“जब एक भूल ने छीन लिया मायके का आँगन” – वैशाली आडेसरा

सुबह की नीरव शांति में भी जैसे बिखरे शब्द निशा के कानों में गूंज रहे थे— “ससुराल चली गई हो, तो अब मायके की चिंता तुम्हें क्यों होगी? हमारा जो हो, सो हो… तुम्हें क्या?” निशा की बात, उसकी सफाई—कुछ भी सुना नहीं गया। एक झटके में जैसे उसका मायके का आँगन उससे छीन लिया … Read more

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