एक झूठा कलंक

 “साहब, यह सब सरासर झूठ है। मेरी बहन तो यहाँ रहती भी नहीं है। मेरे पिता हार्ट पेशेंट हैं, वे किसी पर हाथ कैसे उठा सकते हैं? मैंने आज तक अपनी पत्नी से एक रुपये की मांग नहीं की।” अविनाश ने पुलिस वाले के सामने हाथ जोड़ते हुए कहा। लेकिन वहाँ सुनने वाला कोई नहीं था। “यह सब अदालत में बताना,” पुलिस वाले ने रूखेपन से जवाब दिया।

अगले कुछ महीने अविनाश और उसके परिवार के लिए किसी भयानक बुरे सपने से कम नहीं थे। पुलिस घर पर आती, मोहल्ले वाले छतों से झांकते, और बरसों की कमाई हुई इज्जत सरेआम नीलाम होती। रमाकांत जी, जिन्होंने पूरी जिंदगी ईमानदारी की रोटी खाई थी, उन्हें बुढ़ापे में जमानत के लिए कोर्ट के चक्कर काटने पड़ रहे थे।

सुमित्रा देवी दिन-रात रोती रहतीं। अविनाश अंदर ही अंदर टूट चुका था। वह रात-रात भर जागता और सोचता कि आखिर उसकी गलती क्या थी? क्या अपने बूढ़े माँ-बाप को न छोड़ना इतना बड़ा जुर्म है कि उसे और उसके पूरे परिवार को अपराधियों की तरह कठघरे में खड़ा कर दिया गया?

अविनाश हमेशा से ही एक शांत और जिम्मेदार स्वभाव का व्यक्ति था। लखनऊ शहर के एक मध्यमवर्गीय मोहल्ले में उसका छोटा सा लेकिन खुशहाल परिवार था। घर में उसके पिता पंडित रमाकांत जी, जो एक रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी थे, और माँ सुमित्रा देवी थीं, जिनका पूरा जीवन अपने परिवार की देखभाल में बीता था। अविनाश अपने माता-पिता का इकलौता सहारा था। उसकी एक बड़ी बहन थी, जिसकी शादी हो चुकी थी।

अविनाश ने एक निजी कंपनी में अपनी मेहनत के दम पर एक अच्छी नौकरी हासिल की थी और उसका सपना सिर्फ इतना था कि वह अपने माता-पिता के बुढ़ापे को सुखद और शांत बना सके। सब कुछ सामान्य चल रहा था। फिर एक दिन, माता-पिता की इच्छा और समाज के रीति-रिवाजों के अनुसार, अविनाश के लिए रिश्ते आने लगे।

काफी खोजबीन के बाद, शहर के ही एक दूसरे इलाके की रहने वाली विशाखा से उसका रिश्ता तय हुआ। विशाखा पढ़ी-लिखी और आधुनिक विचारों वाली लड़की थी। अविनाश के परिवार ने शादी तय करते समय लड़की वालों के सामने केवल एक ही शर्त रखी थी—”हमें अपनी बहू में एक बेटी चाहिए, हमें किसी भी प्रकार के लेन-देन या दहेज़ की कोई आवश्यकता नहीं है।” शादी बेहद सादगी और सम्मान के साथ संपन्न हुई। विशाखा जब इस घर में आई, तो सुमित्रा देवी ने उसे अपनी बेटी की तरह गले लगाया। शुरुआती कुछ महीने बहुत ही खूबसूरत और सपनों जैसे बीते। अविनाश को लगा कि उसकी जिंदगी मुकम्मल हो गई है। ऑफिस से लौटकर विशाखा के साथ समय बिताना, वीकेंड पर माता-पिता के साथ बैठकर पुरानी यादें ताज़ा करना, सब कुछ एक आदर्श परिवार जैसा था।

लेकिन, जैसे-जैसे समय बीतता गया, विशाखा के व्यवहार में एक अजीब सा बदलाव आने लगा। उसकी परवरिश एक ऐसी जगह हुई थी जहाँ संयुक्त परिवार की कोई खास अहमियत नहीं थी। उसे घर में रमाकांत जी के खांसने से भी परेशानी होने लगी और सुमित्रा देवी के टोके जाने पर वह चिढ़ने लगी। सुमित्रा देवी अक्सर उसे बड़े प्यार से समझाती थीं, लेकिन विशाखा को लगता था कि उसकी आज़ादी छिन रही है। धीरे-धीरे विशाखा ने अविनाश के सामने अपनी एक अलग दुनिया बसाने की मांग रखनी शुरू कर दी। वह अक्सर कहती, “अविनाश, मुझे यह भीड़भाड़ और रोज-रोज की रोकटोक पसंद नहीं है। हम दोनों नौकरी करते हैं, हम आसानी से एक नया फ्लैट लेकर अलग रह सकते हैं। मुझे अपनी एक अलग स्पेस चाहिए।”

अविनाश विशाखा की इस मांग को सुनकर स्तब्ध रह गया। उसने बड़ी नरमी से विशाखा को समझाने की कोशिश की, “विशाखा, मेरे माता-पिता अब बूढ़े हो चुके हैं। पिता जी को दिल की बीमारी है और माँ के घुटनों में दर्द रहता है। इस उम्र में मैं उन्हें अकेला कैसे छोड़ सकता हूँ? और फिर, यह घर इतना बड़ा तो है कि हम सब आराम से रह सकें। तुम जो बदलाव चाहती हो, हम इसी घर में कर लेंगे।” लेकिन विशाखा की ज़िद दिन-ब-दिन बढ़ती गई। जो बातें पहले फुसफुसाहट में होती थीं, वे अब तेज आवाज़ में होने लगीं। घर का सुकून छिनने लगा। विशाखा ने घर के कामों से खुद को पूरी तरह अलग कर लिया। वह जानबूझकर ऐसी स्थितियाँ पैदा करने लगी जिससे घर में कलह हो।

रमाकांत जी और सुमित्रा देवी बहुत समझदार थे। उन्होंने बेटे की गृहस्थी बचाने के लिए खुद ही पीछे हटने का फैसला किया। एक दिन पिता ने भारी मन से अविनाश से कहा, “बेटा, अगर बहू अलग रहना चाहती है, तो तू उसे लेकर चला जा। हम दोनों अपना गुज़ारा कर लेंगे। हमें तुम्हारी खुशी से बढ़कर कुछ नहीं चाहिए।” यह सुनकर अविनाश की आँखों से आँसू छलक पड़े। उसने अपने पिता के पैर पकड़ लिए और कहा, “बाबूजी, आप मुझे किस बात की सज़ा दे रहे हैं? क्या मैंने यही दिन देखने के लिए जन्म लिया था कि बुढ़ापे में आपको दर-बदर कर दूँ? मैं इस घर से कहीं नहीं जाऊंगा।” अविनाश ने विशाखा को अंतिम रूप से स्पष्ट कर दिया कि वह अपने माता-पिता को किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेगा। अगर वह साथ रहना चाहती है, तो उसे इस परिवार का हिस्सा बनकर रहना होगा।

विशाखा का अहंकार इस इनकार को बर्दाश्त नहीं कर सका। उसने इसे अपनी हार मान लिया। एक दिन जब अविनाश ऑफिस गया हुआ था, विशाखा ने अपना सारा कीमती सामान, जेवर और कपड़े पैक किए और अपने मायके चली गई। जाने से पहले वह सुमित्रा देवी को खरी-खोटी सुनाना नहीं भूली। अविनाश जब लौटा, तो सूना कमरा और रोती हुई माँ उसे पूरी कहानी बता चुके थे। उसने विशाखा को कई बार फोन किया, लेकिन उसने फोन नहीं उठाया। दो दिन बाद, विशाखा के भाई और पिता अविनाश के घर आए। उन्होंने आते ही गाली-गलौज शुरू कर दी।

“तू खुद को क्या समझता है? मेरी बेटी को नौकरानी बनाकर रखा है? या तो तू आज ही अपने माँ-बाप से अलग होकर नया फ्लैट ले, वरना हम तुझे ऐसा सबक सिखाएंगे कि पुश्तें याद रखेंगी।” विशाखा के पिता ने धमकी दी। अविनाश ने भी अब दृढ़ता से जवाब दिया, “देखिए, मैंने आपकी बेटी को पूरा सम्मान दिया, लेकिन मैं अपने माँ-बाप को बेसहारा नहीं छोड़ सकता। अगर आप लोग बात से मसला हल करना चाहते हैं तो मैं तैयार हूँ, लेकिन धमकियों से मैं डरने वाला नहीं हूँ।”

वे लोग पैर पटकते हुए वहाँ से चले गए। अविनाश को लगा कि शायद गुस्सा शांत होने पर बात बन जाएगी, लेकिन उसे यह नहीं पता था कि उसके खिलाफ कितनी गहरी साजिश रची जा रही है। एक हफ्ते बाद, जब अविनाश अपने ऑफिस की एक जरूरी मीटिंग में था, तब उसके फोन पर एक अनजान नंबर से कॉल आया। “हैलो, मैं महिला पुलिस थाने से इंस्पेक्टर बात कर रहा हूँ। तुम्हारे और तुम्हारे परिवार के खिलाफ तुम्हारी पत्नी ने दहेज़ उत्पीड़न, मारपीट और जान से मारने की धमकी की एफआईआर दर्ज कराई है। तुरंत थाने आ जाओ, वरना पुलिस घर से घसीट कर लाएगी।”

यह सुनते ही अविनाश के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह बदहवास हालत में थाने पहुँचा। वहाँ जो एफआईआर की कॉपी उसे दिखाई गई, उसे पढ़कर उसकी रूह कांप गई। विशाखा ने लिखवाया था कि शादी के तुरंत बाद से ही अविनाश और उसके परिवार ने पाँच लाख रुपये नकद और एक कार की मांग शुरू कर दी थी। मांग पूरी न होने पर उसे भूखा रखा जाता था, सिगरेट से दागा जाता था और बेल्ट से पीटा जाता था। सबसे दर्दनाक बात यह थी कि उस रिपोर्ट में अविनाश की उस बड़ी बहन का भी नाम था, जो शादी के बाद से कभी अपने मायके में आकर रही ही नहीं थी।

“साहब, यह सब सरासर झूठ है। मेरी बहन तो यहाँ रहती भी नहीं है। मेरे पिता हार्ट पेशेंट हैं, वे किसी पर हाथ कैसे उठा सकते हैं? मैंने आज तक अपनी पत्नी से एक रुपये की मांग नहीं की।” अविनाश ने पुलिस वाले के सामने हाथ जोड़ते हुए कहा। लेकिन वहाँ सुनने वाला कोई नहीं था। “यह सब अदालत में बताना,” पुलिस वाले ने रूखेपन से जवाब दिया।

अगले कुछ महीने अविनाश और उसके परिवार के लिए किसी भयानक बुरे सपने से कम नहीं थे। पुलिस घर पर आती, मोहल्ले वाले छतों से झांकते, और बरसों की कमाई हुई इज्जत सरेआम नीलाम होती। रमाकांत जी, जिन्होंने पूरी जिंदगी ईमानदारी की रोटी खाई थी, उन्हें बुढ़ापे में जमानत के लिए कोर्ट के चक्कर काटने पड़ रहे थे। सुमित्रा देवी दिन-रात रोती रहतीं। अविनाश अंदर ही अंदर टूट चुका था। वह रात-रात भर जागता और सोचता कि आखिर उसकी गलती क्या थी? क्या अपने बूढ़े माँ-बाप को न छोड़ना इतना बड़ा जुर्म है कि उसे और उसके पूरे परिवार को अपराधियों की तरह कठघरे में खड़ा कर दिया गया?

समाज का नज़रिया भी बदल गया था। जो लोग पहले अविनाश की मिसालें देते थे, अब वे पीठ पीछे उसे ‘दहेज़ का लालची’ कहने लगे थे। विशाखा और उसका परिवार इस बात से खुश थे कि उन्होंने अविनाश को घुटनों पर ला दिया है। वे बीच-बीच में वकीलों के माध्यम से संदेश भिजवाते कि अगर अविनाश एक मोटी रकम ‘सेटलमेंट’ के तौर पर दे दे, तो वे केस वापस ले लेंगे। लेकिन अविनाश ने भी अब तय कर लिया था। उसने अपने वकील से कहा, “मैं एक रुपया भी नहीं दूंगा। अगर मैंने कोई गुनाह किया होता, तो मैं सज़ा भुगतता। लेकिन मैं इन झूठे आरोपों के आगे नहीं झुकूंगा। यह लड़ाई अब सिर्फ मेरे स्वाभिमान की नहीं, बल्कि सच्चाई की है।”

कोर्ट में गवाहियां शुरू हुईं। विशाखा की तरफ से पेश किए गए गवाहों के बयानों में विरोधाभास साफ नज़र आने लगा। कोई भी मेडिकल रिपोर्ट ऐसी नहीं थी जो उसके साथ हुई किसी भी तरह की शारीरिक हिंसा को साबित कर सके। अविनाश के वकील ने जब विशाखा से जिरह की और पूछा कि अगर वह इतनी प्रताड़ित थी, तो उसने कभी किसी पड़ोसी या अपने ऑफिस में किसी को क्यों नहीं बताया? वह निरुत्तर हो गई। यह स्पष्ट होने लगा था कि केस सिर्फ और सिर्फ अलग रहने की ज़िद पूरी न होने के कारण बदला लेने की नीयत से दर्ज कराया गया था।

समय बीतता गया। इस दौरान रमाकांत जी का स्वास्थ्य काफी गिर गया था। अविनाश ने अपनी नौकरी के साथ-साथ कोर्ट-कचहरी और परिवार की ज़िम्मेदारी को जैसे-तैसे संभाला। यह संघर्ष लंबा था, जिसने अविनाश की युवावस्था के सबसे बेहतरीन साल छीन लिए थे। लेकिन उसने हार नहीं मानी।

अंततः वह दिन आया जब अदालत को अपना फैसला सुनाना था। जज ने सारे सबूतों और गवाहों को ध्यान में रखते हुए साफ शब्दों में कहा, “यह न्यायालय महसूस करता है कि महिला सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनों का इस मामले में घोर दुरुपयोग किया गया है। वादी पक्ष अपने आरोपों को सिद्ध करने में पूरी तरह विफल रहा है। यह मामला सिर्फ पारिवारिक मतभेद और संयुक्त परिवार से अलग होने की अनुचित मांग से प्रेरित है।” अदालत ने अविनाश और उसके पूरे परिवार को बाइज्जत बरी कर दिया और विशाखा पर झूठा मुकदमा दायर करने के लिए कड़ी टिप्पणी की।

अविनाश जब कोर्ट के बाहर निकला, तो उसकी आँखों में जीत की कोई चमक नहीं थी, बल्कि एक गहरा खालीपन था। उसने अपनी माँ के आँसू पोंछे और पिता को सहारा देकर गाड़ी में बिठाया। वह जानता था कि जो साल उसने खो दिए, जो सामाजिक अपमान उसके परिवार ने सहा, और जो मानसिक यातना उन्हें झेलनी पड़ी, उसकी भरपाई कोई अदालत नहीं कर सकती।

वह आज भी एक आम इंसान की तरह अपनी ज़िंदगी जी रहा है, अपने माता-पिता के साथ, उसी घर में। लेकिन उसके भीतर का वह शख्स, जिसने कभी रिश्तों पर आँख मूंदकर भरोसा किया था, हमेशा के लिए बदल चुका है। उसने समाज को दिखा दिया कि भले ही कानून की आड़ लेकर सच्चाई को कुछ देर के लिए परेशान किया जा सकता है, लेकिन उसे कभी हराया नहीं जा सकता। वह आज भी फख्र से कहता है, “मैंने दहेज़ नहीं माँगा था, मैंने सिर्फ अपने माँ-बाप का प्यार चाहा था।”

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# एक झूठा कलंक”

 लेखक : विजय सीकर

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