मेरे आसुंओं की कीमत तो चुकानी पड़ेगी – मंजू ओमर 

सामने गायत्री जी का पार्थिव शरीर पडा था और विमला फूटफूटकर रो रही थी। अंतिमयात्रा की तैयारियां चल रही थी। वही गायत्री देवी के पार्थिव शरीर से थोड़ी दूर पर गायत्री के दोनों बहू बेटे बैठे थे। बहुए नकली रोने का ढोंग कर रही थी और बड़े बहू और बेटे की आखों मे तो तनिक पानी भी न था।

संवेदना की नदी सूखी पडी थी। बहू तो बहू अरे बेटा जिस माँ की गोद मे खेलकर बड़ा हुआ था उस  माँ का आज निधन हुआ था, आंसूं की एक बूंद भी न थी आखं मे जैसे सूखा पड़ा गया था। लेकिन वो कौन था जो सबसे ज्यादा दो रहा था। विमला हां विमला गायत्री जी की सबसे अच्छी सहेली, उसके हर सुख दुःख की साथी।

बरसों बरस साथ बिताया था सब अच्छा बुरा एक दूसरे का देखा था। कभी कभी कोई रिश्ते इस दुनिया में खून के रिश्ते से भी बढकर होते है। इस जहाँ मे खून तक अक्सर पानी हो जाता है, जहाँ अपनो को कोई अपना नहीं समझता वहाँ पर कभी कभी ये दोस्ती का रिश्ता सब रिश्तों से ऊपर उठकर अपना धर्म निभा जाता है। ऐसी ही थी गायत्री और विमला जी की दोस्ती जो आज इस दुनिया को अलविदा कह गई थी। 

                 बाकी तो सब ठीक था उतार चढ़ाव और सुख दुःख तो सबकी जिंदगी मे आते रहते है। लेकिन उम्र केवल आखिरी पड़ाव पर जो कष्ट और अपनो का निरादर गायत्री को मिला वो बंया करने लायक भी नहीं था। अक्सर बहू बेटो के अत्याचार से दुखी होकर गायत्री कहती थी विमला से इससे तो बच्चे न होते तो अच्छा था।

मै बेऔलाद रह लेती तो इतना कष्ट न होता। इनके साथ (पति) ही चली जाती तो अच्छा था। विमला समझाती कोई किसी के साथ गया है क्या जो तुम चली जाती। गायत्री ऐसा विधान ईश्वर ने बनाया ही नहीं है इसांन अकेला ही आता है और अकेला ही जाता है। देखना विमला मेरे बेटो ने जितने आसूं मेरे निकाले है उनकी कीमत तो उन्हें चुकानी ही पडेगी। 

उनके सामने भी तो बच्चे है, उनको भी बुढापे मे यही सबकुछ झेलना पडेगा जो उन्होंने मेरे साथ किया है। हाँ वो तो कर्मों का फल गायत्री भुगतान तो करना ही पड़ेगा। इससे तो कोई बच नही सकता न बच पाया है इस तरह गायत्री और विमला बातें करके अपना अपना दुख हल्का कर लेते थे। 

             गायत्री और विमला दोनों अडोसी पडोसी थे जब गायत्री ब्याह कर आई थी तो विमला अपने परिवार के साथ गायत्री के पडोस मे ही रहती थी। हम उम्र होने के नाते दोनों मे गहरी दोस्ती हो गई। गायत्री के पति गनपत जी और विमला के पति नंदलाल दोनों साथ साथ ही एक फैक्ट्री में काम करते थे। धीरे धीरे उन दोनों का परिवार बढ़ा,

गायत्री के दो बेटे हुए और विमला के तीन बेटियां थी तो बेटे के चक्कर मे चार चार बच्चे हो गए आखिर मे एक बेटा हुआ विमला जी के। गायत्री और विमला गनपत और नंदलाल की तरह दोनों परिवार के बच्चे भी साथ साथ हंस खलकर बबडे हुए‌। विमला जी के तीन  तीन बेटियां थी तो ज्यादा पढाई लिखाई न कराकर जल्दी जल्दी बेटियों की शादी निपटा दी। 

             इधर गनपत का बड़ा बेटा राहुल पढ लिखकर कंपनी मे सुपरवाइजर बन गया था। छोटा विपुल अभी पढ रहा था‌। गायत्री हर काम मे बहुत निपुण थी, घर के सारे काम के साथ सिलाई कढ़ाई और घर के अन्य कार्य भी बड़ी कुशलता से निपटा लेती थी। पाककला मे तो गायत्री का जवाब ही न था। बड़े बेटे की नौकरी लगते ही गायत्री के पास उसके शादी के रिश्ते आने लगे । अच्छी लडकी देखकर राहुल की शादी कर दी गई‌।

बहू अलका अच्छे घर की और पढी लिखी थी तो उसको गायत्री का पुराने तरीके का घर पसंद नहीं आ रहा था। वो हर समय राहुल से नया घर लेने के लिए कहती रहती थी‌। गायत्री  जी कहती इतनी जगह तो है घर मे लेकिन अलका को तो नया घर चाहिए था इसी बहाने अलग रहने का मौका भी मिल रहा था‌।इस तरह राहुल ने कुछ लोन लेकर और कुछ अपने पास से लगा कर नया घर ले लिया और राहुल और अलका चले गए। और माँ पिता जी से बोल गए कि आप लोग आते जाते रहिएगा। 

               अब छोटा बेटा विपुल भी नौकरी पर आ गया था लेकिन उसकी नौकरी दूसरे शहर मे लगी थी। गायत्री जी ने सोचा उसकी भी शादी कर दे अकेले मे खाने पीने की दिक्कत आती है और फिर अपनी भी जिम्मेदारी यै से मुक्ति पा लूगीं। विपुल की भी शादी हो गई।अभी तक गायत्री जी सारा घर का काम खुद ही करती थी।

काफी मेहनती और मजबूत थी‌। इतना सबकुछ करते करते गनपत जी की उम्र रिटायर मेटं को आ गई। गायत्री बहुत खुश थी कि इतना समय हंसी खुशी से बीत गया और अपनी जिम्मेदारी भी सही से निभा दी। अब पति रिटायर हो रहें है तो कभी इस बेटे के पास तो कभी उस बेटे के पास रहूंगी।

गायत्री विमला से बोलती देख तेरे तो तीन तीन बेटियां थी और एक ही बेटा। बेटे के चक्कर में तीन तीन बेटियां पैदा कर ली। अभी तक अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हुई तू अभी भी उलझी हुई है। मुझे देखो मैने अपनी सारी जिम्मेदारी पूरी कर ली अब आराम से बहू बेटो के पास रहूंगी।

तब विमला जी बोलती देख गायत्री बेटी बेटा से कुछ नहीं होता, तीन तीन बेटियां थी तो क्या सबकी शादी हो गई सब अपने घर की हो गई। ईश्वर ने दिया तो निभाने की शक्ति भी वही देता है और बेटियां तो अपने भाग्य का लेकर पैदा होती है फिर किस बात की चिंता। बस बेटा रह गया है उसकी शादी करके बस मै भी आराम से रहूंगी। 

           अब बड़ी बहू के डिलीवरी थी तो गायत्री जी उसके पास गई। खूब मन लगाकर सेवा सुश्रुश्रा की। लेकिन सवा महीने बीतने के बाद जब बहू काम करने लायक हो गई  तो सास ससुर के लिए उसका वयवहार बदलने लगा, वो चाहती थी कि अब सास ससुर अपने घर जाए। और कहाँ गायत्री ने बहू बेटे के घर को ही

अपना घर समझ लिया था। पति रिटायर हो चुके है तो कहीं भी रहो चाहे अपने घर मे चाहे बेटे के घर मे। दो रोटी यहाँ भी खानी है और वहाँ भी क्या फर्क पड़ता है। ऐसा हम सोचते है लेकिन फर्क पड़ता है। कुछ अनमने से होकर गनपत जी ने गायत्री से कहा चलो अब अपने घर चलो। 

             घर आकर गायत्री ने बहू के लिए शक्ति दायक मेवे के लडडू बना कर कभी कुछ कभी कुछ भेजती रहती थी। बच्चे के लिए स्वेटर कपड़े लंगेटो बना बना कर भेजती रहती। अब छोटे बेटे के यहाँ डिलीवरी होनी थी तो गायत्री ने बेटे से कहा यहाँ हमारे पास बहू को छोड द़ लेकिन वो तैयार न हुआ। फिर गायत्री को वही जाना पड़ा।

इस तरह दोनों बेटे बहू के यहाँ गायत्री जी घूमती रहती थी। दोनों के दो दो बच्चे हो गए और गायत्री जी भाग भाग कर दोनों की देखभाल करती रही। इसी बीच एक दिन गनपत जी को हार्टअटैक आया और उनकी मृत्यु हो गई। बहू बेटे आए और फिर अपने अपने घर चले गए। किसी ने नहीं कहा कि मेरे साथ चलो। अब गायत्री जी अकेली भो गई। 

              वो अभी भु कुछ न कुछ बना कर बहू के यहाँ पहुंचाती रहती थी। इस बीच गायत्री जी बीमार पड़ गई तो बड़ी बहू ने कन्नी काट ली। देखने भी न आती थी। हाँ कभी कभार खाना राहुल के हाथ भिजवा देती थी। विमला सब देख रही थी। धीरे धीरे गायत्री को भी समझ आने लगा कि बहुओं को अब मेरी कोई जरूरत नहीं है।

पैसे की भी जरूरत नहीं थी गायत्री को क्योंकि पेंशन तो आती ही थी। इस बीच इत्तेफाक से छोटे बेटे विपुल का तबादला अपने शहर मे ही हो गया। गायत्री जी बहुत खुश थी कि चलो घर मे फिर से रौनक हो जाएगी।

लेकिन विपुल ने किराये का घर ले लिया अपने घर मे रहने के बजाय। गायत्री ने कहा भी कि बेटा इतना बड़ा घर पड़ा है किराए का क्यों ले रहा है तो बोला पूनम पुराने घर मे नही रहना चाहती। अब गायत्री को दो घर हो गए थे आने जाने को। लेकिन बहुओ को गायत्री जी का आना जाना पसंद नहीं आता था। 

            एक बार दो चार दिन रहने की नीयत से छोटी बहू के पास गई तो बाहर से घंटी बजाती रही बेटे बहू ने दरवाजा ही न खोला दोनों घर मे ही थे। गायत्री जी की आवाज सुन कर बेटे के पडोसी बाहर निकले और बोले आप बहुत देर से आवाजें दे रही है शायद कोई घर पर है नहीं आप हमारे घर पर बैठ जाईये इतंजार कर लिजीए थोड़ी देर हो सकता है आ जाए।

गायत्री जी घंटे भर बैठी रहीं तभी पडोसी ने देखा विपुल स्कूटर बाहर निकाल रहा था तो उन्होने पूछ लिया अरे विपुल माँ जी आई हुई है मेरे घर पर बैठी है बहुत आवाजें दी तुम लोगो ने दरवाजा नहीं खोला। हाँ हमे सुनाई नहीं दिया कहकर टाल दिया। फिर जब गायत्री जी बेटे के पास गई तो बेटे ने कहा यदि नहीं दरवाजा खुला रहा था तथा घर चली जाती पडोस मे बैठने की क्या जरुरत थी बेइज्जती करवाती है हमारी। अरे नहीं बेटा उन्होंने बैठा लिया था। 

       फिर शाम को स्कूटर मे माँ को बिठा कर विपुल घर छोड़ आया। और फिर एक दिन गायत्री जी सीढियों से गिर पडी छत पर कुछ डालने गई थी। कुल्हे की हड्डी टूट गई और घुटने में भी फैक्चर हो गया। विमला जी ने लडको को खबर करी अस्पताल ले गए आपरेशन हुआ।

एक हफ्ते बाद छुट्टी हो रही थी डाक्टर ने बहुत हिदायत थी देखरेख की घुटने पर ज्यादा जोर न पडे। अभी तीन महीने तक चलने फिरने की मनाही है। बस थोड़ा थोड़ा वाकर से चल सकती है।

अब अस्पताल से छुटटी तो हो रही थी लेकिन दोनों बहुएं गायत्री जी को अपने घर ले जाने को तैयार न थी। फिर सबकी राय बनी की उनको उनके घर पर ही नर्स लगाकर रखा जाए और हम लोग आते जाते रहेगे। गायत्री जी को जब पता लगा कि बहुएं अपने घर नहीं ले जाना चाहती तो आखों मे आंसू आ गए। 

         घर पर दो दिन बाद ही पता लगा कि नर्स ठीक से देखभाल नहीं कर रही है। डांटने पर वो काम छोड़ कर चली गई। अब मजबूरी मे बडे बेटेको माँ को घर ले आना पडा। तो बड़ी बहू ने शर्त रखी कि एक महीने मै रखूगीं तो एक महीने छोटी रखेगी। अब एक एक दिन भारी पडता दोनों बहुओ को। महीने भर होने पर एक दिन भी ज्यादा एक न रखती।

और फिर बड़ी बहू को एक महीना हो गया था गायत्री को रखे हुए तो गायत्री को छोटी के यहाँ छोडने ले गए। तो वहाँ उनके घर ताला लगा था कहीं गए हुए थे। बडे बहू बेटे ने गायत्री जी को छोटे के बरामदे मे व्हील चेयर पर बैठा कर छोड़ दिया और विपुल को फोन कर दिया कि माँ जी बरामदे मे है आओ देखो उनको। जब आज माँ जी को तुमको रखना था तो तुम घर मे ताला लगा कर क्यों चले गए। 

         विपुल जब घर आया तो देखा माँ जी व्हील चेयर पर बैठी है तो छोटी बहू पूनम जोर जोर से चिल्लाने लगी कि क्या एक दिन और ं नहीं रख सकती थी क्या भाभी। यहाँ मेरे सिर पर छोडने की बहुत जल्दी लगी थी। अब दोनों बहू बेटा आपस मे लडने लगे। गायत्री को कोई नहीं रखना चाहता था। अपनी इस तरह से बेकदरी देखकर गायत्री जी जोर जोर से रोने लगी और बेटे बहू से कहा तुम दोनों बेटों के पास मुझे अब नहीं रहना मुझे मेरे घर छोड आओ । मै चाहे जैसे रह लूगीं लेकिन अब तुम लोगो के पास नहीं आऊंगी। 

       गायत्री जी जिद पर अभी थी तो विपुल उन्हें घर छोड आया। वो तो वैसे भी नहीं चाहते थे रखना। अब तुम लोग मुझे देखने या मेरा हाल चाल भी लेने मत आना। अब मै यहाँ पर मर जांऊ या जिंदा रहू  मुझे तुम लोगो की जरूरत नहीं है। गायत्री जी ने विमला से कहकर एक चौबीस घंटे की काम वाली रख ली थी। पेशन तो मिलती भी थी। गायत्री हमेशा विमला से कहती देखना दोनों को मेरी आंसुओं की कीमत चुकानी पड़ेगी। मै जिंदा रहूं या न रहू देखने के लिए लेकिन भोगना तो पडेगा ही। 

       और फिर आपरेशन के आठ महीने बाद गायत्री जी का देहांत हो गया। आज विमला गायत्री के ं रहने पर उनकी करूण कथा सबको बता रही थी‌अब बेटा बहू भुगते की नहीं पता नहीं लेकिन एक माँ की आत्मा से निकली आह तो कभी खाली नहीं जाती। है न दोस्तों। 

मंजू ओमर 

झांसी उत्तर प्रदेश

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