सुबह की नीरव शांति में भी जैसे बिखरे शब्द निशा के कानों में गूंज रहे थे—
“ससुराल चली गई हो, तो अब मायके की चिंता तुम्हें क्यों होगी?
हमारा जो हो, सो हो… तुम्हें क्या?”
निशा की बात, उसकी सफाई—कुछ भी सुना नहीं गया।
एक झटके में जैसे उसका मायके का आँगन उससे छीन लिया गया था।
उसे लगा जैसे उसकी ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा उससे दूर हो गया हो।
मन पीड़ा से भर गया, गले से शब्द निकलना बंद हो गए।
वह अपने घर तो लौट आई थी, पर उसका हृदय अब भी मायके के उसी आँगन में अटका हुआ था।
दरअसल, उस दिन निशा बहुत खुश होकर मायके जा रही थी।
रास्ते में गाँव के सरपंच मिल गए। हाल-चाल पूछने के बाद उन्होंने कहा—
“बेटा, मैं तुम्हारे भाई के घर ही जा रहा था… अब तुम मिल गई हो तो तुमसे ही पूछ लेता हूँ।
गाँव का विकास होने वाला है, सर्वे चल रहा है… तुम्हारे भाई का घर किसके नाम पर है?”
निशा ने सहजता से जवाब दिया—“पिताजी के नाम पर।”
“कागज़ पूरे हैं ना?”
“चाचा जी, ये तो मुझे नहीं पता…” —कहकर निशा आगे बढ़ गई।
लेकिन उसकी यही बात तूफ़ान बन गई।
जब निशा ने घर जाकर यह बात बताई, तो भाई-भाभी बहुत नाराज़ हो गए।
असल में कोई सर्वे नहीं हो रहा था—सरपंच की नज़र उस घर पर थी।
गाँव के बीचों-बीच होने के कारण वह जगह काफ़ी कीमती थी, जहाँ सरकार बाग़ बनाना चाहती थी।
अगर वह घर सरपंच के हाथ लग जाता, तो उसे बड़ा फायदा होता।
निशा के भाई ने बिना विवाद के बात खत्म करने के लिए पहले ही कह दिया था कि घर छोटे भाई के नाम है, जो विदेश में है और बेचने को तैयार नहीं।
मामला वहीं शांत हो गया था…
पर अब, अनजाने में ही सही, निशा से बात बिगड़ चुकी थी।
रात भर निशा इसी सोच में डूबी रही।
अनजानी भूल का बोझ उसे अंदर ही अंदर खाए जा रहा था।
पति ने जब उसकी उदासी देखी, तो कारण पूछा।
निशा सब बताकर फूट-फूटकर रो पड़ी।
पति ने उसे समझाया, संभाला… और फिर कुछ ऐसा कहा जिससे निशा के मन में उम्मीद की किरण जाग उठी।
अगली सुबह, निशा अपने मायके पहुँची।
आँगन में सरपंच और कुछ गाँव वाले खड़े थे, घरवालों को समझा रहे थे।
निशा ने आगे बढ़कर सबको प्रणाम किया और विनम्रता से कहा—
“सरपंच जी, आइए… अंदर बैठकर बात करते हैं। बाहर धूप भी ज़्यादा है।”
सब अंदर आ गए।
निशा ने भाभी से कहा—“थोड़ा शरबत बना दीजिए।”
घरवाले अब भी नाराज़ थे, पर चुप रहे।
फिर निशा ने शांत स्वर में बात शुरू की—
“गाँव का विकास हो, इससे बड़ी खुशी क्या हो सकती है… और मेरा भाई भी इसके लिए उत्सुक है।
लेकिन यह घर पिताजी के नाम है, इसलिए इस पर मेरा और मेरे छोटे भाई का भी हक़ है।
हमारी अनुमति के बिना कुछ भी संभव नहीं।”
थोड़ा रुककर उसने आगे कहा—
“और एक बात… हमारे पुरखों की अंतिम इच्छा थी कि इस घर में कुलदेवी का मंदिर बने।
उनका मानना था कि हमारी तरक्की उसी आशीर्वाद से हुई है।
यह घर सिर्फ एक ज़मीन नहीं, हमारी आस्था और विरासत है।”
“अगर बाग़ बनाना है, तो गाँव में और भी खाली ज़मीन है…
विकास भी हो जाएगा और हमारी भावनाएँ भी सुरक्षित रहेंगी।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
सरपंच समझ गया—अब यह घर मिलना संभव नहीं।
बात बढ़ाने का कोई फायदा नहीं था।
वह और बाकी लोग चुपचाप चले गए।
भाभी ने आकर निशा को गले लगा लिया।
दोनों की आँखों से आँसू बह निकले।
निशा ने भाई से कहा—
“कुछ भी हो जाए, यह मेरा मायका है… मेरी ज़िंदगी का हिस्सा है।
इसके सुख-दुख से मुझे फर्क पड़ता है।”
भाई-बहन एक-दूसरे से लिपटकर रो पड़े।
“बगिया बड़ी जीवन की होती है,
जो मायके से ससुराल के बीच बिछी होती है…”
वैशाली आडेसरा
राजकोट, गुजरात