कच्चे धागों का अटूट बंधन

प्रकाश की ये बातें सुनकर मालती की आंखों से आंसुओं का बांध टूट पड़ा। उसने रोते हुए कहा, “बस कीजिए। एक शब्द और मत कहिएगा। माफी तो मुझे मांगनी चाहिए।

पता नहीं मुझे क्या हो गया था जो मैं इतनी अंधी हो गई थी। मैं कैसे भूल गई कि इन मुश्किल हालातों में भी आप मेरे लिए, हमारे रोहन के लिए सुबह से रात तक जानवरों की तरह मेहनत करते हैं। उस भारी रिक्शे को खींचते हुए आपकी नसें तन जाती हैं, लेकिन आप कभी उफ तक नहीं करते।”

“मुझे इस तरह उनके सामने अपनी हसरतों का रोना नहीं रोना चाहिए था। सच ही तो कहा था उन्होंने, वो कौन सा अपने लिए जी रहे हैं? सुबह से लेकर शाम तक उस तपती धूप में लोडिंग वाला रिक्शा खींचते हैं, ताकि इस घर की दो वक्त की रोटी का जुगाड़ हो सके।

और एक मैं हूँ, जो टीवी और आस-पड़ोस की औरतों की देखा-देखी अपनी ही दुनिया में उलझी रहती हूँ…” खिड़की के पास खड़ी मालती के मन में पश्चाताप के गहरे बादल उमड़ रहे थे।

आज सुबह ही तो बात हुई थी। दीवाली आने वाली थी और मोहल्ले की हर औरत अपने नए कपड़ों और गहनों की चर्चा कर रही थी। मालती के पास पिछले तीन सालों से कोई नई साड़ी नहीं आई थी। जब सुबह उसके पति प्रकाश ने उससे चाय मांगी, तो मालती का सारा गुस्सा आंसुओं के साथ बाहर आ गया।

उसने ताना मारते हुए कह दिया था कि क्या फायदा ऐसी जिंदगी का जहाँ त्योहार के दिन भी पहनने को एक ढंग का कपड़ा ना हो। प्रकाश ने कुछ नहीं कहा था। वो बस खामोशी से अपनी आधी पी हुई चाय का कप वहीं छोड़कर अपना गमछा कंधे पर डालकर काम पर निकल गया था। उसके जाते ही मालती को अपनी गलती का अहसास होने लगा था।

खिड़की से बाहर देखते हुए मालती की नजर सड़क किनारे बैठी एक औरत पर पड़ी। वो औरत कूड़े के ढेर के पास प्लास्टिक बीन रही थी और उसके कपड़े जगह-जगह से फटे हुए थे। लोग वहां से गुजर रहे थे, कुछ उसे हिकारत भरी नजरों से देख रहे थे, तो कुछ उसकी बेबसी का मजाक उड़ा रहे थे।

मालती का दिल पसीज गया। उसने सोचा, “मैं कितनी स्वार्थी हूँ। मेरे पास सिर छुपाने के लिए एक पक्की छत है, पहनने के लिए साफ-सुथरे कपड़े हैं, भले ही वो नए ना हों। और इस बेचारी के पास तो तन ढकने के लिए भी पूरा कपड़ा नहीं है।”

मालती तुरंत अपनी लोहे की पुरानी अलमारी के पास गई। उसने अपनी उन साड़ियों में से एक अच्छी और साफ साड़ी निकाली जिसे वो कभी-कभार ही पहनती थी। वो दौड़कर बाहर गई और उस प्लास्टिक बीनने वाली औरत के हाथों में वो साड़ी रख दी। उस औरत की आंखों में जो चमक और दुआएं थीं, उसने मालती के भीतर चल रहे उस स्वार्थ के तूफान को पूरी तरह शांत कर दिया। उसे समझ आ गया कि खुशी चीजों में नहीं, बल्कि सुकून में होती है, जो उसे प्रकाश के साथ होने से मिलता है।

उधर, शहर के सबसे व्यस्त और भीड़भाड़ वाले थोक बाजार में प्रकाश अपने रिक्शे पर अनाज की भारी बोरियां लाद रहा था। उसका शरीर पसीने से लथपथ था। नवंबर की हल्की ठंड भी उस भयंकर मेहनत के आगे हार मान चुकी थी। सुबह की मालती की बातें उसके कानों में गूंज रही थीं। “क्या फायदा ऐसी जिंदगी का…” ये शब्द किसी नुकीले तीर की तरह उसके सीने में चुभ रहे थे। प्रकाश ने खुद से वादा किया था कि आज चाहे उसे रात के दस बजे तक रिक्शा क्यों ना खींचना पड़े, वो मालती के लिए एक नई साड़ी जरूर लेकर जाएगा।

दोपहर होते-होते आसमान में अचानक काले बादल छा गए और बेमौसम की बारिश शुरू हो गई। प्रकाश के पास रुकने का समय नहीं था। उसे माल पहुंचाना था। बारिश की ठंडी बूंदें उसके गर्म और थक चुके शरीर पर गिर रही थीं, लेकिन उसने अपने रिक्शे के पैडल को रोकना मुनासिब नहीं समझा। शाम तक उसका शरीर बुरी तरह टूट चुका था। आँखों के सामने अंधेरा छा रहा था, लेकिन उसकी जेब में इतने पैसे आ चुके थे कि वो मालती के लिए वो साड़ी खरीद सके जो उसने एक दुकान के बाहर पुतले पर टंगी देखी थी।

साड़ी खरीदकर जब प्रकाश घर की ओर मुड़ा, तो उसके कदम लड़खड़ा रहे थे। शरीर भट्टी की तरह तप रहा था और सिर में हथौड़े जैसी चोट महसूस हो रही थी।

शाम घिर आई थी। घर का दरवाजा खुला और प्रकाश अंदर दाखिल हुआ। रोज जब वो घर आता था, तो दरवाजे से ही अपने पांच साल के बेटे रोहन को आवाज लगाता था। रोहन दौड़कर उसके पैरों से लिपट जाता था और प्रकाश अपनी सारी थकान भूलकर उसे हवा में उछाल देता था। लेकिन आज ऐसा कुछ नहीं हुआ। प्रकाश चुपचाप, निढाल कदमों से अंदर आया और बिना कुछ कहे, बिना किसी की तरफ देखे, सीधा चारपाई पर जाकर लेट गया। उसका चेहरा उतरा हुआ था और आँखें बंद थीं।

रसोई में रात का खाना बना रही मालती ने जब यह देखा तो उसका दिल धक से रह गया। जो इंसान दिन भर की हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी घर आकर मुस्कुराता था, वो आज इस तरह बेजान सा क्यों लेट गया?

वो तुरंत अपने पल्लू से हाथ पोंछते हुए चारपाई के पास पहुंची। “क्या हुआ जी? आज इतनी जल्दी आ गए और आते ही लेट गए? रोहन को भी आवाज नहीं लगाई?”

प्रकाश ने कोई जवाब नहीं दिया, बस एक हल्की सी कराह उसके होठों से निकली। उसकी आवाज में एक अजीब सी कंपन थी।

मालती घबरा गई। उसने जैसे ही प्रकाश के माथे पर हाथ रखा, वो झटके से पीछे हट गई। “हे भगवान! आपका शरीर तो आग की तरह तप रहा है। इतना तेज बुखार? आप रुकिए, मैं अभी ठंडे पानी की पट्टी लेकर आती हूँ।”

“रहने दो मालती…” प्रकाश ने मुश्किल से अपनी आँखें खोलते हुए कहा। उसकी आवाज बहुत कमजोर थी। “मैं ठीक हो जाऊंगा। बस थोड़ी थकान है।”

“क्यों रहने दूँ? आप चुपचाप लेटे रहिए।” मालती बिना उसकी बात सुने रसोई की तरफ दौड़ी और एक बर्तन में ठंडा पानी और एक साफ सूती कपड़ा लेकर वापस आई। वो प्रकाश के सिरहाने बैठ गई और ठंडे पानी में कपड़ा भिगोकर उसके तपते माथे पर रखने लगी।

प्रकाश ने धीरे से मालती का हाथ पकड़ लिया। “तुम बेवजह परेशान हो रही हो मालती। दिन भर तो तुम इस घर के कामों में लगी रहती हो, अब मेरी वजह से तुम्हें आराम नहीं मिल रहा। और हाँ… सुबह जो भी हुआ, उसके लिए मुझे माफ कर देना। मैं सच में किसी लायक नहीं हूँ जो तुम्हें छोटी-छोटी खुशियाँ भी ना दे सकूँ।”

प्रकाश की ये बातें सुनकर मालती की आंखों से आंसुओं का बांध टूट पड़ा। उसने रोते हुए कहा, “बस कीजिए। एक शब्द और मत कहिएगा। माफी तो मुझे मांगनी चाहिए। पता नहीं मुझे क्या हो गया था जो मैं इतनी अंधी हो गई थी। मैं कैसे भूल गई कि इन मुश्किल हालातों में भी आप मेरे लिए, हमारे रोहन के लिए सुबह से रात तक जानवरों की तरह मेहनत करते हैं। उस भारी रिक्शे को खींचते हुए आपकी नसें तन जाती हैं, लेकिन आप कभी उफ तक नहीं करते।”

मालती सुबकते हुए आगे बोली, “अगर आपकी जगह कोई और आदमी होता, तो वो घर पर बैठकर अपनी पत्नी पर हुक्म चलाता। कहता कि मैं पढ़ा-लिखा हूँ, मैं ये छोटा काम क्यों करूँ। लेकिन आपने अपने परिवार की खातिर अपने अहम को कभी बीच में नहीं आने दिया। और मैंने? मैंने उसी परिवार की शांति को अपने लालच के लिए दांव पर लगा दिया।”

प्रकाश ने अपनी जेब से वो पॉलीथिन निकाली जिसमें साड़ी थी और उसे मालती की तरफ बढ़ा दिया। “मैं तुम्हारे लिए कुछ लाया था मालती। शायद तुम्हें पसंद आए।”

मालती ने उस साड़ी को देखा और उसे एक तरफ रख दिया। उसने प्रकाश के दोनों हाथों को अपने हाथों में लिया और उन्हें चूमते हुए कहा, “मुझे ये सब नहीं चाहिए। आज जब मैंने उस गरीब बेसहारा औरत को देखा, तो मुझे समझ आया कि मेरे पास दुनिया की सबसे कीमती चीज है, और वो हैं आप। एक औरत का असली गहना उसके कपड़े या जेवर नहीं होते, उसका असली गहना उसका पति होता है, उसका वो साथी होता है जो हर दुख-सुख में उसके साथ खड़ा रहे। मुझे माफ कर दीजिए प्रकाश जी, मैं सच में बहुत बड़ी गलती कर बैठी।”

प्रकाश के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान तैर गई। “अरे पगली, इसमें माफी कैसी? तुम्हें पता है, बाबूजी हमेशा कहते थे कि जिस घर में दो बर्तन होते हैं, वो खटकते जरूर हैं। लेकिन इसी खटपट से तो पता चलता है कि घर में जिंदगी बाकी है। अगर ये नोकझोंक ना हो, ये छोटी-छोटी तकरारें ना हों, तो हमें एक-दूसरे की अहमियत कैसे समझ आएगी? इसी बहाने मुझे ये तो पता चला कि मेरी पत्नी मुझसे कितना प्यार करती है।”

“आप भी ना…” मालती रोते हुए भी मुस्कुरा पड़ी।

उन दोनों की नजरें मिलीं और सारे गिले-शिकवे आंसुओं के साथ बह गए। वे दोनों एक-दूसरे के गले लग गए। ये कोई आम आलिंगन नहीं था, ये उस कच्चे धागे का पक्का बंधन था जिसे गरीबी या हालात कभी नहीं तोड़ सकते थे। दोनों अपनी ही दुनिया में खोए हुए थे, उन्हें इस बात का जरा भी अहसास नहीं था कि कमरे के दरवाजे के पीछे खड़ा छोटा रोहन अपने माता-पिता को यूं मुस्कुराते हुए देखकर खुद भी खिलखिला रहा था। उसकी मासूम आँखों में एक अजीब सी चमक थी, क्योंकि आज उसने अपने घर को फिर से खुशियों से भरते हुए देखा था। वो बच्चा ही था जो अनजाने में उन दोनों को फिर से एक-दूसरे के करीब लाने की सबसे खूबसूरत वजह बन गया था।

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 #  कच्चे धागों का अटूट बंधन

लेखिका : आरती देवी

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