महलों की छाँव और मिट्टी की धूप

गंगा की तराई वाले एक छोटे से कस्बे में सुबह की पहली किरण जब कच्ची दीवारों पर पड़ती, तो कंचन के घर की रसोई से छन-छनकर इलायची और ताज़ी चाय की महक गली तक फैल जाती थी। कंचन का संसार सीमित था, पर उसकी सीमाएँ कभी किसी तंगी की वजह से संकरी नहीं हुईं। उसके … Read more

दिलों की सरहदें

 बद्रीप्रसाद जी की आँखों से पश्चाताप के आँसू छलक पड़े। उन्होंने थरथराते हुए हाथ उठाकर देवाशीष के कंधे पर रख दिए और रोते हुए बोले, “बेटा, मैंने दौलत के नशे में अंधा होकर हीरे को कंकड़ समझ लिया था। मैंने हमेशा इंसानियत को पैसों से तौला, लेकिन आज मेरे पास न वह दौलत बची है … Read more

दहलीज का मान

 “मेरा दिमाग अब जाकर सही ठिकाने पर आया है, फैजान। जो लड़की अपने उन माँ-बाप के प्यार और भरोसे की नहीं हो सकी जिन्होंने उसे उंगली पकड़कर चलना सिखाया, वह कल तुम्हारी कैसे हो सकती है? और तुम… अगर तुम मुझसे वाकई सच्चा प्यार करते, तो मुझे इस तरह रात के अंधेरे में अपनों की … Read more

अपना पराया

 घर के इस तनाव का सबसे आसान और मूक शिकार बना माधव। सरिता को लगता था कि घर के सारे संकटों की जड़ माधव ही है। “यह दिन भर खाता है, कपड़े गंदे करता है, कभी नल खुला छोड़ देता है तो कभी बर्तन तोड़ देता है! इसके इलाज और दवाओं में हर महीने दो-तीन … Read more

राख में दबी चिंगारी

“नहीं नितेश,” मैंने गर्व से भीगे स्वर में कहा। “भाभी हारी हुई नहीं थीं। अवधेश भैया ने जिस औरत को अनपढ़ और बेमेल समझकर फेंक दिया था, उसी औरत ने गाँव की सौ लड़कियों का भविष्य संवारा। आज जब उनका अंतिम संस्कार हो, तो उनके पार्थिव शरीर को किसी असहाय परित्यक्ता की तरह विदा मत … Read more

कंक्रीट का जंगल और उम्मीद की धूप

 शारदा जी के भीतर न जाने कहाँ से एक अजीब सा साहस जागा। उन्होंने व्हीलचेयर को बिस्तर के पास लगाया। अपने पूरे शरीर का बल लगाकर, हांफते हुए उन्होंने ओंकारनाथ जी को सहारा दिया और खींचकर व्हीलचेयर पर बिठाया। ओंकारनाथ जी डर गए कि कहीं वे गिर न जाएं, पर शारदा जी के चेहरे पर … Read more

छाले और सितारे

 रूही ने अपनी माँ के पैर छुए। जानकी ने कांपते हाथों से अपनी बेटी के सिर पर हाथ रखा। जब रूही ने अपना लैपटॅाप बैग संभाला और मुस्कुराते हुए एयरपोर्ट के स्वचालित दरवाज़ों की ओर कदम बढ़ाए, तो जानकी की आँखों से आँसुओं की अविरल धारा बह निकली। यह आँसू उन पुराने दुखों, जिल्लतों और … Read more

चूल्हे की पहली महक

  हर दिन की तरह, कौशल्या जी की आँखें बिना किसी अलार्म के खुल गईं। उम्र के पैंसठवें पड़ाव पर पहुंचकर शरीर में जोड़ों का दर्द और थकान तो आम बात हो गई थी, लेकिन दशकों पुरानी आदतें इतनी जल्दी कहाँ छूटती हैं। वे धीरे से बिस्तरे से उठीं, अपनी सूती साड़ी का पल्लू संभाला और … Read more

साझी उड़ान

 “अनन्या, मुझे माफ़ कर दो,” राघव की आवाज़ थोड़ी भारी थी। “उस दिन जब मैंने कहा था कि तुम गृहस्थी संभालो और मुझे पढ़ने-लिखने दो, तब मैं एक बहुत बड़े मुगालते में जी रहा था। मुझे लगता था कि पैसा कमाकर और सुख-साधन जुटाकर मैंने अपना फर्ज़ पूरा कर दिया। लेकिन पिछले कुछ दिनों में … Read more

अनकही लौ

 रघुनाथ जी दौड़कर अपनी बेटी के पास पहुँचे और उसके पैरों में गिर पड़े। उनके आँसुओं से अवनि के पैर भीग गए। वे फफक-फफक कर रोते हुए बोले, “बेटी, मुझे माफ कर दे! हमने तुझे घर का बोझ समझा, तेरे दर्द को नहीं समझा और तुझे जिंदा लाश समझकर छोड़ दिया। तूने तो आज हमारा … Read more

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