सच्ची श्रद्धांजलि – कमलेश आहूजा

लगभग एक वर्ष बीत गया था रमेश को इस संसार को अलविदा कहे हुए।रमा पति की यादों में खोई हुई थी।पति के साथ बिताए हुए हर एक लम्हें को इस एक वर्ष में उसने हजारों-हजार बार जिया था।पति को याद करते हुए कभी उसकी आँखें नम हो जातीं तो कभी होंठो पर खोई हुई मुस्कान … Read more

*रिश्तों की कीमत* – तोषिका

लड़की तो बहुत सुंदर और सुशील है, हमें हमारे बेटे ऋषि के लिए सीमा पसंद है। मुस्कुराते हुए ऋषि की मां सुलेखा ने बोला। ऋषि और सीमा की शादी हो गई थी। पर ज्यादा बड़े घर से ना होने के चलते वो दहेज के लिए इतने गहने और सोना चांदी ये सब नहीं लाई थी। … Read more

*अस्ति कुटीर * – अनु माथुर

लखनऊ के कश्मीरी मोहल्ले की वो गली जानी जाती थी अपने आमने-सामने वाले दो मकानों से।   एक था “शांति कुटीर” – प्रोफेसर हरीश वर्मा का तीन मंज़िला, संगमरमर-वाला, बेल्जियम काँच की खिड़कियों वाला मकान। पर अंदर? सन्नाटा ऐसा कि घड़ी की टिक-टिक भी पहाड़ लगती। 72 साल के वर्मा जी। बीवी को गुज़रे 10 साल। … Read more

घर ईंटों से नहीं दिलों से बनता है -प्रतिमा श्रीवास्तव

कमरें में धीमी रौशनी जल रही थी। सन्नाटा चारों ओर पसरा हुआ था, सांसो की आवाजाही भी कानों में साफ – साफ सुनाई दे रही। बिस्तर पर लेटी करुणा जी छत को अपलक निहार रहीं थीं, जैसे कुछ प्रश्नों के जबाब को तलाश रहीं हों। अतीत की यादों ने उन्हें झकझोर दिया था और आंखों … Read more

रिश्तों की कीमत – खुशी

आदित्य एक अनाथ लड़का था।जो अनाथाश्रम में रहता था।वही के जो मैनेजर थे वो ही वहां रह रहे बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाते थे।कभी कोई रहीस आदमी आ जाता तो  ढंग से खाना पीना मिल जाता नहीं तो वही रुखा सुखा। एक अपमान भरा जीवन जिया था उसने कभी कोई प्यार करने वाला नहीं … Read more

रिश्तों की कीमत – माता-पिता और बेटी – सुदर्शन सचदेवा

“बेटियाँ घर की रौनक होती हैं” — यह बात शर्मा जी अक्सर कहा करते थे। उनकी इकलौती बेटी अन्वी उनके जीवन की सबसे बड़ी खुशी थी। घर में उसकी हँसी गूंजती तो लगता जैसे हर कोना मुस्कुरा उठा हो। अन्वी बचपन से ही बहुत चंचल थी। सुबह उठते ही सबसे पहले माँ के गले लगती … Read more

मां का अकेलापन – गीता वाधवानी

 “मम्मी, मैं चलती हूं कैब आ गई है।”   मम्मी( राधा देवी) ने कहा-” नैनसी, सुन तो बेटा, फिर कब आएगी, अबकी बार तो बहुत दिनों बाद आई है। इसी शहर में अपना ट्रांसफर क्यों नहीं करवा लेती। अब मैं और अकेली नहीं रह सकती। मेरा बिल्कुल मन नहीं लगता तेरे बिन। देख लेना किसी दिन … Read more

खामोशी और झंकार: एक अनकहे अहसास की कहानी

रात के करीब आठ बज रहे थे। बाहर बारिश की हल्की फुहारें गिर रही थीं और बालकनी में बैठी अंजलि अपनी पड़ोसन विशाखा के साथ ठहाके लगाकर हंस रही थी। उनकी हंसी की आवाज़ बेडरूम तक आ रही थी, जहाँ समीर अपने लैपटॉप पर ऑफिस का कुछ ज़रूरी काम निपटाने की कोशिश कर रहा था। … Read more

बेड़ियों की उड़ान

“ये आप क्या कह रहे हैं? अवनि अभी अपनी मास्टर्स की पढ़ाई पूरी करना चाहती है, उसका सपना एक सिविल सर्विस ऑफिसर बनने का है।” “अरे तो मैं कहाँ मना कर रहा हूँ। शादी के बाद अपने ससुराल में बैठकर जितनी मर्जी किताबें पढ़ ले। तुम अपना ये फालतू का ज्ञान देना बंद करो और … Read more

रिश्तों की असली वसीयत

शहनाई की गूंज और गेंदे के फूलों की महक से पूरा घर महक रहा था। घर के आंगन में शामियाना लगा हुआ था और मेहमानों की चहल-पहल से एक उत्सव का माहौल बना हुआ था। आज कावेरी जी की इकलौती बेटी शिखा की हल्दी की रस्म थी। कावेरी जी अपने माथे का पसीना पोंछते हुए … Read more

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