मृगतृष्णा और बरगद की छांव
नीता ने अपने आँसू पोंछे और अपने पिता के खुरदरे हाथों को अपने गालों से लगा लिया। “बाबूजी… मैं भी उस छोटी बच्ची की तरह खो गई थी। लेकिन भगवान ने और आपके संस्कारों ने मेरा हाथ पकड़ लिया और मैं वापस आपके पास लौट आई। मुझे कभी खुद से दूर मत करना बाबूजी।” रामदीन … Read more