अम्मा जी कभी निहारिका के सामने उसकी तारीफ नहीं करती थीं। उन्हें लगता था कि ज्यादा तारीफ करने से बहू सिर पर चढ़ जाएगी। इसलिए वह अक्सर कमियां ही निकालती थीं—”सब्जी में नमक थोड़ा कम है”, “कपड़े ठीक से तह नहीं किए”। लेकिन निहारिका को उनकी असलियत तब पता चली,
जब एक दिन वह बाज़ार से जल्दी लौट आई थी। अम्मा जी घर के दालान में बैठी पड़ोसन विमला आंटी से बातें कर रही थीं। विमला आंटी अपनी बहू की बुराई कर रही थीं कि वह कितनी कामचोर है। इस पर अम्मा जी ने सीना तानकर कहा था, “मेरी बहू तो गाय है, गाय! घर का सारा काम ऐसे निपटाती है जैसे कोई मशीन हो।
ना कभी शिकायत करती है, ना कभी माथे पर शिकन लाती है। मेरे विकास की तो किस्मत खुल गई जो निहारिका इस घर में आई। मैं तो कहती हूँ, हर जन्म में भगवान मुझे यही बहू दे।” दरवाज़े के पीछे खड़ी निहारिका की आंखों से उस दिन झर-झर आंसू बह निकले थे। वह सारी शिकायतें, जो उसे अपनी सास से थीं, उस एक पल में आंसुओं के साथ बह गई थीं।
दिवाली में अब बस दो दिन बचे थे। पूरे घर में साफ-सफाई हो चुकी थी, दीवारों पर नया रंग चढ़ चुका था और खिड़कियों पर नए पर्दे झूल रहे थे। निहारिका ने बाज़ार से ढेर सारी खरीदारी भी कर ली थी। दीये, रंगोली के रंग, मिठाइयाँ, बच्चों के लिए कपड़े—सब कुछ ड्राइंग रूम की टेबल पर सलीके से रखा हुआ था।
लेकिन इस सजे-धजे घर में भी एक अजीब सा सन्नाटा पसरा था। निहारिका के हाथों में मेहंदी की एक कीप थी, जिसे उसने कल शाम बाज़ार से खरीदा था। वह पिछले आधे घंटे से उस कीप को बस निहारे जा रही थी। हर साल इस समय तक घर में एक मीठी सी हलचल मची रहती थी।
“अरे निहारिका! अभी तक हाथ खाली क्यों हैं? कल धनतेरस है, जा जाकर पहले मेहंदी लगवा ले। काम तो मैं और रमा (नौकरानी) मिलकर कर लेंगे।” ये आवाज़ अब इस घर में कभी नहीं गूंजने वाली थी। निहारिका की सास, जिन्हें सब ‘अम्मा जी’ कहते थे, पिछले ही महीने इस दुनिया से विदा ले चुकी थीं।
निहारिका की आँखें भर आईं। बचपन से उसने अपनी माँ और मौसियों के मुँह से यही सुना था कि माँ के बिना मायका खत्म हो जाता है। माँ है तो मायका है, वरना भाई-भाभी के घर में वो अपनापन कहाँ मिलता है। लेकिन शादी के आठ साल बाद आज निहारिका को यह गहराई से महसूस हो रहा था कि सास के बिना ससुराल का भी वजूद खत्म हो जाता है।
अम्मा जी, यानी सुमित्रा देवी, कोई बहुत पढ़ी-लिखी या आधुनिक विचारों वाली महिला नहीं थीं। वे एक ठेठ पारंपरिक महिला थीं, जो सुबह पाँच बजे उठकर पूजा-पाठ करतीं और घर के हर छोटे-बड़े काम पर पैनी नज़र रखती थीं। शुरुआत में निहारिका को उनकी ये बातें बहुत खटकती थीं।
उसे लगता था कि उसकी आज़ादी छिन गई है। लेकिन धीरे-धीरे वक्त के साथ निहारिका को समझ में आया कि उस सख्त रवैये के पीछे एक ऐसी ढाल थी, जो हर पल उसे बाहरी दुनिया और परिवार के तानों से बचाती थी।
आज उसे वो पहला करवा चौथ याद आ रहा था। निहारिका के मायके से शगुन का सामान आया था। कपड़े, मिठाइयाँ, फल और कुछ गहने। शाम को जब घर में मोहल्ले की औरतें और कुछ दूर की रिश्तेदार इकट्ठा हुईं, तो एक ताई जी ने साड़ियों की तरफ नाक सिकोड़ते हुए कह दिया, “सुमित्रा, साड़ियाँ तो कुछ हल्की लग रही हैं।
आज-कल तो ऐसे प्रिंट कोई पहनता भी नहीं है। समधियों ने शायद सेल से उठा ली हैं।” निहारिका जो वहीं बैठी थी, उसका चेहरा शर्म से लाल हो गया। इससे पहले कि वह कुछ कह पाती, अम्मा जी ने तुरंत साड़ियों को अपने हाथों में लेकर माथे से लगाया और ताई जी को जवाब देते हुए कहा, “जीजी, साड़ियाँ कीमत से नहीं, नीयत से देखी जाती हैं। मेरे समधियों ने अपनी बेटी के लिए जो भेजा है, वो मेरे लिए शगुन है।
और वैसे भी, मेरी निहारिका इतनी सुंदर है कि ये साड़ियाँ पहनकर जब वो निकलेगी, तो लोग साड़ी नहीं, उसे ही देखते रह जाएंगे।” उस दिन के बाद से ताई जी ने कभी निहारिका के मायके वालों पर उंगली नहीं उठाई। अम्मा जी की वो सहलाती हुई नज़र, जो उन्होंने उस वक्त निहारिका पर डाली थी, आज भी उसके दिल को सुकून दे जाती है।
अम्मा जी का प्यार जताने का तरीका बिल्कुल अलग था। वो कभी निहारिका को गले लगाकर ‘आई लव यू’ नहीं बोलती थीं, न ही उसके साथ बैठकर घंटों गपशप मारती थीं। लेकिन उनके प्यार की गर्माहट घर के हर कोने में रची-बसी थी। जब निहारिका अपने बेटे, अर्णव को जन्म देने वाली थी, तो वह रात का समय था। निहारिका को अचानक दर्द शुरू हुआ। उसके पति, विकास, घबराहट में कार की चाबी ढूंढ़ रहे थे। निहारिका दर्द से कराह रही थी, लेकिन उस वक्त सबसे ज्यादा अगर किसी की हालत खराब थी, तो वो अम्मा जी थीं। उनका पूरा शरीर कांप रहा था। उन्होंने तुरंत अपने हाथों की सोने की चूड़ियां उतारीं और भगवान के सामने मन्नत मांगते हुए रो पड़ीं, “हे भगवान, मेरी बहू को कुछ मत होने देना। चाहे तो मेरी जान ले लेना, पर उसे और उसके बच्चे को सही-सलामत रखना।” अस्पताल के बाहर जब तक डॉक्टर ने यह नहीं कह दिया कि जच्चा-बच्चा दोनों सुरक्षित हैं, अम्मा जी ने अन्न का एक दाना नहीं खाया था और न ही एक घूंट पानी पिया था। उनकी वो घबराहट, वो दुआएं, कोई सगी माँ ही तो कर सकती है!
घर में अक्सर अर्णव की शैतानियों को लेकर निहारिका का पारा चढ़ जाता था। एक दिन अर्णव ने ड्राइंग रूम में रखे कांच के महंगे शोपीस को गेंद मारकर तोड़ दिया। निहारिका ने गुस्से में आकर अर्णव को दो थप्पड़ लगा दिए। अर्णव रोते हुए सीधा अम्मा जी के कमरे में भागा और उनके पल्लू में छुप गया। अम्मा जी लाठी टेकते हुए बाहर आईं और निहारिका को डांटते हुए बोलीं, “तुझे जरा भी अक्ल नहीं है क्या? इतने छोटे बच्चे पर हाथ उठाती है! हमने भी तो विकास को पाला है, पर कभी ऐसे नहीं पीटा। सामान टूट गया तो क्या हुआ, बच्चा डर जाएगा उसका क्या?” उस वक्त निहारिका को बहुत गुस्सा आया था कि अम्मा जी उसे बच्चे को अनुशासित भी नहीं करने देतीं, लेकिन आज जब अर्णव घर में शैतानी करता है, तो निहारिका उसे डांटने के लिए हाथ उठाती है, पर उसे रोकने वाली वो आवाज़ कहीं नहीं होती। वह खुद ही अपने आंसू पोंछकर अर्णव को गले लगा लेती है।
अम्मा जी कभी निहारिका के सामने उसकी तारीफ नहीं करती थीं। उन्हें लगता था कि ज्यादा तारीफ करने से बहू सिर पर चढ़ जाएगी। इसलिए वह अक्सर कमियां ही निकालती थीं—”सब्जी में नमक थोड़ा कम है”, “कपड़े ठीक से तह नहीं किए”। लेकिन निहारिका को उनकी असलियत तब पता चली, जब एक दिन वह बाज़ार से जल्दी लौट आई थी। अम्मा जी घर के दालान में बैठी पड़ोसन विमला आंटी से बातें कर रही थीं। विमला आंटी अपनी बहू की बुराई कर रही थीं कि वह कितनी कामचोर है। इस पर अम्मा जी ने सीना तानकर कहा था, “मेरी बहू तो गाय है, गाय! घर का सारा काम ऐसे निपटाती है जैसे कोई मशीन हो। ना कभी शिकायत करती है, ना कभी माथे पर शिकन लाती है। मेरे विकास की तो किस्मत खुल गई जो निहारिका इस घर में आई। मैं तो कहती हूँ, हर जन्म में भगवान मुझे यही बहू दे।” दरवाज़े के पीछे खड़ी निहारिका की आंखों से उस दिन झर-झर आंसू बह निकले थे। वह सारी शिकायतें, जो उसे अपनी सास से थीं, उस एक पल में आंसुओं के साथ बह गई थीं।
आज जब अम्मा जी नहीं हैं, तो यह दो मंजिला घर उसे काटने को दौड़ता है। रसोई में काम करते हुए अब कोई पीछे से आकर यह नहीं कहता कि, “अरे निहारिका, गैस बंद कर दे और जाकर थोड़ा आराम कर ले, बाकी मैं देख लूंगी।” त्योहारों पर अब कोई उसे नई साड़ी और चूड़ियां पहनने के लिए ताकीद नहीं करता। विकास भी अब बहुत खामोश रहने लगा है। वह ऑफिस से आता है और सीधा अपने कमरे में चला जाता है। पहले वह आते ही सबसे पहले “अम्मा कहाँ हो?” पुकारता था। घर की वो धुरी, जिस पर पूरा परिवार घूमता था, अब टूट चुकी है।
निहारिका ने मेहंदी की कीप को वापस टेबल पर रख दिया। उसकी समझ में आ गया था कि सास सिर्फ पति की माँ नहीं होती, वह उस घर की आत्मा होती है। वह मायके और ससुराल के बीच का वो पुल होती है, जो एक अनजान लड़की को उस नए घर का सबसे अहम हिस्सा बना देती है। अम्मा जी की वो डांट, वो प्यार, वो उलाहने, वो दुआएं… सब कुछ उनके साथ ही चला गया। अब इस घर में सिर्फ एक खालीपन है, जो शायद कभी नहीं भरेगा। सच ही तो है, सास के जाने के बाद ससुराल भी एक तरह से खत्म ही हो जाता है। रह जाती हैं तो बस स्मृतियाँ, जो हर त्योहार, हर खुशी और हर गम में आंखों के किनारों को भिगो जाती हैं।
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लेखिका : अंजना कपूर