आँगन की रौनक – डॉ बीना कुण्डलिया 

मीनाक्षी की बेटी नैना की विदाई धीरे-धीरे सभी मेहमान विदा हो गये । ज्यादातर तो अपने इसी शहर में रहते तो दोपहर तक घर खाली हो गया । कल तक कितनी चहल-पहल इसलिए आज आँगन की रौनक फीकी लग रही थी । वैसे विवाह कार्यक्रम तो वैडिंग प्वाइंट में सम्पन्न हुए और आधे दूर दराज … Read more

मैं भी तो एक बेटी हूं – मंजू ओमर

मंशा जी भइया जा मम्मी के लिए पतली पतली सी खिचड़ी बना था , मंशा सुन ही नहीं रही थी वो तो बस फोन में ही लगी थी । मंशा तू सुन रही है कि नहीं भाई निखिल ने जोर से कहा। हां भईया सुन रही हूं । हां मैं इस घर की बेटी हूं … Read more

समय का फेर – हेमलता गुप्ता

रमन और महेश की दोस्ती शहर में मिसाल मानी जाती थी। दोनों ने बचपन एक ही मोहल्ले में गुज़ारा था। स्कूल की घंटी बजते ही दोनों साथ भागते, एक ही टिफिन से रोटी बाँटते, और शाम को गली के मोड़ पर खड़े होकर बड़े-बड़े सपने देखते—“एक दिन अपना भी नाम होगा, अपना भी काम होगा।” … Read more

अनोखा जन्मदिन – रीतू गुप्ता

जानकी जी के आश्रम में आज सुबह से ही एक अजीब-सी हलचल थी—वैसी हलचल जैसी बच्चों के स्कूल में “बर्थडे सेलिब्रेशन” वाले दिन होती है। कोई रंग-बिरंगे गुब्बारे फुला रहा था, कोई दीवार पर कागज़ के फूल चिपका रहा था, कोई रसोई में जाकर बार-बार झाँक रहा था कि केक आया या नहीं। यहाँ “जन्मदिन” … Read more

रस्सी उतना ही खींचे जितना उसमे लोच हो – लतिका

सुबह सुबह आराधना जी का बड़बड़ाना शुरू हो गया था। छह बज गया अभी तक बहू रानी के उठने का समय ही नहीं हुआ है। एक हम थी सुबह चार बजे ही नहा धोकर तैयार हो सासु माँ को प्रणाम करने चली जाती थी और एक हमारी बहुरिया है जिन्हे सुबह छह बजे तक कुछ … Read more

काश…. – संगीता अग्रवाल

” क्या बात है अंतरा क्या सोच रही हो ऐसे गुमगुम बैठी?” मासूमी अपनी दोस्त के घर पहुंच उसे गुमसुम देख बोली। ” कुछ नही यार बस ऐसे ही !” अंतरा अनमनी सी बोली। ” ऐसे तो नही कोई तो बात है ?” मासूमी ने जैसे ही अंतरा के कंधे पर हाथ रखा उसकी कराह … Read more

 “गैर ” लेकिन अपना सा – गीता वाधवानी

 श्यामू ने अपनी पत्नी राधा को आवाज लगाते हुए कहा-” राधा, जल्दी से खाना लगा दो मुझे काम से बाहर जाना है। लोग सच ही कहते हैं, गरीब की किस्मत भी गरीब होती है। ”   राधा-” ऐसा क्यों कह रहे हो रानी के बापू,? ”   श्यामू -” और क्या कहूं राधा, तुम अच्छी तो रही … Read more

सही फ़ैसला

सुबह का समय था। शहर की सड़कों पर हल्की-हल्की चहल-पहल शुरू हो चुकी थी। पूजा तेज़ कदमों से बस स्टॉप की ओर बढ़ रही थी। आज उसका नए स्कूल में पहला दिन था—एक शिक्षिका के रूप में। मन में उत्साह भी था और घबराहट भी। बार-बार घड़ी देख रही थी कि कहीं देर न हो … Read more

आख़िरी समय की जीवनसंगिनी

बरामदे की कुंडी खटकी तो रमाकांत ने अख़बार मोड़कर एक तरफ़ रखा। इस वक़्त किसी के आने की उम्मीद नहीं थी। दरवाज़ा खोला तो सामने खड़े व्यक्ति को देख वह ठिठक गए। सामने उनके कॉलेज के पुराने मित्र नरेश खड़े थे—चेहरा उतरा हुआ, आँखों के नीचे गहरे साये और कंधों पर ऐसा बोझ जैसे बरसों … Read more

करुणा का रिश्ता – सीमा गुप्ता

अस्पताल के बरामदे में लगी बेंच पर बैठी सुधा अपने हाथों को बार-बार मल रही थी। दिसंबर की सर्द रात में उसकी उँगलियाँ ठंड से सुन्न हो चुकी थीं और वह काँप रही थी। पर तन से भी ज्यादा उसका मन कांप रहा था। सामने से आती-जाती नर्सों, स्ट्रेचर पर ले जाए जाते मरीजों और … Read more

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