“मैं जानता हूँ कि तुम यहाँ अपने अतीत को समेटने आई हो,” माधव ने बहुत ही कोमल स्वर में कहा। “लेकिन जब तुम वापस दिल्ली लौटो, और अगर तुम्हें लगे कि उस बड़े शहर की भीड़ में तुम्हें एक ऐसे दोस्त की ज़रूरत है जो तुम्हारे साथ सिर्फ एक कप चाय पीकर तुम्हारी खामोशी को सुन सके, तो मुझे याद कर लेना।”
अनुराधा ने वह कागज़ का टुकड़ा ऐसे पकड़ लिया जैसे कोई डूबता हुआ इंसान तिनके को पकड़ता है। उसने अपनी नज़रें उठाईं और माधव की आँखों में देखते हुए कहा, “मैं ज़रूर फोन करूँगी। क्योंकि कुछ सफर मंज़िल पर पहुँच कर खत्म नहीं होते, बल्कि वहाँ से शुरू होते हैं।”
बारिश की बूँदें ट्रेन की खिड़की से टकराकर एक अजीब सी धुन बना रही थीं। दिल्ली से भोपाल जाने वाली इस ट्रेन के एसी कोच में एक अजीब सी शांति पसरी थी। खिड़की के पास बैठी अनुराधा की नज़रें बाहर के घने अंधेरे में कुछ तलाश रही थीं, लेकिन असल में वह अपने भीतर के खालीपन को टटोल रही थी।
तभी सामने वाली सीट पर आकर एक शख्स बैठा। उसका नाम माधव था। माधव की आँखों में एक गज़ब की गहराई और एक ऐसा ठहराव था जो किसी गहरे समंदर में ही पाया जाता है। उसकी नज़रें बहुत कुछ कह रही थीं, और उसकी बातों की कशिश—जो उसने टीटीई से बात करते हुए दिखाई थी—ने अनायास ही अनुराधा का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।
दूसरी ओर, माधव भी अनुराधा के चेहरे की सादगी और उसके शांत, लेकिन हंसमुख स्वभाव को देखकर अंदर ही अंदर एक सुकून महसूस कर रहा था। अनुराधा ने बहुत ही साधारण सी सूती साड़ी पहनी थी और उसके चेहरे पर किसी भी तरह के बनावटीपन का कोई नामोनिशान नहीं था। दोनों अजनबी थे,
लेकिन दोनों के बीच एक अनकहा सा आकर्षण जन्म ले रहा था। अनुराधा हमेशा से लोगों के चेहरे पढ़ना जानती थी। वह समझ गई थी कि माधव की आँखों में जो गहराई है, वह किसी बहुत बड़े दर्द या जीवन के किसी गहरे अनुभव की देन है।
यह जो खिंचाव दोनों महसूस कर रहे थे, वह किसी भी तरह से दैहिक या सतही नहीं था। यह एक नए आत्मिक रिश्ते की शुरुआत जैसा लग रहा था। दोनों की नजरों में एक-दूसरे के प्रति एक गहरा सम्मान और एक अनकही समझ दिख रही थी। ऐसा लग रहा था मानो बरसों से बंजर पड़ी दो ज़मीनों को अचानक बारिश की पहली बूँद नसीब हो गई हो। शायद दोनों को ही जीवन के इस मोड़ पर एक सच्चे दोस्त, एक हमसफर की ज़रूरत थी जो उन्हें बिना जज किए सुन सके।
रात गहरा रही थी। ट्रेन अपनी लय में दौड़ रही थी। शुरुआत एक हल्की सी मुस्कान और फिर चाय के कप के साथ हुई। अनुराधा ने अपने टिफिन से घर की बनी मठरी माधव की ओर बढ़ाई, और माधव ने बहुत ही सहजता से उसे स्वीकार कर लिया। बस यहीं से खामोशी टूटी। बातें करते हुए दोनों एक-दूसरे के इतने करीब आ गए कि उन्होंने अपने जीवन के वो पन्ने भी एक-दूसरे के सामने खोल दिए, जिन पर सालों से धूल जमी थी।
माधव ने बताया कि कैसे उसने अपनी पूरी ज़िंदगी अपने संयुक्त परिवार को एक धागे में पिरोए रखने में लगा दी। पिता के गुज़रने के बाद, बड़े भाई के रूप में उसने अपने छोटे भाई-बहनों की पढ़ाई और शादियों के लिए अपने खुद के सपनों की बलि चढ़ा दी। लेकिन जब उसकी अपनी पत्नी एक गंभीर बीमारी का शिकार हुई और उसे परिवार के साथ की सबसे ज्यादा ज़रूरत थी, तब सभी ने अपने हाथ पीछे खींच लिए। पत्नी के जाने के बाद माधव उस बड़े से घर में बिल्कुल अकेला रह गया। जिन भाई-बहनों के लिए उसने अपनी जवानी खर्च कर दी, वे आज त्योहारों पर एक फोन करने की भी ज़हमत नहीं उठाते। माधव की आवाज़ में कोई शिकायत नहीं थी, बस एक गहरी उदासी थी जिसने अनुराधा की आँखों को नम कर दिया।
अनुराधा भी कहाँ किसी से अपनी पीड़ा कह पाती थी। लेकिन माधव की उन गहरी आँखों ने जैसे उसे सब कुछ उगलने पर मजबूर कर दिया। अनुराधा ने बताया कि वह आज पैंतीस साल की हो चुकी है और अविवाहित है। जब वह पच्चीस साल की थी, तब उसके पिता को लकवा मार गया था। माँ पहले से ही कमज़ोर थीं। जिस लड़के से उसकी शादी तय हुई थी, उसने शर्त रखी कि शादी के बाद अनुराधा अपने माता-पिता की ज़िम्मेदारी छोड़ दे। अनुराधा ने उस रिश्ते को उसी पल ठुकरा दिया और अपनी पूरी ज़िंदगी अपने बीमार माता-पिता की सेवा में लगा दी। कुछ महीने पहले ही उसकी माँ भी इस दुनिया से विदा हो गईं। आज अनुराधा के पास एक सरकारी नौकरी तो थी, लेकिन घर लौटने पर दरवाज़ा खोलने वाला कोई नहीं था। वह भोपाल अपने उसी पुराने और अब वीरान हो चुके पुश्तैनी घर को बेचने जा रही थी, ताकि अतीत की परछाइयों से दूर कहीं एक नई शुरुआत कर सके।
दोनों ही पारिवारिक ज़िम्मेदारियों की वेदी पर अपने-अपने हिस्से की खुशियाँ कुर्बान कर चुके थे। दोनों की कहानियाँ अलग थीं, लेकिन दोनों का दर्द एक ही था—अकेलापन और अपनों द्वारा दी गई खामोश चोट। माधव ने जब अनुराधा की कहानी सुनी, तो उसकी आँखों में अनुराधा के प्रति सम्मान और भी बढ़ गया। उसने धीरे से कहा, “तुमने जो किया, वह कोई साधारण इंसान नहीं कर सकता। तुम्हारे माता-पिता बहुत खुशकिस्मत थे कि उन्हें तुम्हारे जैसी बेटी मिली।”
अनुराधा मुस्कुरा दी, एक ऐसी मुस्कान जिसमें सालों का ठहराव था। “और आपने जो किया माधव जी, वह भी तो एक तपस्या ही थी। कभी-कभी हम दूसरों का घर बनाते-बनाते खुद बेघर हो जाते हैं। लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि हमारी ज़िंदगी खत्म हो गई।”
अपनी ही दुनिया और बातों में दोनों इतने मग्न थे कि रात कब ढल गई और सुबह की पहली किरण ने कब ट्रेन के डिब्बे में प्रवेश किया, उन्हें खबर ही नहीं हुई। दोनों ने अपना दुख बाँटकर जैसे एक-दूसरे के मन का भारी बोझ हल्का कर दिया था। उस पूरी रात में उन्होंने एक बार भी एक-दूसरे का हाथ नहीं पकड़ा, कोई शारीरिक स्पर्श नहीं हुआ, लेकिन उनकी आत्माएँ एक-दूसरे से इस कदर जुड़ गई थीं जैसे जनम-जनम का साथ हो।
अचानक ट्रेन की स्पीड कम होने लगी और एनाउंसमेंट हुआ कि भोपाल स्टेशन आने वाला है। दोनों के बात करने का सिलसिला अचानक रुक गया। एक अजीब सी घबराहट दोनों के दिलों में होने लगी कि क्या यह सफर, यह साथ यहीं खत्म हो जाएगा? क्या यह सिर्फ एक ट्रेन की मुलाक़ात बनकर रह जाएगी?
माधव ने अपना बैग उठाया और अनुराधा की तरफ मुड़कर देखा। उसकी वो गहरी आँखें अब उदास नहीं, बल्कि एक नई उम्मीद से चमक रही थीं। उसने अपनी डायरी का एक पन्ना फाड़ा, उस पर अपना नंबर लिखा और अनुराधा की तरफ बढ़ा दिया।
“मैं जानता हूँ कि तुम यहाँ अपने अतीत को समेटने आई हो,” माधव ने बहुत ही कोमल स्वर में कहा। “लेकिन जब तुम वापस दिल्ली लौटो, और अगर तुम्हें लगे कि उस बड़े शहर की भीड़ में तुम्हें एक ऐसे दोस्त की ज़रूरत है जो तुम्हारे साथ सिर्फ एक कप चाय पीकर तुम्हारी खामोशी को सुन सके, तो मुझे याद कर लेना।”
अनुराधा ने वह कागज़ का टुकड़ा ऐसे पकड़ लिया जैसे कोई डूबता हुआ इंसान तिनके को पकड़ता है। उसने अपनी नज़रें उठाईं और माधव की आँखों में देखते हुए कहा, “मैं ज़रूर फोन करूँगी। क्योंकि कुछ सफर मंज़िल पर पहुँच कर खत्म नहीं होते, बल्कि वहाँ से शुरू होते हैं।”
ट्रेन स्टेशन पर रुक चुकी थी। दोनों अपने-अपने रास्तों पर आगे बढ़ गए, लेकिन वे जानते थे कि अब वे अकेले नहीं हैं। महज़ कुछ घंटों के इस सफर ने उनकी ज़िंदगी के खाली कैनवास पर एक ऐसा रंग बिखेर दिया था, जो कभी फीका पड़ने वाला नहीं था। एक अजनबी सफर ने उन्हें अपनेपन का वह अहसास दे दिया था, जिसकी उन्हें बरसों से तलाश थी।
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लेखिका : शशि चोपड़ा