जड़ों की उड़ान

“मैं इस घर को नहीं बेचूंगी विकास, बल्कि मैं इस घर को एक नया जीवन दूंगी,” कल्याणी देवी की आंखों में एक नई चमक थी। “मैं शांति कुंज के इस बड़े से दालान में एक ‘कला केंद्र’ खोलूंगी। मैं मोहल्ले की उन औरतों और लड़कियों को मुफ्त में पेंटिंग, सिलाई और हैंडीक्राफ्ट सिखाऊंगी जो कुछ सीखना चाहती हैं, कुछ बनना चाहती हैं, लेकिन उनके पास साधन नहीं हैं। मैं अपने हुनर को मरने नहीं दूंगी।”

नीता ने अवाक होते हुए कहा, “पर माँ जी, इस उम्र में? लोग क्या कहेंगे?”

लखनऊ के एक पुराने लेकिन बेहद खूबसूरत और हवादार मकान ‘शांति कुंज’ के दालान में आज अजीब सी खामोशी छाई हुई थी। यह घर कभी बच्चों की किलकारियों और त्योहारों की रौनक से गूंजा करता था। लेकिन आज, इस घर के वजूद पर एक सवालिया निशान लगा हुआ था।

“माँ, आप समझ क्यों नहीं रही हैं? बिल्डर बहुत अच्छी कीमत दे रहा है। अगर आज हमने ये सौदा नहीं किया, तो कल को ये पुरानी प्रॉपर्टी कौड़ियों के भाव जाएगी। और वैसे भी, अब पिताजी नहीं रहे, आप यहाँ अकेली कैसे रहेंगी?” विकास ने अपने माथे का पसीना पोंछते हुए कहा।

विकास और उसकी पत्नी, नीता, पिछले एक हफ्ते से दिल्ली से आकर यहाँ रुके हुए थे। उनका मकसद अपनी माँ, कल्याणी देवी को किसी भी तरह मनाकर इस पुश्तैनी मकान को बेचना और उन्हें अपने साथ दिल्ली ले जाना था।

कल्याणी देवी ने अपनी सफेद सूती साड़ी के पल्लू को ठीक किया और सामने दीवार पर टंगी अपने दिवंगत पति, रघुनाथ जी की तस्वीर को देखा। रघुनाथ जी एक कड़क मिजाज और उसूलों वाले इंसान थे। उन्होंने इस घर को अपनी खून-पसीने की कमाई से बनवाया था। कल्याणी ने अपनी जिंदगी के पैंतीस साल इस घर की दीवारों को घर बनाने में लगा दिए थे। सुबह की चाय से लेकर रात के खाने तक, इस घर का हर कोना कल्याणी की उंगलियों के निशानों से वाकिफ था।

नीता ने विकास की बात का समर्थन करते हुए कहा, “हाँ माँ जी, विकास बिल्कुल सही कह रहे हैं। दिल्ली वाले फ्लैट में आपको कोई काम नहीं करना पड़ेगा। वहाँ सिक्योरिटी है, 24 घंटे मेड है। आपका मन भी लगा रहेगा। हमारा रोहन (पोता) तो वैसे भी स्कूल से आने के बाद अकेला रहता है। आप वहां रहेंगी तो बच्चे को भी दादी का प्यार मिलेगा और उसकी देखभाल भी हो जाएगी।”

कल्याणी देवी की नजरें नीता के चेहरे पर ठहर गईं। ‘पोते की देखभाल’… यह शब्द कल्याणी के कानों में किसी अजीब सी ध्वनि की तरह गूंजने लगे। क्या एक औरत का सफर सिर्फ रिश्तों की परिधि में ही सिमट कर रह जाता है? बचपन में भाई-बहनों का ध्यान रखना, जवानी में पति और ससुराल वालों की सेवा करना, फिर बच्चों को पालना, और अब बुढ़ापे में पोते की আয়া (आया) बन जाना? क्या ‘कल्याणी’ का अपना कोई अस्तित्व नहीं है? क्या उसकी अपनी कोई इच्छा, कोई शौक नहीं है?

विकास ने मेज पर रखे प्रॉपर्टी के कागजात कल्याणी देवी के सामने खिसका दिए और एक पेन उनकी तरफ बढ़ाया। “माँ, बाहर बिल्डर के आदमी बैठे हैं। बस आपके हस्ताक्षर की जरूरत है। मैंने सारा हिसाब कर लिया है। जो पैसा आएगा, उसका एक हिस्सा मैं अपने नए बिजनेस में लगाऊंगा और बाकी आपके नाम से फिक्स डिपाजिट कर दूंगा।”

कल्याणी ने पेन हाथ में लिया। विकास और नीता के चेहरों पर एक विजयी मुस्कान तैर गई। उन्हें लगा कि उनका काम हो गया है। आखिर एक बेवा और उम्रदराज औरत के पास इसके अलावा चारा ही क्या है? वह अकेले इस बड़े से शहर में कैसे रह सकती है?

लेकिन तभी कल्याणी देवी की उंगलियां रुक गईं। उन्होंने पेन को वापस मेज पर रख दिया और एक गहरी सांस ली।

“मैं ये कागजात साइन नहीं करूंगी, विकास।” कल्याणी देवी की आवाज में कोई कंपन नहीं था, बल्कि एक ऐसी शांति और दृढ़ता थी जिसने विकास और नीता को अंदर तक हिला दिया।

“क्या? माँ, आप ये क्या कह रही हैं? बात पक्की हो चुकी है। हम बिल्डर को जुबान दे चुके हैं,” विकास लगभग चिल्लाते हुए बोला।

कल्याणी देवी अपनी जगह से उठीं। उन्होंने अपने चेहरे पर आए सफेद बालों को पीछे किया और बड़ी ही नरमी से कहा, “तुमने जुबान दी है विकास, मैंने नहीं। यह घर मेरे नाम पर है, तुम्हारे पिताजी मेरे नाम कर गए थे। और मैं इसे नहीं बेचना चाहती।”

“पर माँ, आप यहाँ अकेले क्या करेंगी? आपका दिन कैसे कटेगा? आप डिप्रेशन में चली जाएंगी,” नीता ने घबराकर कहा।

कल्याणी देवी मुस्कुराईं। वह मुस्कान जो पिछले कई सालों से रघुनाथ जी की कड़क आवाज और घर की जिम्मेदारियों के तले कहीं दब गई थी। “मैं अकेले नहीं रहूंगी नीता। और न ही मैं दिल्ली जाकर तुम्हारे 18वीं मंजिल के फ्लैट में कैद होना चाहती हूँ, जहाँ मेरी जिंदगी सिर्फ रोहन को स्कूल से लाने और उसे खाना खिलाने तक सीमित रह जाए।”

कल्याणी देवी धीरे-धीरे चलकर अपने कमरे की तरफ गईं। विकास और नीता हैरान होकर उनके पीछे-पीछे गए। कल्याणी देवी ने अपने कमरे का वह पुराना लकड़ी का संदूक खोला, जिसे रघुनाथ जी के जीवित रहते शायद ही कभी खोला गया था। उसमें से उन्होंने कुछ पुरानी, पीली पड़ चुकी डायरियां, कुछ स्केच पेन और कैनवास निकाले।

कल्याणी देवी ने उन डायरियों की धूल साफ करते हुए कहा, “शादी से पहले मुझे पेंटिंग और हैंडीक्राफ्ट्स का बहुत शौक था। मेरे बनाए हुए चित्रों को कई स्थानीय प्रदर्शनियों में इनाम भी मिला था। लेकिन तुम्हारे पिताजी को कला से कोई लगाव नहीं था। उन्हें लगता था कि ये सब समय की बर्बादी है। एक आदर्श बहू और पत्नी बनने की होड़ में, मैंने अपने ब्रश और रंगों को इस संदूक में दफना दिया था।”

विकास की आंखें फटी की फटी रह गईं। उसने अपनी माँ को कभी इस रूप में नहीं देखा था। उसने हमेशा अपनी माँ को रसोई में, भगवान के सामने या घर के कामों में उलझे देखा था।

“मैं इस घर को नहीं बेचूंगी विकास, बल्कि मैं इस घर को एक नया जीवन दूंगी,” कल्याणी देवी की आंखों में एक नई चमक थी। “मैं शांति कुंज के इस बड़े से दालान में एक ‘कला केंद्र’ खोलूंगी। मैं मोहल्ले की उन औरतों और लड़कियों को मुफ्त में पेंटिंग, सिलाई और हैंडीक्राफ्ट सिखाऊंगी जो कुछ सीखना चाहती हैं, कुछ बनना चाहती हैं, लेकिन उनके पास साधन नहीं हैं। मैं अपने हुनर को मरने नहीं दूंगी।”

नीता ने अवाक होते हुए कहा, “पर माँ जी, इस उम्र में? लोग क्या कहेंगे?”

कल्याणी देवी ने एक जोरदार ठहाका लगाया। “लोग? लोगों ने तब भी कुछ नहीं दिया था जब मैं घूंघट निकालकर घर में बैठी रहती थी, और अब भी कुछ नहीं देंगे। मुझे अब किसी सहारे, किसी सहानुभूति की जरूरत नहीं है। मुझे मेरी जड़ें मिल गई हैं, विकास। मैंने अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा तुम लोगों के लिए जिया है। अब जो वक्त बचा है, वह सिर्फ कल्याणी का है।”

विकास और नीता के पास कोई जवाब नहीं था। जिस औरत को वे बेचारी, असहाय और उम्र के बोझ तले दबी हुई समझ रहे थे, वह आज अपने सपनों की उड़ान भरने के लिए तैयार खड़ी थी। उन्हें समझ आ गया था कि कल्याणी देवी अब वह पुरानी माँ नहीं रहीं जो हर बात पर सिर झुका लेती थीं। उन्होंने आज खुद को पहचान लिया था।

विकास ने सिर झुकाते हुए प्रॉपर्टी के कागजात फाड़ दिए। “ठीक है माँ, अगर यही आपकी खुशी है, तो हम आपके साथ हैं। हम आपको मजबूर नहीं करेंगे।”

उस दिन शांति कुंज का सौदा रद्द हो गया, लेकिन एक इंसान का पुनर्जन्म जरूर हुआ।

कुछ ही महीनों बाद, शांति कुंज का दालान रंगों, कैनवास और दर्जनों महिलाओं की खिलखिलाहट से भर गया। कल्याणी देवी का ‘कला केंद्र’ शहर में मशहूर होने लगा। जो औरतें कभी सिर्फ चूल्हे-चौके तक सीमित थीं, वे कल्याणी देवी से कला सीखकर आत्मनिर्भर होने लगीं। कई महिलाओं ने अपने बनाए हुए हैंडीक्राफ्ट्स बाजार में बेचना शुरू कर दिया।

कल्याणी देवी अब थकी हुई या अकेली नहीं लगती थीं। उनके चेहरे पर एक असीम शांति और आत्मसंतुष्टि थी। एक दिन विकास और नीता जब दिवाली पर उनसे मिलने आए, तो उन्होंने देखा कि उनकी माँ एक बड़ी सी कैनवास पर रंगों से खेल रही हैं, और उनके आस-पास कई लड़कियां उन्हें कौतूहल से देख रही हैं।

विकास ने नीता की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए कहा, “हम माँ को सहारा देने आए थे, लेकिन माँ तो आज खुद कइयों का सहारा बन गई हैं।”

कल्याणी देवी ने रघुनाथ जी की तस्वीर की तरफ देखा और मन ही मन कहा, “रघुनाथ जी, मैंने आपका घर भी बचा लिया और खुद को भी। अब मैं सिर्फ आपकी पत्नी या विकास की माँ नहीं हूँ, मैं कल्याणी हूँ—एक कलाकार, एक गुरु।”

उस शाम, जब सूरज ढल रहा था, शांति कुंज की दीवारें उदास नहीं थीं, बल्कि रंगों की रोशनी से नहा रही थीं।

आपकी राय हमारे लिए महत्वपूर्ण है!

क्या आपके घर में भी कोई ऐसा है जिसने परिवार के लिए अपने सपनों को दबा दिया? क्या साठ के दशक के बाद जीवन की नई शुरुआत करना संभव है? अपने विचार कमेंट्स में जरूर साझा करें।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद।

error: Content is protected !!