वक्त की मार – करुणा मलिक

  पार्वती, बस कर, बाकी काम सवेरे खत्म कर लेंगे। घर पहुँचते-पहुँचते दिन ढल जाएगा।  हाँ जिज्जी, सोच तो मैं भी यही रही थी पर कहीं बूँद ना पड़ जाएँ रात में….. बड़ी मुश्किल से तो गेहूँ काटे है ं …  ना… आज रात बूँद ना पड़ेगी। और पड भी गई तो, कितने गेहूँ खड़े हैं … Read more

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