रौशनी की दहलीज

सिद्धार्थ ने अपनी माँ निर्मला देवी की तरफ देखा, जिनकी आंखों में आंसू थे। निर्मला देवी को भी अपनी गलती का अहसास हो रहा था। वो दौड़कर गायत्री के पास गईं और उसे गले लगा लिया। “मुझे माफ़ कर दे बेटी। मैं दुनिया के डर से एक माँ का फर्ज़ भूल गई थी।” मीरा मुस्कराई … Read more

रिश्तों की जमा-पूंजी

“भाई साहब, अगले ही दिन मैंने छुट्टी ली और अपनी पत्नी सरिता के मायके पहुंच गया। वो मुझे देखकर बहुत हैरान और नाराज थी। उसने मुझसे बात तक नहीं की। जब वो खाना खाने बैठी, तो मैं चुपचाप उसके पास जाकर बैठ गया। मैंने उसकी प्लेट से एक रोटी उठाई और कहा, ‘क्या जिंदगी भर … Read more

एक अनकहा रिश्ता: जब दोस्त बनी भाभी

 भैया ने मेरे सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, “क्योंकि मुझे तुम्हारी पसंद पर और तुम्हारी भाभी की समझदारी पर पूरा भरोसा था। लेकिन मैं इंतजार कर रहा था कि सिद्धार्थ अपने पैरों पर खड़ा हो जाए, ताकि मैं ताऊजी और पिताजी के सामने उसका पक्ष मजबूती से रख सकूं। तुम्हारी भाभी ने … Read more

बंद खिड़की की धूप

तीन दिन बाद जब सावित्री देवी को अस्पताल से छुट्टी मिली, तो अनुराग ने खुद अपनी गोद में उठाकर मां को कार की आगे वाली सीट पर बैठाया। उसने अपनी सास को फोन किया, जिन्होंने फिर से किसी पार्टी में चलने की बात छेड़ी थी। अनुराग ने बहुत ही विनम्र लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, … Read more

फर्ज की दहलीज

 कल्याणी देवी ने मुंह बिचकाया, “रहने दो, ये डॉक्टरों के बनाए ढकोसले हैं ताकि अपनी जेबें भर सकें। जितना काम करोगी, शरीर उतना ही लचीला रहेगा। तुम्हारे बाबूजी ने कोई राजमहल तो दिया नहीं कि तुम यहां आकर महारानी बन जाओगी। अगर इतना ही नाजुक मिजाज है, तो अपने मायके चली जाओ। वहीं जाकर मां … Read more

इश्क़, गलतियां और मीठे पछतावे

 बुआ जी ने अपना माथा पीट लिया। “अरे मोरे राम! ई मार्डन जमाने के चक्कर में तुम लोग कितने कामचोर हो गए हो। हमारे गांव में जो मेहरारू सुबह उठके चूल्हा नहीं जलाती और नाश्ता-खाना एक साथ खिलाती है, उसे आलसी और कोढ़ी कहा जाता है। तुम लोग शहर वाले भी ना, आलस का नाम … Read more

अहंकार की दीवार  

विक्रम की बात सुनकर स्मृति वहीं फर्श पर घुटनों के बल बैठ गई और फूट-फूट कर रोने लगी। उसने मीरा के हाथ पकड़ लिए और बोली, “मुझे माफ कर दीजिए भाभी! मैंने बहुत बड़ा पाप किया है। उस दिन मेरी तबीयत आपके जूस से नहीं, बल्कि मेरे छुपकर बाहर का खाना खाने से खराब हुई … Read more

राख से उठी उड़ान

 “बाबूजी, मैं कोई भगवान या महान आत्मा नहीं हूँ। मैं बस समीर की पत्नी और अपने बच्चों की माँ हूँ। मैंने आपकी मदद इसलिए नहीं की कि मैं आपके किए गए उस अन्याय को भूल गई हूँ। वो ज़ख्म कभी नहीं भर सकते। मैंने आपकी मदद इसलिए की है क्योंकि मैं आप जैसी नहीं बन … Read more

तारीखों के तराज़ू में रिश्ते

स्नेहा अब फूट-फूट कर रो रही थी। उसे अपनी उस ओछी मानसिकता पर बेहद शर्मिंदगी महसूस हो रही थी जिसने एक पिता के प्यार को पैसों की तराज़ू में तौल दिया था। वह उठी और रमाकांत जी के सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो गई। “बाबूजी, मुझे माफ़ कर दीजिये। पैसे की तंगी और घर के … Read more

साँझ का सवेरा

 मयंक और सुमित जब अपनी पत्नियों के साथ घर पहुंचे, तो वे अपने पिता की हालत देखकर सहम गए। उन्हें लगा था कि माँ के जाने के बाद पिता पूरी तरह बिखर जाएंगे, चीखेंगे, छाती पीटेंगे या शायद खुद भी इस आघात को सहन न कर पाएंगे। लेकिन विश्वंभर जी तो बिल्कुल शांत खड़े थे। … Read more

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