बेटियाँ, कब तक चुप रहोगी? – सुदर्शन सचदेवा

“बेटियाँ बहुत सहनशील होती हैं।” न जाने कितनी बार यह बात सुनकर बड़ी हुई थी अनन्या। माँ कहती थीं, “बेटी, ससुराल में छोटी-छोटी बातों को दिल पर मत लेना। रिश्ते समझदारी से चलते हैं।” अनन्या ने माँ की बात गाँठ बाँध ली थी। शादी के बाद जब पहली बार उसकी बात को गलत समझा गया, … Read more

उड़ते परिंदे

ओंकारनाथ जी ने अर्नव के साथ कभी एक कड़क अनुशासनप्रिय संरक्षक का व्यवहार नहीं किया था। जब अर्नव हाई स्कूल में था, तब भी दादाजी उसके साथ बैठकर उसकी पसंद की बातें सुनते थे। तकनीक, कंप्यूटर और दुनिया भर के बदलावों पर वे अर्नव से सवाल पूछते थे ताकि पोते को लगे कि उसके दादाजी … Read more

घर की धड़कन

 वंदना ने कल्याणी जी को बड़े ही आदर से सोफे पर बैठाया और तुरंत उनके लिए अदरक वाली गरमा-गरम चाय और घर की बनी मट्ठियाँ ले आई। कल्याणी जी ने चाय का घूँट भरा तो उनका मन तृप्त हो गया। उन्होंने प्लेट से एक मट्ठी उठाई और प्यार से बोलीं कि बेटा, कल से मेरे … Read more

कर्ज नहीं, कुलदीपक

गिरधर जी गहरी सोच में डूब गए। उनकी अंतरात्मा कांप उठी। वह जमीन उनके पुरखों की आखिरी निशानी थी। पर अपनी बेटी के सुखद भविष्य के सामने उन्हें अपनी हर चीज तुच्छ लगने लगी। उन्होंने भारी मन से कहा, हरिशंकर भाई, अगर सचमुच बात बन जाए, तो मैं जमीन गिरवी रखने को भी तैयार हूं। … Read more

फर्ज की डोर

 क्या तुम नौकरी छोड़ने की सोच रही हो। विशाखा ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया और कहा कि नहीं, नौकरी छोड़ना कोई समाधान नहीं है। मैंने आज अपनी कंपनी की नीति को दोबारा पढ़ा है। हमारी कंपनी में वरिष्ठ कर्मियों को घर से काम करने का विकल्प मिलता है, भले ही उसमें वेतन थोड़ा कम हो … Read more

स्नेह की चौखट

 “मुझे माफ कर दीजिए अम्मा! मुझे बिल्कुल माफ कर दीजिए। मैं इतनी अंधी हो गई थी कि आपकी ममता को अपनी आजादी पर हमला समझ बैठी। मुझे लगता था कि आप मुझे बांधना चाहती हैं, लेकिन आज समझ आया कि आप तो मुझे संभालना चाहती थीं। मैं बहुत गलत थी अम्मा, बहुत गलत थी।” अवंतिका … Read more

ममता की डोर

 कुणाल पहले तो अपनी मां की तबीयत का हवाला देकर शादी की बात टाल रहा था, लेकिन जब सुमित्रा जी ने कसम दे दी, तो वह भी मिलने को तैयार हो गया। दोनों परिवार एक शांत मंदिर परिसर में मिले। अंजलि और कुणाल ने आपस में कुछ देर बातचीत की। कुणाल ने साफ-साफ बता दिया … Read more

अनकही छाँव

हरिशंकर जी ने आरव को अपने सीने से लगा लिया। उन्होंने समझाया कि जिंदगी में अकेलापन महसूस होना स्वाभाविक है, लेकिन उस अकेलेपन को दूर करने के लिए गलत रास्ते चुनना अपने भविष्य को आग लगाने जैसा है। उन्होंने उसे बताया कि उसके माता-पिता दिन-रात उसी के उज्ज्वल भविष्य के लिए मेहनत करते हैं। अगर … Read more

आईना जब बोला

 शादी के सात साल बाद वह पूरे दस दिनों की फुर्सत निकालकर अपने मायके आई थी। मन में सुकून था, बचपन की यादें थीं और मां के हाथों के स्वाद की ललक थी। मगर पिछले दो दिनों से उसे घर की हवा में एक अजीब सा खिंचाव महसूस हो रहा था। वही घर जहां कभी … Read more

धूप की पुरानी शॉल

 समीर ने अपनी बांहों में माई को उठाया। उनका शरीर बर्फ जैसा ठंडा पड़ रहा था। वंदना ने तुरंत वही कत्थई ऊनी शॉल उठाई और माई के पूरे शरीर को कसकर लपेट दिया ताकि उनका तापमान न गिरे। मयंक ने तुरंत गाड़ी स्टार्ट की। समीर माई का सिर अपनी गोद में रखे पिछली सीट पर … Read more

error: Content is protected !!