अपने माता-पिता को संभालते हुए कहा, “पिताजी, जो लोग दूसरों की बातों में आकर अपना फैसला बदल लें, वहाँ मेरा न जाना ही बेहतर है।”
शिखा की इस हरकत के कारण घर का माहौल बेहद तनावपूर्ण हो गया। रमाकांत जी ने शिखा को बहुत समझाया, लेकिन वह अपनी ज़िद पर अड़ी रही कि उसने तो बस अपनी बहन का भला चाहा था। विडंबना देखिए कि कुछ समय बाद उन लोगों ने शिखा की बहन रचना को भी किसी बहाने से मना कर दिया। यानी न इधर बात बनी, न उधर। लेकिन इस पूरी घटना ने काव्या के मन में एक बात स्पष्ट कर दी थी कि उसे अब किसी से कोई उम्मीद नहीं रखनी है।
समय अपनी गति से चलता रहा। काव्या ने अपना ध्यान घर की ज़िम्मेदारियों और अपनी सिलाई-कढ़ाई के शौक पर लगा दिया। एक दिन, रमाकांत जी के एक पुराने मित्र, जो कि एक रिटायर्ड जज थे, अपनी पत्नी के साथ उनके शहर किसी पारिवारिक काम से आए। वे रमाकांत जी के घर ही ठहरे। उस दौरान काव्या ने उनकी जो सेवा की, जिस सलीके से उसने पूरे घर को व्यवस्थित रखा था और उसकी जो वैचारिक परिपक्वता थी, उसने उन दोनों का मन मोह लिया।
जज साहब की पत्नी ने वापस जाने से पहले सरला देवी के हाथ में शगुन रखते हुए कहा, “सरला जी, हमने तो आपकी बेटी को अपने घर की लक्ष्मी मान लिया है। हमारा बेटा विदेश मंत्रालय में एक बड़े पद पर है। अगर आप लोगों को ऐतराज़ न हो, तो हम काव्या को अपनी बहू बनाना चाहते हैं।” यह प्रस्ताव सुनकर रमाकांत जी की आँखों में खुशी के आंसू आ गए।
काव्या की शादी तय हो गई। और एक बार फिर, घर में तैयारियों का दौर शुरू हुआ। शिखा, जिसे काव्या की शादी में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना चाहिए था, ठीक उसी समय अपने मायके चली गई, यह कहकर कि उसकी माँ की तबीयत खराब है। काव्या ने बिना किसी शिकायत के अपनी शादी की सारी तैयारियां खुद कीं। मेहमानों की लिस्ट बनाने से लेकर, अपना सामान पैक करने, और शादी के कार्ड बांटने तक—सब कुछ काव्या ने ही संभाला। मोहल्ले वाले ताने मारते कि “कैसी बहू है, ननद की शादी में भी मायके बैठी है।” लेकिन काव्या को अब इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता था। वह बस इस बात से खुश थी कि कोई उसकी तैयारियों में अब अड़ंगा नहीं लगा रहा था।
आज दस साल बीत चुके हैं। काव्या अपने पति के साथ एक बेहद शानदार और सम्मानजनक जीवन जी रही है। उसका पति आज एक बहुत बड़े ओहदे पर है और उनका जीवन हर सुख-सुविधा से परिपूर्ण है। काव्या जब भी अतीत के उन पन्नों को पलटती है, तो उसके चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान आ जाती है।
वह सोचती है कि अगर उस दिन शिखा ने उस व्यापारी परिवार के सामने उसके खिलाफ साज़िश न की होती, तो क्या होता? शायद उसकी शादी वहां हो जाती, और वह आज भी किसी छोटी सी दुनिया में, उन्हीं संकीर्ण मानसिकता वाले लोगों के बीच घुट रही होती। शिखा की उस ईर्ष्या और अड़ंगेबाजी ने दरअसल काव्या को एक गलत जगह जाने से रोक लिया था और उसके लिए एक ऐसी शानदार नियति के दरवाज़े खोल दिए थे, जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। सच ही कहते हैं, जो होता है, अच्छे के लिए ही होता है। कभी-कभी हमें उन लोगों का भी शुक्रिया अदा करना चाहिए जो हमारे रास्ते में कांटे बिछाते हैं, क्योंकि वही कांटे हमें एक बेहतर और सुरक्षित रास्ते की ओर मुड़ने पर मजबूर कर देते हैं।
आपको क्या लगता है, क्या सच में जीवन में आने वाली हर रुकावट एक नए और बेहतर रास्ते का संकेत होती है? अपने विचार ज़रूर साझा करें।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद
#नियति का खेल और वो बंद दरवाज़ा