पुरुष विहीना नारी का समाज में जीना मुश्किल सा हो जाता है। खास तौर पर तब जब वह साधारण मध्यम वर्ग से होती है। इज़्जत, मान सम्मान, प्रशंसा, निंदा इन सबका बोझ मध्यम वर्ग के कंधे या सिर पर रहता है। दूसरे शब्दों में मध्यम वर्ग इन्हीं मकड़जालों में फंसा रहता है। न वह ऊपर जाने का सामर्थ्य रखता है और नीचे, तो बिल्कुल नहीं। समाज में अपमानित होने की चिंता भी उसी को सताती रहती है।
मुदिता का जैसा नाम वैसा ही गुण। मीठी वाणी और सौम्य व्यवहार, लेकिन भाग्य विपरीत दिशा में गमन कर चुका था। परिवार में मुदिता का पद सबसे बड़ा था, परंतु अब वह पदहीन सी हो गई। तीन भाइयों में सबसे बड़े भाई विनीत की पत्नी थीं। विवाह के सात साल के अंतराल में मुदिता को दो बेटियों का उपहार देकर स्वर्गलोक को प्रस्थान कर गए।
मासूम अबोध बच्चियों की सुरक्षा का ध्यान करके मुदिता ने परिवार के साथ ही रहना उचित समझा। अतः अपने बड़े देवर पुनीत और उनकी पत्नी रमा के साथ रहने लगीं। पुनीत और रमा की उस समय कोई संतान नहीं थी,सो उन बच्चों को उनसे प्रगाढ़ स्नेह मिलता रहा।
भाईयों में सबसे छोटे भाई प्रवीण दूसरे शहर प्रयागराज में प्रथम श्रेणी के अफसर पद पर कार्यरत थे। त्योहारों में सभी एकसाथ मिलकर त्योहार मनाते थे। हर साल होली, दिवाली में कभी प्रवीण पत्नी प्रिया सहित पुनीत के यहां आते और किसी त्यौहार में पुनीत मुदिता सहित सपरिवार प्रवीण के यहां चले जाते थे। दशहरे में बच्चे प्रयागराज में ही रहना चाहते, क्योंकि वहां दशहरे पर निकलने वाली चौकियां बच्चों के आनंद का आकर्षण होती थीं।
कहावत है कि जहां चार बर्तन होते हैं, खड़कते ही हैं। परिवार में भी ऐसा होता रहता है। इस परिवार मे भी कभी कभी किसी विषय पर वाद विवाद हो जाया करता था, परंतु कुछ समय बाद ही वातावरण नार्मल हो जाता था। विचार भिन्नता होने पर भी एकता की भावना सभी के अंतस में भरी हुई थी।
घर में चाहे जो भी वाद विवाद हो, उसका शतांश भी बाहर किसी को मालूम नहीं होता था। यह भावना तो अच्छी थी, लेकिन इसका एक और भी पहलू था जो सर्वथा अनुचित था। वाद विवाद जैसे अनपेक्षित कृत्य का कोप भाजन अधिकांशतः मुदिता ही बनती।
त्योहारोपरांत निश्चित समय बैठकी होती और फिर बातों का बतंगड़ शुरू हो जाता। प्रिया के मुखमंडल और हावभाव से प्रकट हो जाता कि वह इसमें शामिल हैं, परंतु मुख से कुछ नहीं बोलती थीं। प्रवीण बोलते, ‘ भाभी, वंदना,विदिता अब बड़ी हो रही हैं। इन्हें घर का काम काज सीखना चाहिए। मेहमानों के सामने सलीके से रहना नहीं आता। बस हंसना, खेलना और बात करना होता है।’
‘ तुम्हारे यहां जाती हैं, तुम लोग नाश्ता,खाना बनाने में लगाते हो कि नहीं। कभी इन दोनों ने मना किया है? ‘ एक क्षण चुप रहने के बाद मुदिता ने फिर कहना शुरू किया – ‘ मैंने कभी अपने बच्चों को समेट कर नहीं रखा। मैं इस परिवार में रह रही हूँ तो मेरे बच्चे भी तुम सभी के हैं, ऐसा मैं मानती रही हूँ। मैंने कभी बच्चों को लेकर तुम सभी से कोई शिकायत या तकरार किया है?’ सब चुप हो गए। बात ख़त्म हुई और दो दिन बाद प्रवीण वापस चले गए।
समय बीतता गया। वंदना और विदिता पर बसंत की तरुणाई छाने लगी थी। अब मुदिता को उनकी शादी की चिंता होने लगी। उन्होंने पुनीत और प्रवीण से इसकी चर्चा किया। उन्होंने, ‘ अरे! इसमें कहना क्या है। शादी तो करनी ही है। हम ज़रूर देखेंगे।’ कहकर अपनी स्वायत्तता जताई। परंतु तीन चार साल बीत गए, उम्मीद की कोई किरण नज़र नहीं आई। एक दो बार ज़रूर देखा, पर वह दिखावा ही लगा। पुनीत की स्थिति हैंड टू माउथ की थी, इसलिए वे इस विषय में संकुचित से रहते थे।
पुनीत जी के दोस्त दुर्गा जी की पुत्री प्रभा को वंदना और विदिता से प्रगाढ़ प्रेम था। विवाह से संबंधित उसने अपने देवर के दोस्त का पूर्ण विवरण पत्र के माध्यम से भेजा। वह धनबाद में कोयला खदान में इंजीनियर था। मुदिता ने पुनीत को पत्र दिखाया, परंतु उनका शीघ्र प्रयास न देखकर कुछ दिन रोकने के लिए प्रभा को पत्र लिखा।
पुनः जब सभी एकत्रित हुए, तो एक दिन प्रवीण दुर्गा जी से मिलने गए। लौट कर आए और मुदिता को बुलाया। क्रोधित होकर कहा, ‘ भाभी, आपने तो हम सब की बड़ी बदनामी कर दी। पत्र में हमसब की शिकायत किया।हम प्रयास नहीं कर रहे हैं क्या। समाज में हमारा स्वाभिमान आपने मिट्टी में मिला दिया।’
एक क्षण को मुदिता स्तंभित सी हो गई। फिर अपने को स्थिर कर बोली, ‘ इतने सालों तक परिवार में सुख शांति और एकता बनाए रखने के लिए हमने कभी कुछ नहीं कहा। आज कहना पड़ रहा है। पत्र लाकर दिखाओ कि उसमें मैंने क्या लिखा है। लड़के को रोकने के लिए लिखा है।तुम्हारा इंतज़ार था कि आओगे तो बात करने जाओगे।’
मुदिता ने गहरी सांस ली और फिर बोलना शुरू किया – ‘मै
तुम लोगों से कमज़ोर स्थिति में ज़रुर हूं लेकिन दीन हीन नहीं। मेरा भी स्वाभिमान है। बेवजह खोरी खोटी सुनना मुझे बर्दाश्त नहीं होगा। तुमने अपना सम्मान ख़ुद मिट्टी में मिला दिया है। मैंने नहीं। स्वाभिमान मेरा भी है इज़्जत और सम्मान से जीने का। परिवार की मर्यादा के लिए मैंने तुम लोगों से शादी करने के लिए कहा। मैं अब स्वयं देख लूंगी। तुम्हें कष्ट करने की ज़रूरत नहीं है।
वर्षों से दिल में समेटे हुए आक्रोश को निकाल कर मुदिता वहां से अपने कमरे में चली गई।
स्वलिखित मौलिक (सर्वाधिकार सुरक्षित)
गीता अस्थाना,
बंगलुरू, कर्नाटका।