विश्वास की डोर

सुमित्रा ताई ने बीच में ही बात काटते हुए चीखकर कहा, “चुप कर बेशर्म! एक तो चोरी, ऊपर से सीनाज़ोरी। अगर तू उसे घास नहीं डालती तो वो तेरे पीछे क्यों पड़ता? तालियां कभी एक हाथ से नहीं बजतीं मीना। कुछ तो इसने भी इशारा किया होगा, तभी तो उस लड़के की इतनी हिम्मत हुई। मैंने तो तुम्हारे भले के लिए कहा था कि बारहवीं के बाद इसकी शादी कर दो, लेकिन तुम ठहरी पढ़ी-लिखी और आधुनिक विचारों वाली। अब देख लिया अपनी आज़ादी का नतीजा? कल को अगर कोई ऊंच-नीच हो गई तो समाज को क्या मुँह दिखाओगे?”

शाम का धुंधलका धीरे-धीरे शहर की पुरानी बस्ती पर उतर रहा था। आँगन में तुलसी के पास दीया जलाकर मीना अभी अपनी सिलाई मशीन के पास बैठी ही थी कि तभी बाहर के दरवाज़े पर ज़ोर से किसी के कदमों की आहट हुई। इससे पहले कि मीना कुछ समझ पाती, घर की बड़ी ताई यानी उसकी जेठानी सुमित्रा देवी ने धड़धड़ाते हुए अंदर प्रवेश किया। सुमित्रा देवी के चेहरे पर गुस्सा और लालिमा साफ झलक रही थी, और उनके एक हाथ में मीना की बाइस साल की बेटी राधिका की कलाई बहुत ज़ोर से पकड़ी हुई थी। राधिका का चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ था और उसकी आँखें ज़मीन की तरफ झुकी थीं। आँगन में पसरी शांति अचानक एक भयंकर तूफान में बदल गई।

“लो, संभालो अपनी इस लाड़ली को! मैंने तो पहले ही कहा था कि इन लड़कियों को शहर के उस बड़े कॉलेज में भेजने का कोई फायदा नहीं है, लेकिन तुम कहाँ सुनने वाली थी। अब भुगतो और पूरे खानदान के मुँह पर कालिख पुतवा दो!” सुमित्रा ताई ने राधिका का हाथ झटकते हुए कहा। राधिका लड़खड़ा कर अपनी माँ के पास गिर सी गई और सिसक-सिसक कर रोने लगी।

मीना के हाथ से कपड़े का टुकड़ा छूट गया। उसने घबराहट में राधिका को गले से लगाया और सुमित्रा ताई की तरफ हैरानी से देखते हुए पूछा, “क्या हुआ ताई जी? आप इतने गुस्से में क्यों हैं और राधिका ऐसे क्यों रो रही है? कोई बात है क्या?”

“बात? अरे बात तो इसने कुछ छोड़ी ही नहीं है मीना! मोहल्ले वाले क्या सोचेंगे? मैं आज मंदिर से लौट रही थी, तो मैंने अपनी आँखों से देखा इसे। चौराहे के पास वाले कैफे के बाहर, वो जो शर्मा जी का बिगड़ा हुआ लड़का है ना, विकास, उसके साथ खड़ी होकर बातें कर रही थी। और तो और, वो लड़का इसे कोई डिब्बा या तोहफा सा दे रहा था। शर्म के मारे मेरा तो सिर ही झुक गया जब बगल से गुज़रती हुई दो औरतों ने मुझे ताना मारा कि देखो, सुमित्रा जी की भतीजी कॉलेज की पढ़ाई के नाम पर क्या गुल खिला रही है!” सुमित्रा देवी ने हाथ नचाते हुए इस तरह बात कही जैसे उन्होंने कोई बहुत बड़ा अपराध पकड़ लिया हो।

मीना का दिल एक पल के लिए धक से रह गया। राधिका बचपन से ही पढ़ने में बहुत तेज़ थी। मीना के पति का साया जब से सिर से उठा था, तब से मीना ने दिन-रात लोगों के कपड़े सिलकर, पाई-पाई जोड़कर राधिका को इस मुकाम तक पहुँचाया था। उसका सपना था कि राधिका पढ़-लिखकर सरकारी अफसर बने। लेकिन आज ये कैसी बात सुनने को मिल रही थी?

राधिका ने अपनी माँ की तरफ देखा, उसकी आँखों में एक बेबसी थी। “माँ, ताई जी गलत समझ रही हैं। मैंने कुछ नहीं किया है। वो विकास पिछले एक महीने से मुझे परेशान कर रहा है। वो मेरा पीछा करता है। आज जब मैं बस से उतरी तो वो फिर से मेरे रास्ते में आकर खड़ा हो गया। वो मुझे एक लिफाफा ज़बरदस्ती देने की कोशिश कर रहा था और मैं उसे डांट रही थी। मैं उसे चेतावनी दे रही थी कि अगर उसने मेरा पीछा नहीं छोड़ा तो मैं पुलिस में शिकायत कर दूँगी। तभी ताई जी वहाँ आ गईं। उन्होंने मेरी एक नहीं सुनी, मुझे वहीं सबके सामने थप्पड़ मार दिया और घसीटते हुए यहाँ ले आईं।”

सुमित्रा ताई ने बीच में ही बात काटते हुए चीखकर कहा, “चुप कर बेशर्म! एक तो चोरी, ऊपर से सीनाज़ोरी। अगर तू उसे घास नहीं डालती तो वो तेरे पीछे क्यों पड़ता? तालियां कभी एक हाथ से नहीं बजतीं मीना। कुछ तो इसने भी इशारा किया होगा, तभी तो उस लड़के की इतनी हिम्मत हुई। मैंने तो तुम्हारे भले के लिए कहा था कि बारहवीं के बाद इसकी शादी कर दो, लेकिन तुम ठहरी पढ़ी-लिखी और आधुनिक विचारों वाली। अब देख लिया अपनी आज़ादी का नतीजा? कल को अगर कोई ऊंच-नीच हो गई तो समाज को क्या मुँह दिखाओगे?”

इतने में घर के बाकी सदस्य, मीना के देवर और सास भी आँगन में जमा हो गए थे। सब राधिका को शक की नज़रों से देख रहे थे। सास ने भी अपनी बहु सुमित्रा का साथ देते हुए कहा, “सुमित्रा सही कह रही है मीना। हमारी इज्ज़त बहुत कीमती है। कल से राधिका का कॉलेज जाना बंद। वैसे भी अब इसकी उम्र हो गई है। हम सब मिलकर इसके लिए कोई अच्छा सा घर-वर देखते हैं और इसके हाथ पीले कर देते हैं। यही इसके और हमारे परिवार के लिए सही रहेगा।”

राधिका अब तक फूट-फूट कर रो रही थी। उसे लगा जैसे उसके सारे सपने, उसकी सारी मेहनत, रात-रात भर जागकर की गई उसकी पढ़ाई, सब कुछ एक पल में चकनाचूर हो रहा है। समाज की झूठी मर्यादा और औरतों के प्रति इस संकीर्ण सोच ने आज उसे कटघरे में खड़ा कर दिया था। वह जानती थी कि उसके पास खुद को बेकसूर साबित करने का कोई गवाह नहीं था।

मीना कुछ देर तक चुप रही। उसने अपनी बेटी के चेहरे को अपने दोनों हाथों में लिया। राधिका की आँखों में जो सच्चाई और दर्द था, वो मीना से छुपा नहीं था। एक माँ अपनी औलाद को दुनिया में सबसे बेहतर जानती है। मीना को याद आया कि कैसे राधिका बचपन में एक बार स्कूल से रोते हुए आई थी क्योंकि किसी ने उसकी किताब फाड़ दी थी, और उसने कभी झूठ नहीं बोला था। आज भी राधिका की आँखों में वही मासूमियत और सच्चाई थी। मीना का दिल गवाही दे रहा था कि उसकी बेटी बेकसूर है और वो एक ऐसे समाज का शिकार हो रही है जो हमेशा लड़कियों पर ही उंगली उठाना आसान समझता है।

मीना धीरे से उठी। उसके चेहरे पर अब घबराहट की जगह एक शांत दृढ़ता आ गई थी। उसने सुमित्रा ताई और अपनी सास की तरफ देखा। उसकी आवाज़ में एक ऐसा ठहराव था जिसने पूरे आँगन में सन्नाटा कर दिया।

“मेरी बेटी कल भी कॉलेज जाएगी और परसों भी जाएगी।” मीना ने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा।

“क्या बकवास कर रही है तू?” सुमित्रा ताई गुस्से से तिलमिला उठीं। “क्या तुझे समाज का कोई खौफ नहीं है?”

मीना ने गहरी साँस ली और कहा, “समाज? ताई जी, ये समाज तब कहाँ था जब मेरे पति गुज़र गए थे और मैं अपनी चार साल की बच्ची को लेकर दाने-दाने को मोहताज थी? ये समाज तब कहाँ था जब मैं रातों को जागकर कपड़े सिलती थी ताकि मेरी बेटी की स्कूल की फीस भर सकूँ? तब तो किसी ने आगे आकर हमारा हाथ नहीं थामा। आज जब मेरी बेटी अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती है, कुछ बनना चाहती है, तो यही समाज उसकी राह में कांटे बिछाने आ गया है? और रही बात उस लड़के की, तो अगर राधिका कह रही है कि वो उसे परेशान कर रहा था, तो मैं अपनी बेटी पर विश्वास करूँगी, ना कि उन मोहल्ले वालों की बातों पर जिन्हें सिर्फ तमाशा देखने में मज़ा आता है।”

“पर बेटी, तालियां दोनों हाथों से…” सास ने कुछ कहना चाहा लेकिन मीना ने उन्हें बीच में ही टोक दिया।

“नहीं माँ जी! ये सबसे बड़ा झूठ है जो हमारी समाज की औरतों को बचपन से सिखाया जाता है। अगर कोई आवारा लड़का किसी लड़की का रास्ता रोकता है, तो उसमें लड़की की कोई गलती नहीं होती। गलती उस लड़के की परवरिश की है, गलती उस समाज की है जो लड़कों से सवाल नहीं करता बल्कि लड़कियों को घर में बिठा देता है। अगर आज मैं अपनी बेटी को घर में बिठा दूँगी, तो वो लड़का जीत जाएगा और मेरी राधिका हार जाएगी। कल को ऐसे लड़के किसी और लड़की का रास्ता रोकेंगे क्योंकि उन्हें पता है कि आखिर में सज़ा लड़की को ही मिलेगी।”

मीना ने राधिका का हाथ कसकर थाम लिया और कहा, “मुझे अपनी परवरिश पर और अपनी बेटी पर पूरा भरोसा है। वो कॉलेज जाएगी, अपनी पढ़ाई पूरी करेगी और अपने सपने सच करेगी। जब तक वो खुद अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो जाती, इस घर में कोई भी उसकी शादी की बात नहीं करेगा। और हाँ, कल मैं खुद राधिका के साथ उस लड़के के घर जाऊँगी और उसके माँ-बाप से बात करूँगी। अगर वो नहीं माने तो मैं पुलिस में शिकायत करने से भी पीछे नहीं हटूँगी।”

मीना की इन बातों ने पूरे घर को जैसे निशब्द कर दिया था। सुमित्रा ताई कुछ देर बड़बड़ाती रहीं और फिर पैर पटकते हुए अपने कमरे में चली गईं। सास और देवर भी चुपचाप वहाँ से खिसक गए।

आँगन में अब सिर्फ मीना और राधिका बचे थे। राधिका ने अपनी माँ को गले लगा लिया और फफक-फफक कर रो पड़ी। लेकिन ये आँसू अब बेबसी के नहीं थे, ये सुकून के आँसू थे। उसे दुनिया की सबसे बड़ी दौलत मिल गई थी—उसकी माँ का भरोसा।

अगले दिन मीना ने वही किया जो उसने कहा था। वो राधिका को लेकर उस लड़के के घर गई। उसने उस लड़के के परिवार को इतनी कड़ी चेतावनी दी कि विकास ने फिर कभी राधिका की तरफ आँख उठाकर देखने की भी हिम्मत नहीं की।

समय अपनी गति से बीतता रहा। इस घटना के बाद मीना और राधिका ने घर के बाकी लोगों की बातों और तानों पर ध्यान देना बंद कर दिया। राधिका ने अपनी पढ़ाई में दिन-रात एक कर दिया। वह हर रोज़ सुबह जल्दी उठती, कॉलेज जाती, फिर लाइब्रेरी में घंटों पढ़ाई करती। मीना भी उसकी ढाल बनकर हमेशा उसके साथ खड़ी रही। जब भी मोहल्ले वाले कोई ताना मारते, मीना बस मुस्कुरा कर टाल देती। वह जानती थी कि हर सवाल का जवाब सिर्फ सफलता से दिया जा सकता है।

तीन साल बाद, वह दिन आ ही गया जिसका मीना को बेसब्री से इंतज़ार था। राधिका ने राज्य स्तर की सिविल सेवा परीक्षा में टॉप किया था। जब अखबारों में राधिका की तस्वीर छपी और टीवी पर उसका इंटरव्यू आया, तो पूरे शहर में मीना और राधिका के ही चर्चे थे।

आज मीना का छोटा सा घर बधाई देने वालों से भरा हुआ था। जो लोग कल तक राधिका के चरित्र पर उंगली उठाते थे, आज वो उसके साथ एक तस्वीर खिंचवाने के लिए बेताब थे। और सबसे दिलचस्प नज़ारा तो वो था जब सुमित्रा ताई मोहल्ले की औरतों को बता रही थीं, “मैंने तो बचपन में ही कह दिया था कि हमारी राधिका एक दिन पूरे खानदान का नाम रोशन करेगी! आखिर खून किसका है।”

मीना दूर खड़ी यह सब देख रही थी। राधिका आई और उसने अपनी माँ के पैर छुए। मीना ने उसे गले लगा लिया। मीना जानती थी कि आज उसकी जीत हुई है। उसकी बेटी की सफलता ही उस अटूट विश्वास का सबसे बड़ा प्रमाण थी जो उसने अपनी बेटी पर दिखाया था। उस दिन मीना ने समाज को एक बहुत बड़ा सबक सिखाया था कि अगर एक परिवार, खासकर एक माँ, अपनी बेटी पर विश्वास करे, तो वो बेटी आसमान की ऊंचाइयों को छू सकती है और हर झूठे लांछन को अपनी सफलता से धो सकती है।

आपकी नज़र में मीना का अपनी बेटी पर इस तरह भरोसा करना कितना सही था? क्या आपने भी कभी समाज की परवाह किए बिना अपनों का साथ दिया है? अपने विचार कमेंट में ज़रूर बताएं।

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#विश्वास की डोर

मूल लेखिका : संगीता अग्रवाल

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