गर्व – बिमला रावत जड़धारी

काव्य आज बहुत खुश थी। जिसका सपना मैंने देखा था, उसे सुभाष ने पूरा करने में मेरा पूरा साथ दिया।सुभाष मेरे पति को

पता चला कि मुझे पेंटिंग बनाने का बहुत शौक है और मैं बहुत अच्छी पेंटिंग बनती हूॅं। मेरी इच्छा है किसी आर्ट गैलेरी में

मेरी बनाई पेंटिंग की प्रदर्शनी लगे।उन्होंने मुझे कभी ज़ाहिर ही नहीं होने दिया कि उन्हें मालूम है मेरी इच्छा के बारे में। वह

हमेशा मुझसे पूछते, काव्य, तुम्हारे कोई शौक नहीं है क्या? कुछ ऐसा जिसे तुम पूरा करना चाहती हो तो कर सकती हो।मैं

हमेशा मना कर देती नहीं, मेरे कोई शौक नहीं है।मैं सुभाष को कैसे बताती कि शौक तो है पर इससे पहले घर की

जिम्मेदारी है। सासू माॅं ने मुझे शादी के तीन दिन बाद ही बोल दिया था, ये घर अब तुम्हें ही संभालना है। मुझे गठिया है,

ये देखो मेरी हाथ की ऊंगलियॉं और पैर, पर मुझसे जितना हो सकेगा मैं काम करूंगी। अगर मैं बैठ गयी तो हमेशा के लिए

बैठ जाऊंगी। तुम्हारी ननद नौकरी वाली है। वो भी तुम्हारे साथ काम में मदद करेंगी पर कितना, कह नहीं सकती। रही

तुम्हारे ससुर जी और सुभाष की बात, वह तुम्हारी कितनी मदद करेंगे मैं कुछ नहीं कह सकती। जब मूड होगा तो घर, बाहर

सब काम करेंगे, नहीं होगा तो बिल्कुल नहीं करेंगे। एक बात और, रात का खाना हम सब एक साथ बैठकर खाएंगे। तुम भी

साथ बैठोगी।पर मम्मी मैं कैसे बैठ सकती हूॅं?कैसे नहीं बैठ सकती। आठ बजे सुभाष घर आता है। जब तक वह फ्रैश होता

है तब तक तुम और तुम्हारी ननद साथ मिलकर खाना तैयार करके टेबल में लगा देना। ऐसा रोज होगा।जी मम्मी जी।कुछ

महीने बाद जब मेरा जन्मदिन आया तो एक छोटी सी पार्टी रखी। पार्टी क्या उसमें मेरे मम्मी पापा, भाई और मेरे सास

ससुर और ननद थे। खाना बाहर से लाया गया। सभी बैठे आपस में बातें कर रहे थे। तभी सुभाष केक लेकर आया और केक

काटने के बाद सबने गिफ्ट दिये।मेरे मम्मी पापा ने मुझे साड़ी और भाई ने मुझे घड़ी दी। सास – ससुर ने भी मुझे साड़ी और

ननद ने मुझे पाजेब दिया। सुभाष ने मुझे जो गिफ्ट दिया उसे देखते ही मुझे इतनी खुशी मिली जैसे किसी छोटे बच्चे को

उसका मन पसंद खिलौना मिल गया हो। उसमे पेंटिंग का समान था। तभी मेरी नजर अपने पापा की तरफ गयी। देखा उन

का चेहरा गुस्से से लाल था। क्योंकि उन्हें कभी भी मेरा पेंटिंग करना पसन्द नहीं था।अरे सुभाष बेटा, घर के कामों में काव्य

ये सब कहॉं कर पाएगी। तुम्हें किस ने कहा काव्य को पेंटिंग करनी आती है।हाॅं सुभाष, पापा सही कह रहें हैं। और तुम्हें

किसने कहा कि मुझे पेंटिंग का शौक है। वैसे तुम्हारा ये गिफ्ट बहुत अच्छा है। मैं सीखने की कोशिश करूंगी।मुझे सब मालूम

है काव्य। तुम अपने लिए समय निकालो और दुबारा पेंटिंग शुरू करो।सासू माॅं भी बोली, बेटा सुभाष सही कह रहा है।

अगर समय निकाल सकती हो तो अपना शौक पूरा करो।जी मम्मी जी।इस तरह दिन महीने साल निकल गए। ननद की

शादी हो गयी। मेरे दो बच्चे हो गये। पर कभी लग के पेंटिंग नहीं कर पाई। सुभाष ने तो पेंटिंग करने के लिए बोलना ही छोड़

दिया। एक दिन सास बोली, बेटा घर के काम और जिम्मेदारी कभी खत्म नहीं होती। बच्चें अब बड़ी क्लास में चलें गये हैं।

अपना काम और पढ़ाई भी अपने आप कर रहे हैं। वो तो पढ़ लिख कर नौकरी के लिए निकल जाएंगे। बेटा अगर तुम अब भी

अपने लिए समय नहीं निकाल पा रही हो तो फिर कभी नहीं निकल पाओगी। बेटा अब अपने शौक पूरे करो। अगर पेंटिंग की

क्लास लेना चाहती हो तो ले सकती हो। बाकी तुम्हें जो ठीक लगे। हमारी तरफ से तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी।अब मैं

पूरा मन लगाकर पेंटिंग करने लगी। सुबह घर का काम निपटा कर शाम का समय सिर्फ मेरा होता। पेंटिंग में इतनी रम गयी

कि अपनी मन की भावनाओं को पेंटिंग में उभारने लगी। मेरी लगन देखकर सुभाष बहुत खुश था। सास ससुर और बच्चों ने

मेरा पूरा साथ दिया। जो भी मेरी पेंटिंग देखता, देखता ही रह जाता । सभी कहते आप बहुत अच्छी पेंटिंग बनाती है। अपनी

पेंटिंग की प्रदर्शनी क्यों नहीं लगाते।एक दिन सुभाष का एक दोस्त आया और बोला भाभी जी आप बहुत अच्छी पेंटिंग

बनाती हो। जब शरद उत्साव मेला का आयोजन होगा तो वहॉं अपनी पेंटिंग का प्रदर्शनी लगाओ, लोगों की प्रतिक्रिया देखो

कैसी है। मेरा एक दोस्त है जो आर्ट गैलरी में उभारते हुए कलाकारों की पेंटिंग का प्रदर्शन करता है। उसकी बिजनेस वाले

लोगों से अच्छी पहचान है, वह सभी को निमंत्रण भेजता है। वह लोग सभी कलाकारों का उत्साह बढ़ाते हैं। उन्हें अगर

पेंटिंग पसंद आती है तो वह खरीदते भी है। पेंटिंग का प्रदर्शन किसी थीम में रखना होगा। परन्तु इन सब कामों में अच्छा

खासा पैसा खर्च करना पड़ता है।यार तुम पैसों की चिंता मत करो, बस तुम अपने दोस्त से बात कर लो। और उनसे बोलना

चित्रकार विनोद कुमार जी आ जाऐ तो बड़ी कृपा होगी।सुभाष ने कहा।सच में अगर जाने माने चित्रकार विनोद कुमार

जी मान जाते है, मेरी प्रदर्शनी का उद्धाटन करने के लिए तो मेरे लिए गर्व की बात होगी। मैं और विनोद कुमार जी एक ही

काॅलेज में पढ़ते थे। वे हमारे सिनियर थे। वह अपनी पेंटिंग की प्रदर्शनी कालेज में भी लगते थे। उनकी पेंटिंग देख – देखकर

मेरा झुकाव भी पेंटिंग की तरफ हो गया। पेंटिंग की बारिकियों मैंने उन्हीं से सिखी।तभी दरवाजे की घंटी बजती है । मैं अपने

ख्यालों से वापस आती हूॅं। दरवाजा खोलती हूं तो समाने सुभाष जी होते हैं और पूछ्ते हैं, मम्मी पापा और बच्चे आ गए

क्या?:नहीं अभी नहीं आए।तुम्हारे लिए खुश खबरी है।क्या?चित्रकार विनोद कुमार जी आने के लिए तैयार हो गये

है।सच में, ये तो बहुत अच्छी खुश खबरी है।तभी दरवाजे की घंटी बजती है। सास – ससुर, बच्चें भी आ जाते। जब उन्हें

बताते है तो सभी बहुत खुश होते हैं। और आगे का प्रोग्राम बनाने लगते हैं।आज सभी को काव्य पर अभिमान महसूस हो रहा

था।- 

बिमला रावत जड़धारी 

कहानी प्रतियोगिता :- अभिमान

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