फर्ज की मशाल

कौशल्या देवी ने अवनि का हाथ थामा और उसे अपनी छाती से लगाते हुए गर्व से कहा, “लोग कहते हैं कि बेटा घर का नाम चलाता है, लेकिन मैं कहती हूँ कि औलाद का कोई लिंग नहीं होता, औलाद सिर्फ कर्म और प्रेम से पहचानी जाती है। समाज बेटे को कभी ‘बेटी’ कहकर नहीं पुकारता,

लेकिन जब कोई बेटी अपने माता-पिता के लिए चट्टान बनकर खड़ी हो जाती है, तो हर कोई उसे फक्र से कहता है कि ‘यह तो हमारा बेटा है।’ मेरी अवनि ने जीवन भर बेटे से बढ़कर फर्ज निभाया है, तो आज वह अपने पिता को विदा भी वही करेगी।”

अस्पताल के आईसीयू के बाहर जलती हुई लाल बत्ती अचानक बुझ गई। गलियारे में फैली उस सन्नाटे भरी खामोशी के बीच जब सफेद कोट पहने डॉक्टर ने बाहर आकर गहरी सांस लेते हुए सिर्फ अपनी गर्दन झुकाई, तो जैसे उस पूरे परिवार के सिर पर आसमान ही आ गिरा। पंडित विद्याधर जी की सांसों की डोरी हमेशा के लिए टूट चुकी थी।

पास ही लोहे की ठंडी बेंच पर बैठी उनकी धर्मपत्नी कौशल्या देवी के मुंह से कोई चीख नहीं निकली, न ही आँखों से आंसुओं की धार बही; सदमे ने उनके शरीर को पत्थर बना दिया था।

लेकिन उस गंभीर और गमगीन माहौल में भी, वहां मौजूद दूर-दराज के रिश्तेदारों के चेहरों पर शोक से ज्यादा एक अजीब सी फुसफुसाहट और चिंता तैरने लगी थी।

“हाय रे विधाता! कैसी विडंबना है,” मोहल्ले के बड़े चौधरी साहब ने अपनी छड़ी को जमीन पर टेकते हुए लंबी सांस खींची। “विद्याधर जी ने पूरी उम्र समाज की सेवा की, मास्टर साहब बनकर सैकड़ों बच्चों की जिंदगी संवारी, मान-सम्मान कमाया।

लेकिन अंतिम समय में देखो तो क्या गति हुई? अपना कहने को कोई बेटा तक नहीं है। अब उनके अंतिम संस्कार का क्या होगा? बिना पुत्र के तो आत्मा को सद्गति मिलना भी असंभव माना जाता है।”

चौधरी साहब की बात खत्म होते ही विद्याधर जी के चचेरे भाई रामनरेश ने एक मौकापरस्त मुस्कान को अपनी नकली उदासी के पीछे छिपाते हुए आगे कदम बढ़ाया।

“आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं चौधरी साहब। समाज और धर्म के नियमों को तो नकारा नहीं जा सकता। लेकिन चिंता की कोई बात नहीं है। आखिर मैं उनका सगा चचेरा भाई हूँ, हमारे कुल का खून एक ही है। पिण्डदान हो या मुखाग्नि, वो सब मैं ही संभालूँगा। अब मास्टर साहब के बाद इस कुल का मुख्य कर्ता-धर्ता तो मैं ही हूँ।”

गलियारे के एक अंधेरे कोने में खड़ी अवनि यह सब बहुत साफ-साफ सुन रही थी। उसकी आँखें लगातार जागने के कारण लाल अंगारे जैसी हो गई थीं, चेहरे पर पिछले अट्ठारह दिनों की भयानक मानसिक और शारीरिक थकान की लकीरें साफ खिंची थीं। जब विद्याधर जी को ब्रेन हेमरेज हुआ था, तब से लेकर आज तक अस्पताल के इस आईसीयू के बाहर एक पैर पर अगर कोई खड़ा रहा, तो वह यही अवनि थी। भाग-भागकर दवाइयों की व्यवस्था करना, खून के इंतजाम के लिए दर-दर भटकना, डॉक्टरों के सवालों के जवाब देना और आईसीयू के अंदर जाकर अपने अचेत पिता के ठंडे पड़ते हाथों को अपनी हथेलियों में भींचकर उन्हें हिम्मत देना—यह सब अवनि ने अकेले किया था। वह विद्याधर जी और कौशल्या देवी की इकलौती संतान थी।

अवनि ने अपनी आँखों में उमड़ते आंसुओं को पलकों के भीतर ही समेट लिया। उसने रामनरेश की बातों को हवा में उड़ाते हुए तेजी से कदम बढ़ाए, एंबुलेंस चालक से बात की और औपचारिकताएं पूरी करने के बाद अपनी मां के कांपते कंधों पर हाथ रखकर उन्हें सहारा दिया।

विद्याधर जी की देह जब उनके पुश्तैनी घर के आंगन में पहुंची, तो वहां पहले से ही लोगों की भारी भीड़ जमा थी। गेंदे के फूलों से सजे कफन के पास अगर कुछ गूंज रहा था, तो वह थी केवल एक ही बात—”अरे रे! मास्टर साहब तो बिना वारिस के ही सिधार गए। काश एक बेटा होता!”

रामनरेश तब तक सफेद धोती-कुर्ता पहनकर, सिर पर गमछा बांधे आंगन के बीचों-बीच आ चुके थे। उनके चेहरे के हाव-भाव ऐसे थे मानो मास्टर साहब की शोक सभा नहीं, बल्कि उनकी संपत्ति और अधिकारों पर अपना दावा ठोकने का कोई औपचारिक उत्सव चल रहा हो। उन्होंने पंडित जी से कानाफूसी शुरू कर दी थी।

शवयात्रा की अंतिम बेला आई। पंडित जी ने मंत्रोच्चार के बीच तेज आवाज में पुकारा, “दिवंगत आत्मा का पुत्र कहाँ है? उसे आगे बुलाइए, पिंड और अंतिम संस्कार का संकल्प उसी के हाथों से शुरू होना है।”

रामनरेश अपनी छाती चौड़ी करते हुए तुरंत आगे बढ़े। “पंडित जी, भैया का कोई बेटा नहीं है। मैं उनका छोटा भाई हूँ, खून का रिश्ता है, इसलिए शास्त्रों के अनुसार यह सारे धार्मिक दायित्व मैं ही निभाऊंगा।”

“ठहरिए!”

एक बेहद गंभीर, कांपती लेकिन लोहे जैसी मजबूत आवाज उस शांत आंगन में गूंजी। सब चौंक गए। कौशल्या देवी, जो अब तक अपने पति के सिरहाने बुत बनी बैठी थीं, धीरे-धीरे खड़ी हुईं और लड़खड़ाते कदमों से सीधे रामनरेश और पंडित जी के सामने आकर रुक गईं।

“पंडित जी,” कौशल्या देवी ने अपने आंचल को कसते हुए कहा, “मेरे पति का अंतिम संस्कार कोई बाहरी या चचेरा भाई नहीं करेगा। उनकी अंतिम यात्रा का सारा दायित्व उनकी अपनी संतान निभाएगी।”

रामनरेश के माथे पर बल पड़ गए। “भाभी जी! आप होश में तो हैं? अवनि? वो तो एक लड़की है! शास्त्रों और कुल की मर्यादा का कुछ तो ख्याल कीजिए। औरतें कभी श्मशान नहीं जातीं, न ही वे मुखाग्नि दे सकती हैं। यह अनर्थ मत कीजिए।”

“शास्त्रों की दुहाई आप जैसे लोग अपने स्वार्थ के लिए देना बंद कीजिए, रामनरेश जी!” कौशल्या देवी की आवाज में आज पहली बार एक ऐसी कड़क थी जिसने पूरे आंगन में सन्नाटा खींच दिया। “जब पिछले तीन सालों से मेरे पति लकवे के कारण खाट पर पड़े थे, जब उनकी सेवा करनी थी, उनके गंदे कपड़े और बिस्तर साफ करना था, तब आपका यह ‘कुल’ और ‘खून का रिश्ता’ कहाँ था? उस समय तो कोई ‘बेटा’ बनकर उनकी सेवा करने नहीं आया। रात-रात भर जागकर उनके दर्द को अपनी छाती में समेटने वाली मेरी यही बेटी अवनि थी। अस्पताल के बिल भरने के लिए जब गहने गिरवी रखने पड़े, तो मेरी बेटी की चूड़ियां बिकी थीं। जब सारे फर्ज, सारी जिम्मेदारियां और सारी तकलीफें मेरी बेटी ने उठाईं, तब किसी ने नहीं पूछा कि बेटा कहाँ है? तो आज जब अंतिम विदाई और हक का वक्त आया है, तो आपको अचानक ‘बेटा’ याद आ गया?”

वहां खड़े लोगों की नजरें झुकने लगीं।

कौशल्या देवी ने अवनि का हाथ थामा और उसे अपनी छाती से लगाते हुए गर्व से कहा, “लोग कहते हैं कि बेटा घर का नाम चलाता है, लेकिन मैं कहती हूँ कि औलाद का कोई लिंग नहीं होता, औलाद सिर्फ कर्म और प्रेम से पहचानी जाती है। समाज बेटे को कभी ‘बेटी’ कहकर नहीं पुकारता, लेकिन जब कोई बेटी अपने माता-पिता के लिए चट्टान बनकर खड़ी हो जाती है, तो हर कोई उसे फक्र से कहता है कि ‘यह तो हमारा बेटा है।’ मेरी अवनि ने जीवन भर बेटे से बढ़कर फर्ज निभाया है, तो आज वह अपने पिता को विदा भी वही करेगी।”

अवनि की आँखों से बहते आंसू अब उसकी हिम्मत बन चुके थे। उसने अपनी मां के पैर छुए और अपना सिर ऊंचा किया। रामनरेश और उनके साथ खड़े कुछ रूढ़िवादी रिश्तेदार बिना कुछ बोले धीरे से पीछे हट गए; एक मां के अटूट विश्वास और एक बेटी के समर्पण के आगे उनके खोखले तर्क ढेर हो चुके थे।

अवनि ने आगे बढ़कर अपने पिता की अर्थी को सबसे आगे वाला कंधा दिया।

जब घर के दरवाजे से अर्थी बाहर निकली, तो सड़क पर खड़े राहगीर और पड़ोसी हक्के-बक्के रह गए। एक जवान लड़की अपने पिता की अर्थी को कंधा देकर श्मशान की तरफ बढ़ रही थी। उसके हर कदम में एक गजब का ठहराव था। उसके कंधों पर सिर्फ बांस की बनी उस अर्थी का भार नहीं था, बल्कि वह सदियों से चली आ रही उन खोखली रूढ़ियों और सामाजिक बंधनों के बोझ को भी हमेशा के लिए उतार फेंक रही थी।

श्मशान घाट पर हवा शांत थी। पंडित जी ने इस बार बिना किसी हिचकिचाहट के सारे वैदिक मंत्र पढ़े और जलती हुई पवित्र मशाल अवनि के हाथों में थमा दी। अवनि ने कांपते हाथों से चिता की परिक्रमा की। उसने अपने पिता के शांत मुख को अंतिम बार देखा, जिन्होंने बचपन में उसे अपनी उंगली पकड़कर चलना सिखाया था और हमेशा यही कहा था, “तू मेरी बेटी नहीं, मेरा स्वाभिमान है।”

“पापा… आपकी यह लाडली आपको कभी झुकने नहीं देगी,” अवनि ने मन ही मन दोहराया और चिता को मुखाग्नि दे दी।

देखते ही देखते लपटें आकाश की ओर उठने लगीं। उन पावन लपटों में विद्याधर जी का नश्वर शरीर तो विलीन हो रहा था, लेकिन वहां मौजूद हर इंसान के दिल में एक नई चेतना और रोशनी जन्म ले रही थी।

वही चौधरी साहब, जिन्होंने अस्पताल में अफ़सोस जताया था, उन्होंने आगे बढ़कर अवनि के सिर पर हाथ रखा और भरभराए गले से बोले, “बेटी, आज तूने हमारी आँखें खोल दीं। मास्टर साहब बदनसीब नहीं थे, वो तो इस दुनिया के सबसे खुशकिस्मत पिता थे जिन्हें तेरे जैसी औलाद मिली। तूने आज साबित कर दिया कि पिता की लाठी बेटा बने या बेटी, प्यार और फर्ज में कोई फर्क नहीं होता।”

श्मशान से घर लौटते समय अवनि ने अपनी मां के हाथ को बहुत कसकर थाम रखा था। उसके सीने में पिता को खोने का एक गहरा और कभी न भरने वाला खालीपन तो था, लेकिन किसी लाचारी या बेबसी का कोई डर नहीं था। आज उसने अपने पिता को केवल परलोक के लिए विदा नहीं किया था, बल्कि खुद को उस घर का संबल, अपनी मां की ढाल और जीवन के हर मोड़ पर अडिग रहने वाली एक ऐसी संतान के रूप में स्थापित कर दिया था, जिसे समाज के किसी खोखले ठप्पे की जरूरत नहीं थी।

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