अनकही चुभन: शहनाइयों के बीच एक खामोश चीख

 “अरे विशाखा! तुम कहां छुप कर बैठी हो अपने कमरे में? आज तुम्हारी सगी बहन की मेहंदी है और तुम ही पूरे घर से गायब हो? माना कि तुम्हारे अपने भाग्य में सुख नहीं लिखा, पर कम से कम बहन की खुशियों में तो ऐसे मनहूसियत मत फैलाओ। मुंह लटका कर बैठने से क्या अब … Read more

शीशे का महल: एक अनकही पारिवारिक दास्तान

 राधिका को देखते ही सीमा  अपने आंसुओं का बांध नहीं रोक पाई और फूट-फूटकर रोते हुए उसके गले लग गई। राधिका उसे संभालते हुए अंदर ले गई। कमरा अस्त-व्यस्त था। राधिका ने सीमा  को बिस्तर पर बिठाया और पानी पिलाया। जब सीमा  थोड़ी शांत हुई, तो राधिका ने उससे वे सारे सवाल किए जो पिछले … Read more

खामोश चीखें और एक माँ की दहाड़

 एक माँ का दिल सब समझता है। कल्याणी को यह समझते देर नहीं लगी कि वह जिस भेड़िये से अपनी बच्चियों को बचाने के लिए भागी थी, वह भेड़िया तो रक्षक का रूप धरकर उसके घर में ही बैठा है। उस रात कल्याणी सो नहीं पाई। उसने काव्या और दिशा से बात की, तो बच्चियों … Read more

ज़मीर का आईना: एक बेटे की अधूरी पहचान

 आज रामनाथ और कौशल्या की शादी की पचासवीं सालगिरह थी। विकास के मन में सुबह से ही एक अजीब सी बेचैनी थी। उसे याद था कि बचपन में वह इस दिन अपने माता-पिता के लिए अपने गुल्लक के पैसे तोड़कर एक छोटा सा केक लाता था। ग्लानि के एक क्षणिक झोंके ने आज उसे मजबूर … Read more

काँपते हाथों का वो आख़िरी नंबर

 वह आवाज़… वह लहज़ा… वह नफ़रत… सब कुछ स्पीकर के ज़रिए उस प्रतीक्षालय की दीवारों से टकराकर वापस लौट रहा था। मेरे हाथ में पकड़ा हुआ फ़ोन अचानक मुझे किसी दहकते हुए अंगारे जैसा लगने लगा। मेरी नज़रें स्क्रीन से उठकर उन माँ के चेहरे पर गईं, और जो मैंने देखा, वह मैं ताउम्र नहीं … Read more

बंद लिफाफे का सफर

कबीर ने गहराई से कहा, “तुम दूसरों में खुशी ढूंढ रही हो, शिखा। तुम मानव से उम्मीद कर रही हो कि वह तुम्हें समझे, मुझसे उम्मीद कर रही हो कि मैं तुम्हारी बात सुनूं। लेकिन तुम उस शिखा को भूल गई हो, जो कॉलेज के मैगजीन के लिए कितनी शानदार कविताएं लिखती थी। जो अपने … Read more

अदृश्य डोर: एक माँ की वापसी

 यह सुनते ही देवकी की आत्मा सिहर उठी। वह जोर से “कबीर!” चिल्लाते हुए नींद से जाग गई। वह हांफ रही थी और उसका पूरा शरीर पसीने से भीगा हुआ था। बाहर बारिश रुक चुकी थी और सुबह की पहली किरण कबीर के कमरे की खिड़की से अंदर आ रही थी। देवकी वहीं बैठी रही … Read more

जिसे उसने अपना सच समझा – लक्ष्मी कनोडिया ‘अनिका’

“माँ, आप मुझे पहचानती हैं?” सामने बैठी वृद्धा ने कुछ क्षण उस लड़की को देखा। फिर मुस्कराकर बोलीं— “बिल्कुल। तुम मेरी बेटी हो।” लड़की की आँखों में आँसू आ गए। “नहीं माँ… मैं आपकी बेटी नहीं हूँ।” वृद्धा चुप हो गईं। कमरे में कुछ देर तक सिर्फ दीवार पर लगी घड़ी की टिक-टिक सुनाई देती … Read more

‘मुनिया’ – श्वेता अग्रवाल 

अभी अम्मा जी दोपहर का खाना खाकर लेटी ही थी कि अचानक गेट खटखटाने की जोर-जोर से आवाज़ आने लगी।  “अम्मा! ओ अम्मा दरवाजा खोलो।” “आ रही हूॅं। कौन आ गया इस वक्त? दो घड़ी सुस्ताने भी नहीं देता।” धीरे-धीरे दरवाजे की ओर बढ़ती अम्मा जी बड़बड़ाई। लेकिन जैसे ही वह दरवाजे के करीब पहुॅंची … Read more

इस गुनाह की माफी नहीं – शुभ्रा बैनर्जी

सविता जी की उम्र अब सत्तर के करीब हो चुकी थी।शरीर तो कमजोर हुआ था,पर इच्छाशक्ति और भी मजबूत हो रही थी।पति अरिहंत जी उम्र में उनसे पांच-छह साल बड़े थे।एक बेटे और दो बेटियों का परिवार था उनका।बच्चों की शादी करवा कर चिंता मुक्त हो चुके थे दोनों।बेटियां तो अपने ससुराल में रह रहीं … Read more

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