स्वाभिमान मेरा भी – सीमा सिंघी

शंकर मेरे भाई कैसे हो?? आज बड़ी याद आ रही थी तुम्हारी?? मैं मानता हूं मैंने बहुत बड़ी भूल की है.. पाप किए हैं मैंने मेरे भाई….अपने हिस्से की जमीन के साथ साथ तुम्हारे हिस्से की जमीन भी बेचकर चुपचाप शहर चला आया। जो मुझे नहीं करना था क्योंकि शुरुआती दिन महीने तो मैं बड़ा … Read more

रिश्ता और स्वाभिमान – ज्योति गुप्ता

 रविवार का दिन था, किंतु शहर के जाने-माने व्यापारी और व्यापारी मंडल के अध्यक्ष राजेंद्र जी अपनी आलीशान कोठी के शानदार शयनकक्ष में उदास अकेले बैठे थे। व्यापार जगत में उनकी धाक थी; हर छोटा-बड़ा व्यापारी उनकी बात सिर-आँखों पर रखता था। मगर आज उनकी आँखों के सामने बीती रात का वह कड़वा दृश्य बार-बार … Read more

*स्वाभिमान मेरा भी* – तोषिका

“कहा जा रही हो बेटा? आज तुम्हे लड़के वाले आ रहे है देखने।” मोहन ने अपनी बेटी निशा को पीछे से टोकते हुए बोला। निशा घूमी और उसने बोला “बस बाहर थोड़ा कॉलेज के लिए समान लेने जा रही हू, जल्दी ही आ जाऊंगी।”  तभी मोहन ने ताने मारते हुए बोला “सारा दिन बाहर घूम … Read more

स्वाभिमान की रक्षा – गीता वाधवानी

 सुबह 5:00 का अलार्म बड़ी तेज बज रहा था। निधि का बिल्कुल उठने का मन नहीं कर रहा था। वह बहुत ही थकी हुई थी। लेकिन मन मार कर आखिर उठाना ही पड़ा क्योंकि उसे ऑफिस पहुंचने में रोज देर हो जाती थी और घर के काम भी निपटाने  होते थे।      वह जल्दी से नहा … Read more

चंदा नहीं चाहिए – लतिका श्रीवास्तव

गाँव का वह छोटा-सा शासकीय विद्यालय सुबह होते ही बच्चों की आवाज़ों से भर जाता था। विद्यालय के सामने कच्ची सड़क थी और उसके दोनों ओर दूर तक फैले खेत। खेतों में रोपा लगाते ग्रामीण नई उम्मीदों की फसल बोने की तैयारी में थे। बरामदे के पास खड़ा पुराना नीम का पेड़ गर्मी की दोपहर … Read more

स्वाभिमान मेरा भी – सीमा सिंघी

बारिश की हल्की-हल्की फुहारें खिड़की पर दस्तक दे रही थीं। रसोई में चाय बनाते हुए नंदिनी की नज़र दीवार पर टंगी अपनी डिग्रियों पर पड़ी। कभी इन्हीं डिग्रियों पर उसे गर्व हुआ करता था, लेकिन आज वे सिर्फ़ धूल से ढके हुए कागज़ लग रहे थे। “तुम करती ही क्या हो? दिन भर घर में … Read more

स्वाभिमान मेरा भी – गीता अस्थाना

पुरुष विहीना नारी का समाज में जीना मुश्किल सा हो जाता है। खास तौर पर तब जब वह साधारण मध्यम वर्ग से होती है। इज़्जत, मान सम्मान, प्रशंसा, निंदा इन सबका बोझ मध्यम वर्ग के कंधे या सिर पर रहता है। दूसरे शब्दों में मध्यम वर्ग इन्हीं मकड़जालों में फंसा रहता है। न वह ऊपर … Read more

स्वाभिमान मेरा भी – सुदर्शन सचदेवा

सुबह की हल्की धूप आँगन में उतर रही थी। रसोई से चाय की खुशबू और मंदिर की घंटियों की आवाज़ पूरे घर में घुल रही थी। सुमन रोज़ की तरह सबसे पहले उठ गई थी। सास-ससुर की चाय, पति राजेश का नाश्ता, बच्चों के टिफिन—सब कुछ उसकी दिनचर्या का हिस्सा था। पिछले पंद्रह वर्षों से … Read more

स्वाभिमान मेरा भी। – मधु वशिष्ठ

  पूरा हॉल तालियों से गूंज रहा था। मुझे माल्यार्पण किया जा रहा था और बहुत सुंदर फ्रेम्ड सर्टिफिकेट से सम्मानित भी किया जा रहा था। और ऐसा हो भी क्यों ना आज मेरा सेवा निवृत्ति का दिन था।           पति और बच्चों के साथ जब मैंने घर वापस आने पर स्वयं को मिले हुए सारे उपहार … Read more

सम्मान मेरा भी – लक्ष्मी कानोडिया ‘अनिका’

नगर के सबसे भव्य सभागार में वार्षिक नागरिक सम्मान समारोह आयोजित था। रंग-बिरंगी रोशनियाँ, फूलों की सजी कतारें और मंच पर सजे सम्मान-चिह्न इस बात के साक्षी थे कि आज समाज के विशिष्ट लोगों को उनके योगदान के लिए सम्मानित किया जाना था। उद्योगपति, चिकित्सक, शिक्षाविद्, समाजसेवी और अधिकारी—सब अपनी-अपनी उपलब्धियों के साथ मंच पर … Read more

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