पापा, आप तो कह रहे थे कि प्रिया को मम्मी जैसा अच्छा खाना बनाना आता है। गट्टे की सब्जी और साग तो वह मम्मी से भी अच्छा बनाती है। यहां तो हालत यह है कि सवेरे की चाय अभी भी मैं ही बनाता हूं। हम तो सोच रहे थे की मां के जाने के बाद यह घर फिर से बस जाएगा हम तो उम्मीदों का नया सवेरा आने सोच रहे थे परंतु यहां तो कुछ भी बदलाव नहीं हुआ। चुप कर, जोर से मत बोल। कहीं प्रिया सुन ना ले। पापा बोले मैं तो जब भी उनके घर गया था, यही मेरे लिए खाना लगाती थी और वह खाना बिल्कुल ऐसे लगता था मानो तेरी मां ने ही बनाया हो। खैर पहले तो जोमैटो से अब के लिए खाना मंगवा। महाराज तो अब गांव में ही रहना चाहता था परंतु फिर भी मैंने उसे एक महीने बाद आने के लिए कह दिया है। बहू आ गई थी तो मैंने सोचा कि अब तो वह घर संभाल ही लेगी, शादी पर भी महाराज ने बहुत काम निभाया था।
नितिन ने जोमैटो से शाम के खाने का ऑर्डर दिया और अपने वॉशरूम में चला गया। आइए आपको इनके बारे में बतलाएं:-
नितिन और प्रिया की शादी अभी 1 महीने पहले ही हुई थी। क्योंकि नितिन की मम्मी 2 साल पहले डेंगू बुखार होने के कारण इस दुनिया से चली गई थी। उसके बाद कुछ दिन तो कविता दीदी ने घर पर रहकर काम चलाया अंततः वह भी अपने ससुराल चली गई। खाना बनाने के लिए उन्होंने महाराज को लगा लिया था। शांताबाई झाड़ू पोछा और बर्तन करती थी महाराज दोनों समय का भोजन बना देता। नितिन और उसके पापा दोनों ही अपना अपना लंच लेकर ऑफिस निकल जाते थे। अभी जब वर्मा जी के मित्र ने नितिन से प्रिया के रिश्ते की बात चलाई वर्मा जी ने सहज स्वीकार कर लिया। प्रिया उनके गांव की ही थी वर्मा जी को ऐसी ही एक घरेलू लड़की की तलाश थी जो कि घर को एक नया जीवन दे सके।
प्रिया ने बी.ए / बी.एड करा हुआ था और गांव में वह एक प्राइवेट स्कूल में भी पढ़ाने जाती थी। घर के कामों में उसे कोई खास रुचि नहीं थी। जब उसके लिए नितिन का रिश्ता आया तो उसके मन में बहुत खुशी हुई कि उसे ऐसा घर मिलेगा जिसमें कि उसे रोकने टोकने को सास है ही नहीं। अभी उसकी शादी को एक महीना ही हुआ था, 15 दिन तो कविता दीदी घर पर ही थी। उनके हनीमून से घूमकर वापस आने के कुछ दिन बाद वह अपने घर चली गई थी। सुबह सवेरे प्रिया को जल्दी उठने की आदत तो थी नहीं। नितिन जल्दी उठकर अपने पिता के लिए चाय बनाता था तो प्रिया के लिए भी ले आता था महाराज और शांताबाई तो 7:00 बजे तक ही आते थे। क्या बनाना है यह महाराज को वर्मा जी अब भी बताते थे । महाराज का लगाया हुआ लंच लेकर वह दोनों ऑफिस चले जाते थे।
खाली समय में प्रिया मजे से टीवी देखती थी या सिंगार करती रहती थी। सुबह तो महाराज आया था प्रिया को तो किसी ने बताया भी नहीं था कि शाम से महाराज को नहीं आना है। शाम को जब वर्मा जी और नितिन घर पर आए तो प्रिया ने नितिन को बताया कि आज महाराज नहीं आए हैं और खाना नहीं बना है। नितिन ने जब प्रिया से कहा कि खाना तुम बना लेती तो उसने जवाब दिया कि मुझे खाना बनाना नहीं आता।
उससे बिना कुछ बोले नितिन अपने पापा के पास गया और पापा के कहने पर उसने जोमैंटो से खाने का ऑर्डर किया तो पापा उसको समझा रहे थे कि हम कोई और खाने का इंतजाम कर लेंगे बिना वजह बहु से झगड़ना नहीं ।प्रिया ने दोनों की बातें सुन ली थी।
दूसरे दिन से शांताबाई को ही खाना भी बनाने के लिए कह दिया गया लेकिन उसका बनाया हुआ खाना किसी को भी पसंद नहीं आता था । हालांकि यूट्यूब से प्रिया ने कुछ खाना बनाना सीखने की सोची लेकिन वह अच्छा खाना ना बना पाई।
महाराज के वापस आने के बाद प्रिया ने कुछ दिनों के लिए अपने मायके जाने की इजाजत मांगी। वर्मा जी के हां बोलने पर प्रिया का भाई उसे मायके ले गया था। अब उसने अपनी मां को सारी परिस्थिति समझाई और कहा उस घर में तो मुझे खाना बनाना सीखना जरूरी है। हालांकि पापा और नितिन कुछ नहीं कहते लेकिन वहां का खाना हम सब को अच्छा नहीं लगता। प्रिया की बात समझ कर उसकी मां ने उसे बहुत अच्छी तरीके से खाना बनाना सिखा दिया था।
अब के ससुराल आने पर प्रिया ने जल्दी उठकर पहली बार बाबूजी और नितिन के लिए सुबह सवेरे चाय बनाई। महाराज ने आने के बाद हमेशा के जैसे बाबूजी को और नितिन का लंच पैक कर दिया था। शाम को जब डाइनिंग टेबल पर तीनों खाना खाने बैठे तो गट्टे की सब्जी, सरसों का साग और नितिन की पसंद का मूंग की दाल का हलवा सजा हुआ था। खुशी खुशी खाना खाते हुए नितिन ने कहां तुम्हारे आने के बाद आज पहली बार महाराज ने अच्छा खाना बनाया है। हंसते हुए प्रिया ने जवाब दिया कि नहीं,खाना मैंंने बनाया है और अब महाराज वापस जाना चाहते थे तो मैंने उन्हें छुट्टी दे दी है। खाना खाने के बाद बाबू जी ने प्रिया के हाथ में मम्मी की अलमारी से एक पायल निकालकर प्रिया को दी और कहा बहु यह तुम्हारे खाना बनाने का नेग है। इतने समय बाद घर में वही पुरानी खाने की महक आई है इस पायल को अपनी सासु मां की तरफ से आशीर्वाद ही मानना। प्रिया बहुत खुश हुई और वास्तव में उसने अपने प्यार से पूरे घर को अपना बना लिया था और वर्मा जी को भी लगता था मानो उनकी पत्नी भी स्वर्ग से अपनी बहू को बहुत-बहुत आशीर्वाद देती हों।
मधु वशिष्ठ फरीदाबाद हरियाणा