कबीर ने अपने जूते के फीते बांधते हुए बहुत ही मासूमियत लेकिन एक गहरी समझ के साथ कहा, “पापा, आपको याद है जब हम पिछले साल ट्रिप पर गए थे? मम्मा ने मेरा कितना सारा सामान पैक किया था। मेरी दवाइयां, मेरे खिलौने, मेरे गर्म कपड़े, मेरा मनपसंद खाना। मम्मा कहती हैं कि बच्चों को बाहर ले जाने से पहले बहुत तैयारी करनी पड़ती है ताकि उन्हें कोई तकलीफ न हो।”
कबीर रुका और उसने अपने पापा की आंखों में देखते हुए कहा, “पापा, दादू भी तो अब थोड़े-थोड़े बच्चे जैसे हो गए हैं ना? अगर हम कहीं बाहर जाते हैं तो हम उन्हें घर क्यों छोड़ दें? बस उन्हें हमारी थोड़ी सी मदद और तैयारी की ज़रूरत होती है, बिल्कुल वैसे ही जैसे मुझे आपकी ज़रूरत होती है। दादू को भी नई चीज़ें देखना पसंद है, उन्हें भी हमारे साथ हंसना और मज़ा करना अच्छा लगता है। वो सिर्फ इसलिए मना कर देते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि हम परेशान हो जाएंगे। अगर मम्मा मेरे लिए तैयारी कर सकती हैं, तो क्या हम दादू के लिए थोड़ी सी तैयारी नहीं कर सकते?”
विकास एक मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर था और उसकी पत्नी शालिनी एक इंटीरियर डिज़ाइनर। उनके परिवार का सबसे अहम हिस्सा थे विकास के पिता, रमाकांत जी, जिनकी उम्र सत्तर के पार जा चुकी थी, और उनका बारह साल का बेटा, कबीर। रमाकांत जी एक रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी थे। उनकी दुनिया अब सुबह के अखबार, बालकनी में रखे पौधों और शाम को टीवी पर आने वाले प्रवचनों तक सीमित हो गई थी। विकास और शालिनी अपनी ज़िंदगी में इतने व्यस्त थे कि उन्हें लगता था कि बाबूजी (रमाकांत जी) इसी शांत दिनचर्या में खुश हैं।
रविवार का दिन था। शालिनी और विकास ने शहर के एक नए, बेहद आधुनिक ‘वर्चुअल रियलिटी और गेमिंग एरीना’ में जाने का प्लान बनाया था। यह जगह शहर के सबसे बड़े और नए मॉल में खुली थी, जहां बड़े-बड़े डिजिटल स्क्रीन्स, लेज़र शोज़ और तरह-तरह के आधुनिक गेम्स थे। नाश्ते की मेज पर जब इस ट्रिप की चर्चा हो रही थी, तो विकास ने अपनी पत्नी से धीरे से कहा, “शालिनी, बाबूजी को घर पर ही रहने देते हैं। वहां बहुत शोर होगा, लेज़र की चमक-दमक होगी और हर जगह डिजिटल सिस्टम है। उन्हें वहां कुछ समझ नहीं आएगा और वो बोर हो जाएंगे। वैसे भी उन्हें भीड़-भाड़ और शोर-शराबा कहां पसंद है, उन्हें तो बस अपने कमरे में शांति से बैठना और भजन सुनना अच्छा लगता है।”
शालिनी ने भी हामी भरते हुए कहा, “हां, तुम ठीक कह रहे हो। उनके घुटनों में भी तो तकलीफ रहती है। इतना बड़ा मॉल है, वो चल नहीं पाएंगे। उन्हें घर पर ही आराम करने देते हैं, मैं उनके लिए खाना बनाकर रख दूंगी।”
रमाकांत जी वहीं पास बैठे अपनी चाय पी रहे थे। उन्होंने अपने बेटे और बहू की बातें सुन लीं। उनके चेहरे पर एक हल्की सी उदासी छा गई, लेकिन उन्होंने तुरंत उसे छिपाते हुए एक नकली मुस्कान ओढ़ ली। “हां बेटा, तुम लोग जाओ और खूब मज़ा करो। मेरी वैसे भी कोई इच्छा नहीं है इस उम्र में ये सब चकाचौंध देखने की। मेरे तो घुटनों में भी दर्द है और मुझे वैसे भी घर में ही आराम मिलता है। तुम लोग मेरी चिंता मत करो,” रमाकांत जी ने भारी मन से कहा।
उन्होंने यह बात इसलिए नहीं कही थी कि सच में उन्हें घर में रहना था, बल्कि इसलिए कही थी ताकि उनके बच्चों का मज़ा उनकी वजह से खराब न हो। बुजुर्ग अक्सर अपने मन की इच्छाओं का गला सिर्फ इसलिए घोंट देते हैं ताकि उनके बच्चे उन्हें एक ‘बोझ’ या ‘रुकावट’ न समझें।
लेकिन यह सब कुछ बालकनी के दरवाजे के पास खड़ा बारह साल का कबीर सुन रहा था। वह दौड़कर अंदर आया और बोला, “नहीं! अगर दादू नहीं जाएंगे, तो मैं भी नहीं जाऊंगा।”
विकास ने कबीर को समझाते हुए कहा, “बेटा, दादू वहां जाकर क्या करेंगे? वहां उनके मतलब का कुछ नहीं है। वहां बहुत शोर होगा, उन्हें परेशानी होगी।”
कबीर अपनी ज़िद पर अड़ गया। “दादू चलेंगे, तभी मैं जाऊंगा। दादू ने मुझसे प्रॉमिस किया था कि हम इस वीकेंड साथ में समय बिताएंगे।”
रमाकांत जी ने कबीर को पुचकारा और कहा, “अरे मेरे लाल, मैं वहां क्या करूंगा? तुम अपने मम्मी-पापा के साथ जाओ, मेरे लिए कुछ मीठा लेते आना।”
पर कबीर कहां मानने वाला था। उसकी जिद के आगे किसी की नहीं चली। अंततः विकास और शालिनी को झुकना पड़ा और तय हुआ कि रमाकांत जी भी उनके साथ मॉल जाएंगे। विकास मन ही मन थोड़ा परेशान था कि अब बाबूजी को वहां कैसे संभालेंगे।
निकलने में अभी कुछ घंटे बाकी थे। कबीर ने दादू का हाथ पकड़ा और उन्हें अपने कमरे में ले गया। उसने दरवाज़ा बंद किया और अपना टैबलेट निकाल लिया। “दादू, आज हम एक नया मिशन करेंगे। मैं आपको एक सीक्रेट ट्रेनिंग दूंगा,” कबीर ने अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से देखते हुए कहा।
“कैसी ट्रेनिंग बेटा?” रमाकांत जी ने अचरज से पूछा।
“आज हम जहां जा रहे हैं, वहां सब कुछ जादू जैसा है। वहां टीवी जैसी बड़ी मशीनें होती हैं जिन्हें बस छूने से काम होता है। इसे ‘टच स्क्रीन’ कहते हैं। और वहां एक जादुई चश्मा भी होता है, जिसे पहनकर ऐसा लगता है जैसे हम किसी दूसरी दुनिया में आ गए हों,” कबीर ने बहुत ही प्यार और धैर्य से दादू को समझाना शुरू किया।
कबीर ने अपने टैबलेट पर दादू को उंगलियों से स्क्रीन स्वाइप करना और मेनू में से चीज़ें चुनना सिखाया। उसने दादू के कानों में अपने बड़े वाले हेडफ़ोन लगा दिए और उसमें थोड़ी तेज़ आवाज़ में थीम पार्क का म्यूज़िक चला दिया, ताकि दादू को शोर की आदत हो जाए। “दादू, जब वहां शोर हो, तो आपको बस यह सोचना है कि हम किसी अंतरिक्ष यान में बैठे हैं और यह इंजन की आवाज़ है,” कबीर ने मुस्कुराते हुए कहा। दादू अपने पोते की इस मासूमियत और लगन को देखकर गदगद हो गए। उन्होंने भी एक बच्चे की तरह कबीर की हर बात मानी और टैबलेट पर उंगलियां चलाना सीख लिया।
शाम को सभी मॉल के लिए निकले। जब वे उस विशाल मॉल में दाखिल हुए, तो वहां की रंग-बिरंगी रोशनियों, भारी भीड़ और तेज़ संगीत को देखकर विकास और शालिनी थोड़े असहज हो गए। वे बार-बार मुड़कर रमाकांत जी को देख रहे थे, यह सोचकर कि बाबूजी अभी कहेंगे कि उन्हें घबराहट हो रही है और घर जाना है।
लेकिन शालिनी और विकास तब हैरान रह गए जब उन्होंने देखा कि रमाकांत जी के चेहरे पर कोई शिकन या घबराहट नहीं थी। कबीर ने उनका हाथ कसकर पकड़ा हुआ था और वे दोनों किसी बात पर हंस रहे थे।
जब वे ‘वर्चुअल रियलिटी एरीना’ में पहुंचे, तो वहां हर तरफ बड़ी-बड़ी मशीनें और डिजिटल गेम्स थे। विकास ने सोचा कि बाबूजी को एक कोने में आराम से बिठा देते हैं, जबकि वो और कबीर गेम खेलेंगे। लेकिन कबीर दादू को सीधे एक वीआर (VR) गेमिंग कुर्सी के पास ले गया।
“पापा, दादू भी यह जादुई चश्मा पहनेंगे!” कबीर ने कहा।
विकास झिझका, “बेटा, बाबूजी को चक्कर आ जाएंगे। रहने दो।”
पर रमाकांत जी ने आत्मविश्वास से कहा, “अरे विकास, मुझे भी देखने दे ज़रा ये अंतरिक्ष की दुनिया कैसी होती है। मेरे पोते ने मुझे सब सिखाया है।”
जब अटेंडेंट ने रमाकांत जी को वीआर हेडसेट पहनाया, तो विकास और शालिनी सांस रोककर खड़े थे कि कहीं बाबूजी घबराकर उसे उतार न फेंकें। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। रमाकांत जी कुर्सी पर बैठे-बैठे अपने हाथ हिला रहे थे और ज़ोर-ज़ोर से हंस रहे थे। कबीर ने उन्हें पहले ही बता दिया था कि अंदर जो भी दिखेगा, वह एक फिल्म की तरह है। जब गेम खत्म हुआ और रमाकांत जी ने हेडसेट उतारा, तो उनके चेहरे पर एक ऐसी खुशी और चमक थी जो विकास ने सालों से नहीं देखी थी। वे बिल्कुल एक बच्चे की तरह चहक रहे थे और कबीर को बता रहे थे कि उन्होंने कैसे डिजिटल दुनिया में उड़ती हुई मछलियों को छुआ।
गेमिंग के बाद सभी लोग मॉल के एक बहुत ही आधुनिक और महंगे रेस्तरां में गए। यह एक डिजिटल रेस्तरां था जहां वेटर मेनू कार्ड लेकर नहीं आते थे, बल्कि हर टेबल पर एक डिजिटल टैबलेट लगा हुआ था, जिससे ऑर्डर करना होता था।
विकास अभी अपनी कुर्सी पर बैठ ही रहा था कि कबीर ने तुरंत टेबल से वह टैबलेट निकाला और सीधे दादू के हाथ में थमा दिया। “दादू, आज का खाना आप ऑर्डर करेंगे। आपको पता है न कैसे करना है?”
शालिनी ने टोकना चाहा, “कबीर, दादू को परेशान मत करो। लाओ मैं ऑर्डर कर देती हूं। उन्हें ये सब नहीं आता।”
लेकिन रमाकांत जी ने टैबलेट अपने हाथ में लिया, अपनी ऐनक ठीक की और बहुत ही सहजता से स्क्रीन पर उंगलियां घुमाने लगे। उन्होंने कबीर का मनपसंद पास्ता, विकास के लिए सूप और अपने व शालिनी के लिए इंडियन थाली कार्ट में ऐड की और ‘प्लेस ऑर्डर’ के हरे बटन पर क्लिक कर दिया।
विकास और शालिनी की आंखें फटी की फटी रह गईं। बाबूजी, जिन्हें वे सोचते थे कि स्मार्टफोन पर कॉल उठाने के अलावा कुछ नहीं आता, वे इतनी आसानी से एक डिजिटल रेस्तरां में ऑर्डर दे रहे थे।
खाना खाने के दौरान रेस्तरां का एसी काफी तेज़ था और वहां हल्की ठंडक हो गई थी। विकास अभी वेटर को एसी कम करने के लिए बुलाने ही वाला था कि कबीर ने अपने छोटे से बैकपैक की ज़िप खोली और उसमें से दादू का एक हल्का गर्म शॉल निकाल कर उनके कंधों पर डाल दिया। दादू ने प्यार से कबीर का माथा चूम लिया।
रात को जब सभी लोग कार में वापस घर लौट रहे थे, तो रमाकांत जी और कबीर पिछली सीट पर बैठे गहरी नींद में सो चुके थे। आज का दिन उनके लिए बहुत ही रोमांचक और थका देने वाला था।
विकास, जो अब तक अपने मन में चल रहे विचारों से जूझ रहा था, कार ड्राइव करते हुए बहुत भावुक हो रहा था। अगले दिन सुबह, जब कबीर स्कूल जाने के लिए तैयार हो रहा था और दादू बालकनी में थे, विकास ने कबीर को अपने पास बुलाया।
“कबीर,” विकास ने गले में अटके हुए एक भारीपन के साथ पूछा, “तुम्हें कैसे पता चला कि दादू को वहां मज़ा आएगा? और तुमने उन्हें वो टैबलेट चलाना कब सिखाया? तुम्हें कैसे पता था कि उन्हें ठंड लगेगी?”
कबीर ने अपने जूते के फीते बांधते हुए बहुत ही मासूमियत लेकिन एक गहरी समझ के साथ कहा, “पापा, आपको याद है जब हम पिछले साल ट्रिप पर गए थे? मम्मा ने मेरा कितना सारा सामान पैक किया था। मेरी दवाइयां, मेरे खिलौने, मेरे गर्म कपड़े, मेरा मनपसंद खाना। मम्मा कहती हैं कि बच्चों को बाहर ले जाने से पहले बहुत तैयारी करनी पड़ती है ताकि उन्हें कोई तकलीफ न हो।”
कबीर रुका और उसने अपने पापा की आंखों में देखते हुए कहा, “पापा, दादू भी तो अब थोड़े-थोड़े बच्चे जैसे हो गए हैं ना? अगर हम कहीं बाहर जाते हैं तो हम उन्हें घर क्यों छोड़ दें? बस उन्हें हमारी थोड़ी सी मदद और तैयारी की ज़रूरत होती है, बिल्कुल वैसे ही जैसे मुझे आपकी ज़रूरत होती है। दादू को भी नई चीज़ें देखना पसंद है, उन्हें भी हमारे साथ हंसना और मज़ा करना अच्छा लगता है। वो सिर्फ इसलिए मना कर देते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि हम परेशान हो जाएंगे। अगर मम्मा मेरे लिए तैयारी कर सकती हैं, तो क्या हम दादू के लिए थोड़ी सी तैयारी नहीं कर सकते?”
एक बारह साल के बच्चे के मुंह से इतनी बड़ी और गहरी बात सुनकर विकास अवाक रह गया। उसके पास कहने के लिए कोई शब्द नहीं थे। उसकी आंखों से आंसू छलक पड़े। उसे एहसास हुआ कि जिसे वह अपने पिता का ‘शांति पसंद’ स्वभाव समझ रहा था, वह दरअसल उनकी उम्र का वह अकेलापन था जिसे विकास और शालिनी ने अपनी व्यस्तता के कारण उनके जीवन में भर दिया था। उसने कबीर को कसकर गले लगा लिया। आज एक बेटे को उसके छोटे से बेटे ने ज़िंदगी का सबसे बड़ा और खूबसूरत सबक सिखा दिया था।
दोस्तों, क्या आपको इस कहानी में अपना अक्स नज़र आया? अपने घर के बुजुर्गों को समझने की कोशिश करें, उनके मन में भी कई दबी हुई इच्छाएं होती हैं। आप अपने मन की बात कमेंट सेक्शन में लिखकर ज़रूर बताएं।
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#उम्र की दहलीज और बचपन का हाथ
लेखिका :वैशाली मिश्रा