वक्त की मार – करुणा मलिक

  पार्वती, बस कर, बाकी काम सवेरे खत्म कर लेंगे। घर पहुँचते-पहुँचते दिन ढल जाएगा। 

हाँ जिज्जी, सोच तो मैं भी यही रही थी पर कहीं बूँद ना पड़ जाएँ रात में….. बड़ी मुश्किल से तो गेहूँ काटे है ं … 

ना… आज रात बूँद ना पड़ेगी। और पड भी गई तो, कितने गेहूँ खड़े हैं अब…. चल जल्दी कर, घर में बालक भी अकेले बैठे होंगे, छोड़ लालच। 

चलो फिर, कहते हुए पार्वती ने हाथ में पकड़े कटे गेहूँ की पूली  बाँधी और दरांती हाथ में लेकर अपनी जेठानी लता के साथ टयूब वेल की तरफ हाथ-पाँव धोने चल पडी़। दोनों ने कपड़े झाड़कर हाथ-पांँव – मुँह धोकर पानी पिया और दो घड़ी सुस्ताई। 

जिज्जी, दोनों मजदूरों का तो हिसाब कल करना पड़ेगा, कल ज्यादा से ज्यादा तीन- चार घंटे में सारे गेहूँ कट जाएँगे। 

ना… कल पूरा हिसाब ना करेंगे, खर्चे लायक गेहूँ टंकी में भरवाकर, इन दोनों को ही मंडी ले चलेंगे। इनका अपना ट्रैक्टर है…हम दौड़ भाग से बच जाएँगे। एक बार पूरा हिसाब कर दिया तो ढूँढने पर भी आदमी ना मिलेंगे, मंडी में गेहूँ पहुँचाने वाले…. 

घर पहुँचने पर देखा कि चारों बच्चे बाहर बरामदे में ही थे। लता के दोनों बेटे दीपक और धीरज तथा पार्वती का बड़ा बेटा धरम और बेटी दीया  माँ को देखते ही उनकी तरफ भागे। दीपक ने माँ और चाची के हाथ से खाने के बरतन तथा खेतों से लाई सब्जी पकड़ी। धरम रसोई की तरफ चल पड़ा लेकिन धीरज और दीया तो माँ के घुटनों से जा चिपके-

आज भी कितनी देर में आई हो माँ, कल मैं स्कूल नहीं जाऊँगी, तुम्हारे साथ खेत में गेहूँ काटने चलूँगा। 

दीया स्कूल में ना जाएगी तो मैं भी नहीं जाऊँगा, मुझे भी खेतों में गेहूँ काटने है ं। 

तभी लता ने दोनों को अपनी गोद में खींचते हुए कहा-

तुम क्यों काटोगे गेहूँ…. भगवान् तुम्हारी किस्मत बनाए, मेरे चारों बच्चे तो पढ़ लिख कर अफसर बनेंगे। पार्वती, देख ले रसोई में धरम को . … चाय बना रहा होगा। उसे पता है कि बिना दो घूँट चाय पिए, शरीर ना चलेगा। 

चाची, तुम दोनों ही सुस्ता लो… चाय मैं लेकर आता हूँ।, कहकर दीपक रसोई की तरफ चल पड़ा। 

चलो, तुम दोनों भाई-बहन अपना खेलने का सामान समेटो, स्कूल से मिला काम किया या नहीं? दीपक भाई और धरम भाई को परेशान तो ना किया था? 

पूछते-पूछते लता का गला रुंध गया। दीपक और धरम कौन सा बड़े हो गए हैं पर हालात को देखकर दोनों का बचपन कहीं खो गया है, दीपक अकसर माँ और चाची के हाथ पकड़कर कहता _ 

बस कुछ दिनों बाद मैं बड़ा हो जाऊँगा फिर हवेली वाली अम्मा की तरह बिस्तर पर लेटकर हुक्का गुड़ गुड़ करना। 

और दोनों हँस पड़ती – 

चल, पगला कहीं का…. अब हमें हुक्का पीना भी सिखाएगा। 

बेचारा दीपक शरमा जाता, वह तो यही समझता था कि जिसे किसी चीज की कमी नहीं होती, वह बिस्तर पर लेटकर हुक्का गुड़गुड़ाता है। अभी उम्र ही क्या थी  दीपक आठवीं की परीक्षा लिख रहा था, धरम सातवीं की, धीरज चौथी कक्षा में तो दीया पहली कक्षा में थी। 

इतने में धरम प्यालों में चाय लेकर आया और लता तथा पार्वती को पकड़ा दिए। चाय पीकर थोड़ी थकान दूर हुई। अब पार्वती ने खेत से लाए टमाटर काटकर आलू टमाटर की सब्जी छोंक दी तथा आटा सानकर रोटियाँ सेंकी ली। लता ने दोनों गायों को चारा-पानी दिखाकर दूध निकाला। एक गाय का दूध दुधिया को बेच देती थी और दूसरी का घर- खर्च के लिए रखती थी। 

बच्चों को खिलाने- पिलाने के बाद दोनों ने एक ही कटोरे में सब्जी निकाली और खाने बैठ गई। मगर लता देख रही थी कि पार्वती केवल नाम की खातिर टुकड़े तोड़ रही थी। 

पारो, ध्यान कहाँ है तेरा? चार टुकड़े भी ना खाए तैने तो… 

बस जिज्जी, रोटी मुँह में फूल रही है, इच्छा ही नहीं, दूध पी लूँगी। 

चल ठीक है। शायद ज्यादा थक गई आज। चल… उठ, लेट जा, बाकी बचा काम धरम करवा देगा मेरे साथ! 

ना जिज्जी, तुम आराम करो, मैं आप कर लूँगी। चल बेटा धरम, बड़ी माँ के तलुवों पर थोड़ा सरसों का तेल लगा दे, सिखाया था ना एक दिन? मैं बस अभी आई। 

तभी धीरज और दीया एक साथ बोल उठे- 

हमें भी तेल लगाना है माँ के पैरों में…. 

इन्हें तो हर काम के बीच में घुसना है, बताओ, ये तेल लगाने लायक हुए हैं क्या? 

इतने में पार्वती रसोई समेटकर हाथ पोंछती आई। उसे आया देख लता ने धरम से कहा- मेरा सोहना बेटा, जीता रह, चल अपनी माँ के तलुवों पर भी लगा दे, भगवान् तुझे लंबी उम्र दे। 

इसी बीच दोनों छोटे सो गए। पार्वती के पैरों पर तेल लगाकर धरम बगल के कमरे में चला गया, वह बड़े भाई के साथ ही सोता था। 

पारो, अब बता…. रोटी क्यों ना खाई गई? क्यों मन भारी है? 

इतना सुनते ही पार्वती की हिचकियाँ बंध गई। मन के शांत होने पर बोली–

जिज्जी, क्या मिला भगवान् को…. हमारे बच्चों के सिर से पिता का हाथ छीन लिया। साल के भीतर दोनों भाई चले गए। बुखार में भी भला कोई जाता है, अस्पताल ले तो गए थे। आज खेत में लाजो कह रही थी कि किसी ने कुछ करवा रखा है वरना दोनों भाई दो दिन के बुखार में कैसे चले गए? 

दलदल में ना फँस बहन, जब # वक्त की मार पड़ती है ना… पूछकर ना पड़ती। इतनी ही लिखवाकर आए थे दोनों। भगवान् की मरजी के आगे सब बेबस हैं। वक्त पलटेगा, सब दिन एक से ना रहते। कुछ सालों का इम्तिहान है, दोनों साथ मिलकर पास होंगे ही..अभी गरम दूध लेकर आई , सो मत जाइयो । हमें अपने बच्चों की खातिर अपना ध्यान रखना है। 

धीरे धीरे समय गुजरता गया पर दोनों जेठानी- देवरानी एक दूसरे की ढाल बनकर खडी़ रही। आखिर उस दिन वक्त ने पलटी मारी , जब उनके चारों बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो गए और उनके घर बस गए। उस समय दोनों हँस-हँसकर लोटपोट हो जाती थी, जब अक्सर दीपक उन्हें छेड़ते हुए कहता- 

माँ, बिस्तर पर लेटकर हुक्का तुम गुड़गुड़ाओगी या चाची? 

और दोनों उसे प्यार भरी चपत लगा देती। 

करुणा मलिक

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