खौफ के पार एक उम्मीद

  रमा देवी बार-बार दरवाजे की ओट से बाहर झांकतीं और फिर निराश होकर आंगन में लौट आतीं। उनके माथे की लकीरें उनके भीतर चल रहे तूफान को साफ बयां कर रही थीं। उनके पति, जो कभी एक मिल में काम करते थे, पिछले तीन सालों से लकवे का शिकार होकर बिस्तर पर थे। घर में … Read more

ममता का बँटवारा

मीरा के हाथों में मायके से आया वह लिफाफा किसी सूखे पत्ते की तरह कांप रहा था। खिड़की से छनकर आती दोपहर की उदास हवा उस पन्ने को फड़फड़ा रही थी, मानो वह कागज भी मीरा के सीने में उठते तूफान की गवाही दे रहा हो। उसकी आँखों से गिरती गर्म बूंदों ने खत की … Read more

समर्पण के अनकहे रंग: एक कामकाजी माँ की खामोश तपस्या

“कभी खुद को आईने में देखा है तुमने, मीरा? क्या हाल बना लिया है अपना। न बालों में कंघी करने का होश है, न ढंग के कपड़े पहनने का। आंखों के नीचे काले घेरे पड़ गए हैं और वजन तो जैसे बढ़ता ही जा रहा है। घर का हाल देखो, ऐसा लगता है जैसे कोई … Read more

कच्चे धागे और अहंकार की दीवार

रिया के इन कड़वे और जहरीले शब्दों ने डाइनिंग टेबल पर एक गहरा सन्नाटा बिखेर दिया। हर कोई सन्न रह गया। मीरा, जिसने हमेशा अमन को अपने छोटे भाई या यूं कहें कि अपने बेटे की तरह माना था, उसके लिए यह आरोप किसी खंजर के घोंपे जाने से कम नहीं था। उसकी आँखों से … Read more

उम्र की दहलीज और बचपन का हाथ

कबीर ने अपने जूते के फीते बांधते हुए बहुत ही मासूमियत लेकिन एक गहरी समझ के साथ कहा, “पापा, आपको याद है जब हम पिछले साल ट्रिप पर गए थे? मम्मा ने मेरा कितना सारा सामान पैक किया था। मेरी दवाइयां, मेरे खिलौने, मेरे गर्म कपड़े, मेरा मनपसंद खाना। मम्मा कहती हैं कि बच्चों को … Read more

कच्ची मिट्टी का पक्का घर

मीरा थोड़ी आगे बढ़ी और अपने ससुर दीनानाथ जी की कुर्सी के पीछे जाकर खड़ी हो गई। उसने उनके कंधे पर अपना हाथ रखा और कहा, “क्या आपको पता है अंकल, जब हम शहर के बाज़ार से गुज़रते थे, तो लोग मेरे ससुर जी को देखकर सम्मान से रास्ता छोड़ देते थे। उनका नाम सुनकर … Read more

 विश्वास की डोर

उस दिन मीरा ने चाय की ट्रे जैसे-तैसे मेज पर रखी और बिना कुछ कहे वहां से अपने कमरे में चली गई। उसके दिल में एक अजीब सी खटास पैदा हो गई थी। जिस सास के साथ वह अपने दिल की हर बात साझा करती थी, अचानक वह उसे एक अजनबी और स्वार्थी औरत लगने … Read more

सुबह की मीठी धूप

“अरे मीरा बेटा, तुम इतनी जल्दी क्यों उठ गईं? अभी तो छह भी नहीं बजे हैं। आज तो रविवार है, तुम्हें आराम करना चाहिए था,” निर्मला देवी ने बहुत ही स्नेह से कहा। मीरा हड़बड़ा गई। उसे लगा कि शायद उसने कोई बहुत बड़ी गलती कर दी है या फिर उसकी सास उसे ताना मार … Read more

कर्ज़ ममता का: एक देवर की अपनी भाभी के लिए अनूठी भेंट

रोहन ने कविता के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। उसकी भी आँखों से आँसू बह रहे थे। “भाभी, दुनिया कहती है कि भगवान हर जगह नहीं पहुँच सकता, इसलिए उसने माँ बनाई है। लेकिन मैं कहता हूँ कि जिसके पास आपके जैसी भाभी हो, उसे तो किसी भगवान की भी ज़रूरत नहीं है। … Read more

रिश्तों की असली पहचान

वो भगवान से प्रार्थना कर रही थी कि काश बाबूजी का आना किसी तरह टल जाए। वो नहीं चाहती थी कि जिन बाबूजी को कस्बे में इतना सम्मान मिलता है, उन्हें अपनी ही बेटी के घर में उपेक्षा का शिकार होना पड़े। लेकिन सुबह हो चुकी थी। ट्रेन का समय हो गया था। मीरा ने … Read more

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