कैलाश की आँखों में भी अब आंसू आ गए थे। उनके चेहरे पर एक संतोष भरी मुस्कान थी।
आदित्य ने कहा, “मैंने रोते हुए आपके पैर पकड़ लिए थे और खुशी के मारे आपको पच्चीस हजार रुपये इनाम के तौर पर देने चाहे थे। मेरे पास शब्द नहीं थे। लेकिन काका, क्या आपको याद है कि उस रात आपने मुझसे क्या कहा था?”
कैलाश ने एक लंबी सांस ली और बोले, “मुझे याद है बेटा।”
आदित्य ने अपनी बात पूरी करते हुए कहा, “आपने मेरे हाथ जोड़कर कहा था- ‘बाबूजी! इंसान वही है जो डूबते को सहारा दे। किसी की मजबूरी और परेशानी का फायदा उठाना तो सबसे बड़ा पाप है। मैं एक गरीब ऑटो वाला जरूर हूँ, लेकिन मेरा जमीर बहुत अमीर है। रही बात इन पैसों की, तो मुसीबत में पड़े किसी व्यक्ति की मदद करने की कोई कीमत नहीं
होती। मैं कभी किसी मजबूर की मजबूरी से अपनी मजदूरी नहीं लेता। मेरी इस मजदूरी का हिसाब मेरा ईश्वर अपनी डायरी में रखता है। जब मेरे अच्छे कर्म वहाँ जमा हो जाएंगे, तो ऊपर वाला खुद मुझे मेरा सबसे बड़ा इनाम दे देगा।'”
शहर के सबसे बड़े और महंगे ‘संजीवनी सुपर स्पेशलिटी अस्पताल’ के आईसीयू के बाहर एक अजीब सी खामोशी और डर का माहौल था। साठ वर्षीय कैलाश अपनी पत्नी सुशीला के साथ फर्श पर बैठे शून्य में घूर रहे थे। उनके कपड़ों पर लगे खून के दाग और आँखों से लगातार बहते आंसू उनकी पीड़ा की गवाही दे रहे थे।
कुछ ही घंटों पहले उनका इकलौता पच्चीस वर्षीय बेटा, राहुल, अपनी मोटरसाइकिल से फैक्ट्री जाते समय एक भयानक सड़क दुर्घटना का शिकार हो गया था। राहुल ही उस गरीब परिवार का एकमात्र सहारा था। कैलाश जीवन भर एक साधारण ऑटो चालक रहे थे और अब उम्र के इस पड़ाव पर बेटे ने घर की जिम्मेदारी संभाली थी।
डॉक्टर ने स्पष्ट कह दिया था कि राहुल के सिर में गंभीर चोटें आई हैं और उसे तुरंत दो बड़ी सर्जरी की आवश्यकता है। इस पूरी प्रक्रिया में कम से कम पंद्रह से बीस लाख रुपये का खर्च आना था।
पंद्रह लाख रुपये! यह रकम कैलाश और सुशीला के लिए किसी दूसरे ग्रह की बात थी। उनके पास कुल जमा पूंजी, पत्नी के कुछ पुराने गहने और गांव की एक छोटी सी जमीन थी, जिसे बेचने पर भी शायद दो-तीन लाख से ज्यादा नहीं मिलते। कैलाश ने अपने हर रिश्तेदार, हर जान-पहचान वाले को फोन किया, लेकिन इतनी बड़ी रकम देने के लिए कोई आगे नहीं आया। कुछ ने हमदर्दी जताई, तो कुछ ने अपनी मजबूरियां गिना दीं। सुशीला भगवान की मूर्ति के सामने हाथ जोड़े लगातार रो रही थी, “हे ईश्वर, मेरे बेटे की रक्षा करना। हमने कभी किसी का बुरा नहीं चाहा, फिर हमारे साथ ऐसा क्यों?” कैलाश को लग रहा था जैसे उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई हो। अस्पताल का प्रबंधन पैसे जमा करने का दबाव बना रहा था और समय तेजी से बीत रहा था।
उसी वक्त, अस्पताल के संस्थापक और शहर के सबसे बड़े उद्योगपति, श्रीमान आदित्य बंसल , अपने विदेशी दौरे से लौटकर अस्पताल का औचक निरीक्षण कर रहे थे। उनके साथ डॉक्टरों और अस्पताल के वरिष्ठ अधिकारियों की एक पूरी टीम चल रही थी। आदित्य बंसल एक बेहद सख्त, अनुशासित और उसूलों वाले इंसान माने जाते थे। उनका अस्पताल गरीबों के लिए कुछ रियायतें जरूर देता था, लेकिन बिना पैसे के इलाज की कोई नीति वहां नहीं थी। जब आदित्य आईसीयू वार्ड के पास से गुजर रहे थे, तो उनकी नजर फर्श पर बैठे उस रोते हुए बुजुर्ग दंपत्ति पर पड़ी। उनकी नजरें कैलाश के चेहरे पर जाकर टिक गईं। वे अचानक रुक गए। उनके पीछे चल रहा पूरा काफिला भी रुक गया।
आदित्य ने अपने चश्मे को ठीक किया और बहुत ध्यान से कैलाश के झुर्रियों वाले चेहरे को देखने लगे। कुछ पल के लिए जैसे समय ठहर सा गया। आदित्य के चेहरे के भाव तेजी से बदले। उन्होंने तुरंत अपने चीफ मेडिकल ऑफिसर को पास बुलाया और बहुत ही धीमी लेकिन सख्त आवाज में पूछा, “यह सज्जन कौन हैं और अंदर किसका इलाज चल रहा है?” चीफ मेडिकल ऑफिसर ने तुरंत फाइल मंगवाई और बताया, “सर, यह एक एक्सीडेंट का केस है। इनका बेटा राहुल अंदर है। हालत बहुत नाजुक है। दो सर्जरी होनी हैं, जिसका एस्टीमेट करीब अठारह लाख रुपये है। लेकिन ये लोग बहुत गरीब हैं और पैसे जमा नहीं कर पा रहे हैं। हम इन्हें किसी सरकारी अस्पताल में शिफ्ट करने की सलाह देने वाले थे।”
यह सुनते ही आदित्य की आँखों में एक अजीब सी चमक और पीड़ा एक साथ तैर गई। उन्होंने बेहद सख्त लहजे में कहा, “डॉक्टर, इस लड़के की जान बचनी चाहिए, चाहे इसके लिए देश के सबसे बड़े सर्जन को बुलाना पड़े। और सुनिए, इस परिवार से इलाज, दवाइयों, कमरे या सर्जरी के नाम पर एक भी पैसा नहीं लिया जाएगा। इनका पूरा बिल मेरे व्यक्तिगत खाते में डाला जाए। अगर इस परिवार को अस्पताल में कोई भी तकलीफ हुई, तो इसका जिम्मेदार मैं आपको मानूंगा।”
पूरी मेडिकल टीम हैरान रह गई। आदित्य बंसल, जो कभी नियमों से समझौता नहीं करते थे, आज एक अनजान मरीज के लिए लाखों रुपये का बिल खुद भरने को तैयार थे। डॉक्टरों की टीम तुरंत राहुल के इलाज में जुट गई। कुछ ही देर में अस्पताल का रवैया बदल गया। जो स्टाफ कुछ देर पहले कैलाश को वहां से हटने के लिए कह रहा था, वह अब उन्हें सम्मान के साथ एक निजी वीआईपी प्रतीक्षालय में ले गया। कैलाश और सुशीला इस चमत्कार को समझ नहीं पा रहे थे। उन्हें लगा कि शायद उनके आंसुओं ने भगवान का दिल पिघला दिया है।
अगले पच्चीस दिनों तक राहुल अस्पताल में रहा। उसकी दोनों सर्जरी पूरी तरह से सफल रहीं। इस दौरान आदित्य बंसल ने खुद कई बार आईसीयू में जाकर राहुल की सेहत का जायजा लिया, लेकिन उन्होंने कभी कैलाश के सामने आकर अपनी पहचान जाहिर नहीं की। उन्होंने स्टाफ को भी सख्त हिदायत दी थी कि उनके इस फैसले के बारे में मरीज के परिवार को कुछ न बताया जाए। कैलाश और सुशीला को बस यही पता था कि अस्पताल के किसी ट्रस्ट ने उनके बेटे के इलाज का खर्च उठाया है।
पच्चीसवें दिन, जब राहुल पूरी तरह से ठीक होकर अपने पैरों पर खड़ा होने लायक हो गया, तो उसे डिस्चार्ज करने का समय आया। कैलाश ने इन पच्चीस दिनों में अपनी गांव की जमीन और पत्नी के गहने बेचकर करीब चार लाख रुपये इकट्ठा कर लिए थे। उन्हें लगा था कि ट्रस्ट भले ही मदद कर दे, लेकिन फिर भी कुछ तो अस्पताल का खर्च होगा ही। वे उस पैसों से भरे कपड़े के थैले को सीने से लगाए सीधे बिलिंग काउंटर पर पहुंचे। जब उन्होंने राहुल का नाम बताया, तो अकाउंटेंट ने मुस्कुराकर कहा, “बाबा, आपका बिल जीरो है। आपको एक भी पैसा नहीं देना है। लेकिन आपको डिस्चार्ज पेपर लेने से पहले हमारे चेयरमैन सर से उनके केबिन में मिलना होगा, उन्होंने आपको याद किया है।”
कैलाश भारी कदमों और धड़कते दिल के साथ अस्पताल की सबसे ऊपरी मंजिल पर पहुंचे। वहाँ एक बेहद आलीशान और बड़ा केबिन था। जैसे ही उन्होंने केबिन का दरवाजा खोला और अंदर कदम रखा, अपनी कुर्सी पर बैठे आदित्य बंसल तुरंत खड़े हो गए। वे तेजी से चलकर कैलाश के पास आए और इससे पहले कि कैलाश कुछ समझ पाते, उस इंसान ने झुककर कैलाश के पैर छू लिए।
कैलाश हक्के-बक्के रह गए। वे घबराकर पीछे हटे और बोले, “अरे बाबूजी! यह क्या कर रहे हैं आप? आप तो इतने बड़े आदमी हैं, मेरे जैसे गरीब के पैर क्यों छू रहे हैं? मैं तो आपका जीवन भर कर्जदार रहूंगा कि आपने मेरे बेटे की जान बचा ली।”
आदित्य की आँखों से आंसू बहने लगे। उन्होंने कैलाश के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए और रुंधे हुए गले से बोले, “कैलाश काका! क्या आपने मुझे नहीं पहचाना?”
कैलाश ने अपनी धुंधली आँखों से उस सूट-बूट वाले रसूखदार व्यक्ति को गौर से देखा, लेकिन वे कुछ याद नहीं कर पाए। उन्होंने धीरे से ना में सिर हिला दिया।
आदित्य ने उन्हें सोफे पर बैठाया और खुद उनके सामने एक छोटी सी कुर्सी खींचकर बैठ गए। फिर उन्होंने अतीत के पन्नों को पलटते हुए कहा, “काका, आज से ठीक बीस साल पहले की बात है। मैं तब कोई बड़ा आदमी नहीं था। मैं एक छोटी सी कंपनी में सेल्समैन की नौकरी करता था और साथ ही अपना छोटा-मोटा व्यापार शुरू करने की कोशिश कर रहा था। उस साल मेरी छोटी बहन की शादी तय हुई थी। मैंने अपनी पूरी जमा-पूंजी, रिश्तेदारों से लिया गया कर्ज और अपनी कंपनी का कुछ कलेक्शन मिलाकर कुल पांच लाख रुपये नकद एक काले रंग के ब्रीफकेस में रखे थे। उसी ब्रीफकेस में मेरी बहन की शादी के गहने और मेरी पुश्तैनी जमीन के कागजात भी थे।”
कैलाश बहुत ध्यान से सुन रहे थे, लेकिन उन्हें अब भी कुछ याद नहीं आ रहा था।
आदित्य ने आगे बताया, “वह सर्दियों की एक बहुत भयानक रात थी। मूसलाधार बारिश हो रही थी। मैं रात के बारह बजे रेलवे स्टेशन पर उतरा था। मुझे किसी सस्ते से लॉज में जाना था। बारिश बहुत तेज थी और कोई भी गाड़ी वाला जाने को तैयार नहीं था। तब आप अपने पुराने ऑटो के साथ वहां खड़े थे। आपने मुझे मेरे लॉज तक छोड़ा। मैं उस वक्त अपनी बहन की शादी की चिंताओं और व्यापार के तनाव में इतना डूबा हुआ था कि ऑटो से उतरते समय अपना वह रुपयों और गहनों से भरा ब्रीफकेस आपके ऑटो में ही भूल गया।”
यह सुनते ही कैलाश की आँखों में बीस साल पुरानी वो धुंधली सी याद अचानक साफ हो गई। उनके चेहरे के भाव बदलने लगे।
आदित्य गहरी सांस लेते हुए बोले, “जब मैं लॉज के कमरे में पहुंचा और मुझे अहसास हुआ कि मेरा ब्रीफकेस गायब है, तो मुझे लगा जैसे मेरे प्राण ही निकल गए हों। वो पांच लाख रुपये उस जमाने में मेरे लिए पांच करोड़ के बराबर थे। मेरी बहन की शादी टूट जाती, कर्जदार मुझे मार डालते। मैंने बारिश में पागलों की तरह सड़क पर दौड़ लगाई, लेकिन आप जा चुके थे। मैं टूट चुका था। रात के दो बज रहे थे। मैंने तय कर लिया था कि मैं सुबह की ट्रेन के आगे कटकर अपनी जान दे दूंगा, क्योंकि मेरे पास इसके अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था।”
कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया था। सिर्फ आदित्य की भर्राई हुई आवाज गूंज रही थी।
“मैं कमरे में बैठकर रो रहा था कि तभी रात के करीब तीन बजे मेरे दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी। मैंने दरवाजा खोला तो देखा, आप पूरी तरह से बारिश में भीगे हुए खड़े थे। ठंड से आप कांप रहे थे और आपके सीने से मेरा वह काला ब्रीफकेस चिपका हुआ था। आपने स्टेशन के आस-पास के लगभग पंद्रह लॉज में जाकर रिसेप्शन पर एक मायूस से दिखने वाले लड़के के बारे में पूछा था, तब जाकर आप मुझ तक पहुंचे थे। जब आपने वह ब्रीफकेस मुझे दिया और मैंने उसे खोलकर देखा, तो उसमें से एक रुपया भी कम नहीं था। मुझे लगा जैसे साक्षात भगवान मेरे सामने खड़े हैं।”
कैलाश की आँखों में भी अब आंसू आ गए थे। उनके चेहरे पर एक संतोष भरी मुस्कान थी।
आदित्य ने कहा, “मैंने रोते हुए आपके पैर पकड़ लिए थे और खुशी के मारे आपको पच्चीस हजार रुपये इनाम के तौर पर देने चाहे थे। मेरे पास शब्द नहीं थे। लेकिन काका, क्या आपको याद है कि उस रात आपने मुझसे क्या कहा था?”
कैलाश ने एक लंबी सांस ली और बोले, “मुझे याद है बेटा।”
आदित्य ने अपनी बात पूरी करते हुए कहा, “आपने मेरे हाथ जोड़कर कहा था- ‘बाबूजी! इंसान वही है जो डूबते को सहारा दे। किसी की मजबूरी और परेशानी का फायदा उठाना तो सबसे बड़ा पाप है। मैं एक गरीब ऑटो वाला जरूर हूँ, लेकिन मेरा जमीर बहुत अमीर है। रही बात इन पैसों की, तो मुसीबत में पड़े किसी व्यक्ति की मदद करने की कोई कीमत नहीं होती। मैं कभी किसी मजबूर की मजबूरी से अपनी मजदूरी नहीं लेता। मेरी इस मजदूरी का हिसाब मेरा ईश्वर अपनी डायरी में रखता है। जब मेरे अच्छे कर्म वहाँ जमा हो जाएंगे, तो ऊपर वाला खुद मुझे मेरा सबसे बड़ा इनाम दे देगा।'”
आदित्य ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा, “काका, आपके उन शब्दों ने मेरे जीवन की दिशा ही बदल दी। एक गरीब ऑटो वाले के इतने ऊंचे और पवित्र विचार सुनकर मुझे खुद पर शर्म आई। मैंने उसी रात संकल्प लिया कि मैं अपने जीवन में और अपने व्यापार में कभी भी बेईमानी, स्वार्थ और किसी की मजबूरी का फायदा उठाने वाला काम नहीं करूंगा। मैंने आपके उन्हीं सिद्धांतों को अपना आदर्श बनाया। मैंने दिन-रात ईमानदारी से मेहनत की। ईश्वर ने भी मेरा साथ दिया और आज मैं इस शहर के सबसे बड़े अस्पतालों और कारोबार का मालिक हूँ। मुझे कभी किसी चीज की कमी नहीं पड़ी।”
कैलाश ने अपना रुपयों वाला थैला आगे बढ़ाते हुए कहा, “बेटा, मुझे बहुत खुशी है कि तुम इतने बड़े और नेक इंसान बने। तुमने मेरे बेटे को नई जिंदगी दी है, लेकिन मैं यह मुफ्त में कैसे ले सकता हूँ? मेरे पास ये चार लाख रुपये हैं, इन्हें अस्पताल के खाते में जमा कर लो।”
आदित्य ने उस थैले को वापस कैलाश की तरफ धकेलते हुए कहा, “काका, उस रात आपने मेरी जान बचाई थी, मेरी बहन का घर बसने से बचाया था और मुझे ईमानदारी का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाया था। अगर उस रात आप वो ब्रीफकेस लेकर चले जाते, तो आज मेरा वजूद ही नहीं होता। यह अस्पताल मेरा है, और आप यहाँ मेरे अतिथि बनकर आए हैं। यह जो पच्चीस दिन मैंने आपके बेटे का इलाज किया है, यह मैंने नहीं किया है। यह उस ऊपर वाले ने आपकी उसी डायरी का हिसाब बराबर किया है। भगवान ने आपकी बीस साल पुरानी मजदूरी का कर्ज आज सूद समेत चुका दिया है। अगर मैं आज आपसे एक भी रुपया लूंगा, तो मेरा वह ईश्वर मुझसे नाराज हो जाएगा।”
आदित्य ने अपने केबिन में लगी भगवान कृष्ण की मूर्ति की तरफ देखते हुए कहा, “ज्ञान और प्रेरणा पाने के लिए जरूरी नहीं कि हम किसी बड़े महापुरुष या गुरु के पास ही जाएं। एक साधारण और गरीब इंसान भी अपने कर्मों से हमें जीवन की सबसे बड़ी शिक्षा दे सकता है।”
कैलाश ने खड़े होकर दोनों हाथ जोड़कर भगवान की मूर्ति की ओर देखा और मन ही मन कहा, “हे प्रभु! तेरे न्याय और तेरे हिसाब-किताब पर मेरा विश्वास आज और भी पक्का हो गया। तू सच में अपने बंदों के कर्मों का कर्ज कभी अपने पास नहीं रखता।”
आदित्य ने अपनी कार से कैलाश, सुशीला और राहुल को उनके घर तक पूरे सम्मान के साथ विदा किया। लौटते समय कैलाश को ऐसा लग रहा था मानो उनके जीवन का सबसे बड़ा सच आज उनके सामने एक चमत्कार बनकर खड़ा हो गया हो – कर्म लौटकर आते हैं, बस उनका रास्ता और समय ईश्वर तय करता है।
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कर्मों का खाता: एक अनकही उधारी
लेखक : नीतीश मिश्रा