स्वाभिमान का आँगन

 “माथुर साहब, मैं मजाक के मूड में बिल्कुल नहीं हूँ। सुनिए मेरी बात ध्यान से। ईश्वर की दया से मेरे पास धन की कोई कमी नहीं है। मैंने अपनी मेहनत से कमाया है और मेरे बेटे अक्षत ने अपनी योग्यता से अपने लिए एक मुकाम बनाया है। आपके जीवन भर की पसीने की कमाई, आपके … Read more

दलदल से शिखर तक

उर्मिला का दिल भीतर तक रो पड़ा। जिस बेटे को उन्होंने फूलों की तरह सहेजा था, वह इस बदबूदार माहौल और गंदी लतों की गिरफ्त में फंसा हुआ था। किसी भी सामान्य माँ की तरह उर्मिला का पहला आवेग चीखने-चिल्लाने, रोने और बेटे को कोसने का हो सकता था। लेकिन उर्मिला ने असाधारण संयम का … Read more

धूप की छांव

 हरिशंकर जी ने आंखें बंद कर लीं। उन्हें लगा कि शायद अब जीवन की इस यात्रा का अंतिम पड़ाव आ गया है। बंद पलकों के पीछे उन्हें अपने बाबूजी का मुस्कुराता चेहरा दिखाई दिया। बाबूजी हाथ हिला रहे थे, जैसे कह रहे हों, “आ जा बबुआ, बहुत थक गया है तू।” हरिशंकर जी के मन … Read more

ज़िद की एक चुटकी

  शाम के करीब सात बजे थे और अनघा के चेहरे पर तनी हुई भृकुटियां साफ बता रही थीं कि भीतर कोई तूफान उबल रहा है। काउंटर पर रखी गाजर, बीन्स और शिमला मिर्च पर उसका चाकू कुछ ज़्यादा ही ज़ोर से चल रहा था। चॉपिंग बोर्ड पर हर वार के साथ वह बुदबुदाती जा रही … Read more

त्याग की धूप, उम्मीद की छांव

 उम्र के चालीसवें पड़ाव को पार करते ही शरीर ने भी साथ छोड़ना शुरू कर दिया था। गठिया का दर्द और रीढ़ की हड्डी की तकलीफ रोज़ का साथी बन गई थी। एक दिन भारी बारिश के बीच घर की छत से पानी टपकने लगा। दर्द से कराहती अनन्या जब बाल्टी रखने उठी, तो उसका … Read more

अनकही चीख और जागते पहरेदार

 अनुराधा अपनी बेटी के आंसुओं को पोंछते हुए आगे आई। उसने आरुषि का हाथ अपने हाथ में लिया और भरी आँखों से कहा, “आरुषि, बेटा… आज अपनी इस कमजोर माँ को माफ कर देना जो तेरी खामोशी को नहीं समझ सकी। लेकिन आज तू चुप नहीं रहेगी। इस हैवान को बता कि तू कमजोर नहीं … Read more

छूटा हुआ मायका  

वंदना और रागिनी ने मना करने की बहुत कोशिश की कि भाभी आपको तकलीफ होगी, पर शालिनी ने एक न सुनी। आलोक ने मुस्कुराते हुए टिकट रद्द करा दिया और यात्रा की तारीख चार दिन आगे बढ़ा दी। उन चार दिनों में घर का माहौल और भी अधिक उत्सव जैसा हो गया। भाभी दोनों बहनों … Read more

ज़िंदगी की ढाल

अवनि ने आगे बढ़कर मां की कांपती, सूखी और ठंडी हथेली को अपने दोनों हाथों में थाम लिया। उस हथेली की त्वचा खुरदरी थी, जिस पर बरसों की मेहनत और अपनों की परवाह की लकीरें साफ देखी जा सकती थीं। अवनि का दिल जैसे किसी भारी पत्थर के नीचे दब गया। उसने महसूस किया कि … Read more

मां का आंचल

दिसंबर की सर्द शाम में जब कॉरपोरेट टावर की चौदहवीं मंजिल पर स्थित कांच के आलीशान केबिन की लाइट ऑन हुई, तो कांच की दीवारों से छनकर आती रोशनी सीधे मेज पर सजे चमचमाते ग्लास-अवॉर्ड्स पर पड़ी। उस ठंडी चमक में भी एक अजीब सा सन्नाटा और खामोशी थी। मेज के पीछे बैठी अवनि त्रिवेदी … Read more

उजास की ओर

 भानुप्रताप जी की आँखों से एक बूँद टपककर मीरा की हथेली पर गिर गई। उन्होंने कांपते हाथों से उसके सिर के बिखरे बालों को सहलाया, “पगली, काश मेरे बस में होता कि मैं समय के चक्र को बाँध लेता और आजीवन तेरी हिफाज़त करता। पर यह काया तो नश्वर है न बेटी। आज नहीं तो … Read more

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