*अभिमान* – तोषिका

ये कहा से रोने की आवाज़ें आ रही है? क्या तुम्हे भी सुनाई दे रही है नितिन? परेशान स्वर में गायत्री बोली। नितिन बोला “आवाज़ तो मुझे भी आ रही है, पर इतनी रात गए, अंधेरे में आवाज कहा से आ रही है पता ही नहीं चल रहा।

दोनों आवाज को सुनते सुनते एक कूड़े के ढेर के पास आए तो देखा वहां ठंड में एक नहीं बल्कि 2 बच्चे भूख और ठंड के मारे रो रहे है। दोनों जल्दी से उनको हॉस्पिटल ले गए, वहा डॉक्टर ने बच्चों की हालत गंभीर बताई और बोले “ठंड लगने के चक्कर में दोनों की हालत नाजुक है और उनको जॉन्डिस भी हो गया है।

” गायत्री जो उन बच्चों की कुछ नहीं लगती थी, उसके दिल की सांसे थम सी गई और फिर डॉक्टर को बोली “डाक्टर कैसे भी कर के दोनों बच्चों को बचा लीजिए, आज से मैं ही इनकी मां हू और एक मां के आंचल को सुना मत होने दीजिए”। नितिन ने भी गायत्री की बात में हामी भरी।

कुछ घंटों बाद डॉक्टर आए और बोले “बधाई हो! भगवान ने आज एक मां की सुन ली और दोनों बच्चे अब खतरे से बाहर है, पर अभी हमें इनको एन. आई. सी. यू  में रखना होगा।”

नितिन और गायत्री ने डॉक्टर को धन्यवाद किया फिर गायत्री खुश ही थी कि अचानक से उसके चेहरे से खुशी चली गई। नितिन ने पूछा “क्या हुआ गायत्री?

तुम अभी तो खुश थी, फिर अचानक से तुम इतनी शांत हो गई।” गायत्री बोली “नितिन आप तो जानते है ना, माजी को अपना पोता चाहिए था, जो मैं उनको कभी दे नहीं पाई। तो क्या माजी इन दो नन्हे बच्चों को अपनाएगी या नहीं?”

नितिन बोला “तुम इन सब की फिक्र मत करो, सब मैं देख लूंगा। अभी फिलहाल दोनों बच्चों के नाम सोचो क्योंकि जैसे ही दोनों ठीक होंगे हम इनको गोद ले लेंगे।”

ये सुन कर गायत्री की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था और रोते हुए उसने नितिन को गले लगा लिया।

*एक महीने बाद*

दोनों बच्चे देव और वेद अब स्वस्थ थे और गायत्री और नितिन ने गोद लेने की सारी प्रकिया पूरी कर ली थी। जब वो लोग घर घुस रहे थे, नितिन की मां बोली “मैं इनको कभी भी अपने पोते नहीं स्वीकार करूंगी, नितिन आज तू चुन ले या तो ये दो बच्चे या फिर अपनी मां।” नितिन पहले थोड़ा सा हिचकिचाया जैसे उसपर कोई बिजली गिर गई हो, पर फिर बोला ” मां, तुम एक दिन जरूर समझोगी की तुमने अपने इस *अभिमान* के चलते क्या खोया है।” ये बोल कर वो, गायत्री और देव और वेद को लेकर वहां से चला गया।

कुछ साल थोड़ी आर्थिक स्थिति थी पर अपने परिवार को खुश देख कर उसमें हिम्मत आ जाती थी। धीरे धीरे सब सही होने लगा था। देव और वेद अब बड़े हो गए थे और दोनों ही अपने कार्यक्षेत्र में अव्वल भी, देव डॉक्टर बना तो दूसरी तरफ वेद पुलिस अफसर बना। सब बहुत खुशनुमा माहौल चल रहा था, कि एक दिन नितिन की मां का कॉल आया और जब नितिन ने देखा तो उसे लगा कि मां उसे वापिस बुला रही है पर उधर से कॉल पर उनकी नौकरानी थी जिसने नितिन को ये बताने के लिए कॉल किया था कि उसकी मां की हालत बहुत गंभीर है और उनको हॉस्पिटल में भर्ती करा है, ये सुनते ही नितिन के हाथ से फोन गिर गया और उसकी आंख से आंसू बहने लगे। देव ने पूछा “क्या हुआ पिताजी?” नितिन बोला “तुम्हारी दादी…तुम्हारी दादी की हालत गंभीर है बेटा, मुझे जल्द से जल्द हॉस्पिटल ले चलो।” देव ने तुरंत गाड़ी निकाली और हॉस्पिटल ले गया। वहां बाकी डॉक्टर ने देव को देख कर बोला “अच्छा हुआ सर आप आ गए, हम आपको ही कॉल करने लगे थे, ये पेशेंट को आप ही बचा सकते है।” जब देव ने पेशेंट का नाम सुना तो वो हैरान रह गया, वो और कोई नहीं बल्कि उसकी खुद की दादी थी।” देव ने पूरी कोशिश की और अपनी दादी को बचा किया। जब ये बात नितिन की मां को पता चली तो उसको बहुत पछतावा हुआ और उसने सबसे माफी मांगी और नितिन को भी गले लगा लिया और उनको वापस घर आने को कहा। उधर गायत्री को अपने बच्चों पर गर्व हुआ।

कई बार हम अपने अभिमान के चलते उन पलो को खो बैठ ते है जिनका हमें पता नहीं होता कि कितने म होते है।

लेखिका

तोषिका

error: Content is protected !!