स्वाभिमान की डोर

 जानकी देवी की आँखों से एक आंसू ढुलककर नंदिनी के माथे पर जा गिरा। उन्होंने उसे पोंछते हुए कहा, “यही इस समाज की सबसे कड़वी सच्चाई है बेटी। जब कोई बहू घर में सबको संभालकर चलती है, सबका आदर करती है, मीठी बोली बोलती है, तो लोग कहते हैं कि बड़े अच्छे कुल की बेटी … Read more

औकात

मंजरी ने व्यंग्य से हंसते हुए कहा, “यही तो सबसे बड़ी कमी है भाई साहब! आपके पास करोड़ों की जायदाद है, लेकिन आपके बेटे के पास अपनी कोई औकात नहीं है! यह लड़का जो सत्ताईस साल की उम्र में भी अपने बाप की जेब पर पलता है, जो अपनी जिंदगी में एक रुपया खुद कमाने … Read more

सुरमयी आंगन

 जानकी जी मंत्रमुग्ध होकर अपनी बेटी की बातें सुन रही थीं। उनके चेहरे पर एक असीम संतोष और गर्व का भाव था। उन्होंने ईशानी का सिर अपनी गोद में रख लिया और बोलीं, “बेटी, तू सचमुच बहुत भाग्यशाली है। जिस घर के बुजुर्ग जिंदगी को इस तरह जिंदादिली से गले लगाते हैं, उस घर में … Read more

तीन धागे और एक डोर

 मनोरमा देवी भीतर ही भीतर छटपटाने लगीं। उनका बनाया तिलिस्म टूट चुका था। उन्हें लगने लगा कि अब इस घर में उनकी कोई अहमियत नहीं रही। इसी तनाव और खीझ में एक दिन उनका रक्तचाप अचानक बहुत बढ़ गया और वे चक्कर खाकर आँगन में गिर पड़ीं। उस वक़्त घर पर कोई पुरुष नहीं था। … Read more

दर्द की अनदेखी

 रात के करीब दो बजे अनिकेत की नींद खुली। प्यास लगने पर वह पानी पीने के लिए उठा। जब वह पल्लवी के कमरे के पास से गुज़रा, तो उसे अंदर से धीमी कराहने की आवाज़ आई। अनिकेत के कदम ठिठक गए। उसने धीरे से दरवाज़ा खोला। नाइट लैंप की हल्की रोशनी में उसने देखा कि … Read more

पिता का त्याग

 अंकिता ने आंसुओं से भीगा चेहरा उठाया और विवेक के सामने हाथ जोड़ दिए, “विवेक, मुझे सजा दे लो, मुझे जो कहना है कह लो। लेकिन मुझे आज समझ आया है कि अपनी संतान से दूर होने का दर्द क्या होता है। जब मेरा बेटा मुझसे एक दिन बात नहीं कर रहा तो मेरी जान … Read more

दहलीज का सुकून

 “हमारी भलाई सोचने के लिए हम खुद सक्षम हैं दीदी,” कौशल्या जी ने दो टूक कहा और मुख्य दरवाज़े की ओर इशारा करते हुए हाथ जोड़ लिए, “हमें अपना घर, अपनी बहू और अपने बच्चे संभालने आते हैं। हमारे घर में प्यार है, सम्मान है और एक-दूसरे पर अटूट विश्वास है। यहाँ किसी की गंदी … Read more

आँचल की ममता

 मयंक ने अपनी बहन को देखा और उसके गले लगकर छोटे बच्चे की तरह फूट-फूट कर रो पड़े, “नीरजा… देख ना क्या हो गया। तेरी भाभी ने आँखें नहीं खोली हैं कल से। डॉक्टर कह रहे हैं कि अगले चौबीस घंटे बहुत नाज़ुक हैं। अगर उसे कुछ हो गया तो मैं कैसे ज़िंदा रहूँगा? उसने … Read more

अनमोल आंचल की छांव

 “और तुम्हारा कर्तव्य क्या है?” विश्वनाथ जी ने उसकी बात बीच में ही काट दी। “तुम्हारा क्या कर्तव्य बनता है रोहन? अपनी उस मां का अपमान करना, उसे नीचा दिखाना, जिसका दर्जा शास्त्रों में भगवान से भी ऊंचा माना गया है? तुम जिस दिखावे, जिस स्टेटस और जिन खोखले दोस्तों की रेपुटेशन के पीछे भाग … Read more

अब दादी की बारी सुख पाने की… – संध्या त्रिपाठी

..दादी, मैं जब बड़ी हो जाऊंगी ना, तो बड़े शहर में जाऊंगी… वो भी हवाई जहाज से…! तब आपको हवाई जहाज में बिठाकर अपने साथ ले जाऊंगी….! ​बचपन में ऐसे हसीन ख्वाब देखने वाली हिमांशी कब बड़ी हो गई… समय को जैसे पंख लग गए थे..।  अपनी कड़ी मेहनत, लगन और मंजिल तक पहुँचने के … Read more

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