बस, अब बहुत हो गया मम्मी जी – मंजू ओमर

अरे कुछ ना पूछो कमला बहू एक नंबर की कामचोर है काम करने में तो उसका मन ही नहीं लगता। बस जी चुराती रहती है हर काम को,,जरा मौका लगा नहीं की बस कमरे में बैठ जाती है जाकर। अच्छा भाभी जी मुझे तो पता था कि आपकी बहू खूब अच्छे से काम संभालती है … Read more

दर्द की इंतहा – सुदर्शन सचदेवा

रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे। शहर अब भी जाग रहा था—कहीं ट्रैफिक की आवाज़, कहीं मोबाइल की घंटियाँ, कहीं देर रात तक जलती खिड़कियाँ। मगर उस ऊँची इमारत की सोलहवीं मंज़िल पर बैठी अनाया के कमरे में एक ऐसी ख़ामोशी थी, जो किसी शोर से भी ज़्यादा भारी थी। उसके हाथ में मोबाइल … Read more

आजादी के सही मायने और जुनून – डॉ बीना कुण्डलिया 

दूर से आती मधुर संगीत की धुन..सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा हम बुलबुलें है इसकी ये गुलिस्तां हमारा। सुबह सुबह भारती के कानों में जैसे ही आवाज गूंजी वो झटपट बिस्तर से उठ बैठी सामने घड़ी सात बजे का समय दिया रही थी। अरे बाप रे बाप सात बज गये उसको तो नौ बजे … Read more

 रिश्तों की डोर

 सुमित्रा जी अपने बेटे को इस कदर टूटता हुआ देख कर अंदर तक हिल गईं। उनका कलेजा फटने लगा। जिस बेटे की खुशी के लिए उन्होंने अपना जीवन होम कर दिया था, आज वही बेटा उनकी वजह से अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी खो रहा था। उनका अहंकार और उनकी असुरक्षा अचानक आंसुओं में … Read more

आंसुओं का मुखौटा

धूल भरी पगडंडी से होते हुए जब विकास की गाड़ी पुश्तैनी हवेली के लोहे वाले बड़े दरवाजे के सामने रुकी, तो वहां पहले से ही गांव वालों की भारी भीड़ जमा थी। शालिनी ने गाड़ी का शीशा नीचे किया तो बाहर से आती अगरबत्ती, लोबान और रोने-पीटने की मिली-जुली आवाजें उसके कानों से टकराईं। आज … Read more

वंश का अभिमान: एक माँ की हुंकार

शिवानी अपनी तीन साल की नन्ही बेटी, काव्या को अपने हाथों से नाश्ता करा रही थी। काव्या की मीठी तोतली बातें और उसकी मासूम हंसी से पूरा घर गूंज रहा था। शिवानी के पति, राघव, अखबार पढ़ते हुए बीच-बीच में अपनी बेटी की हरकतों पर मुस्कुरा देते थे। बाहर से देखने पर यह एक बेहद … Read more

खानदान का चिराग: एक नई सुबह

 सुरभि जो अब तक खामोश थी, आज उसके सब्र का पैमाना छलक गया। वह हमेशा अपनी सास का सम्मान करती थी और उनकी कड़वी बातों को घूंट बनाकर पी जाती थी, लेकिन आज बात सिर्फ उसकी नहीं, उसकी बेटी मायरा के वजूद की थी।  सुरभि रसोई में सबके लिए अदरक वाली चाय और पोहा बना … Read more

बेनाम रिश्ते का बोझ

पिछले तीन दिनों से घर में एक अजीब सी खामोशी छाई हुई थी। यह खामोशी घर की दीवारों में नहीं, बल्कि स्नेहा के स्वभाव में थी। स्नेहा, जो पूरे घर की जान थी, जिसकी चहचहाहट से सुबह होती थी और जिसकी हंसी पर पूरा परिवार निहाल रहता था, वो अब एक बुझी हुई मोमबत्ती की … Read more

सांवली सी वो

 मीरा दीदी की पुरानी संदूकची को साफ करते हुए आज मेरे हाथ में एक पुरानी ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर लग गई। तस्वीर पर जमी धूल को मैंने अपने दुपट्टे के कोने से साफ किया, तो उसमें से दो चेहरे उभर कर सामने आए। एक तरफ मेरी बड़ी बहन कावेरी थी, और उनके ठीक बगल में … Read more

 मन का दर्पण

रात के करीब दस बज रहे थे। घर में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था, जिसे सुमित्रा जी की तेज और गुस्से से कांपती हुई आवाज़ ने चीर दिया। “राघव! मेरे कमरे में आ अभी के अभी!” सुमित्रा जी का चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ था और उनकी सांसें तेज़ चल रही थीं। राघव, … Read more

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