सादगी का स्वाद 

 “अब क्या होगा? वो लोग आ गए,” सुनीता के हाथ-पैर ठंडे पड़ रहे थे। “राजीव, मेरी तो कुछ समझ नहीं आ रहा। मैं क्या मुंह दिखाऊंगी उन्हें?” “हिम्मत रखो सुनीता, जो होगा देखा जाएगा। अब दरवाज़ा तो खोलना ही पड़ेगा,” राजीव जी ने खुद को संभालते हुए दरवाज़ा खोला। सामने आनंद जी और रमा जी … Read more

स्मृतियों का आंगन

सुमन ने जब से होश संभाला था, अपने छोटे भाइयों, आलोक और सुमित के लिए वह बहन कम और माँ ज्यादा थी। माता-पिता के असमय निधन के बाद, सुमन ने अपनी पढ़ाई और अपनी खुशियों को ताक पर रखकर दोनों भाइयों को पाला। जब सुमन की शादी राजीव से हुई, तो उसे लगा कि भाइयों … Read more

ढलती धूप की नई सुबह

“इस घर में पत्ता भी हिलेगा तो मेरी आज्ञा से! जो मैंने कह दिया, वो पत्थर की लकीर है। अगर किसी को मेरे उसूलों पर चलना मंज़ूर नहीं, तो मेरी राह अलग और तुम्हारी अलग, मैं आज ही यह चौखट छोड़कर चला जाऊँगा।” कभी इन भारी-भरकम शब्दों की गूँज से इस हवेलीनुमा घर की दीवारें … Read more

बँटवारे की लकीर

“हेलो… दीदी! कैसी हैं आप?” फोन के दूसरी तरफ से आती उस जानी-पहचानी आवाज़ को सुनकर सविता के हाथ से सब्जी काटने वाला चाकू छूटते-छूटते बचा। यह आवाज़ उसके छोटे भाई अमित की थी। पूरे पाँच साल बाद आज अमित ने उसे फोन किया था। सविता की आँखें छलक आईं और गला रुँध गया। वह … Read more

बेइंतहा दर्द – मंजू ओमर

सुमित्रा के अंतिम संस्कार की तैयारी चल रही थी। घर में सभी इधर-उधर तैयारी में लगे हुए थे । लेकिन बेटे मनीष की आंखों में आंसू रोकने का नाम नहीं ले रहे थे । बेटा भी बेइंतहा दर्द से तड़प रहा था । और मन ही मन सोचा  रहा था काश मां की बात मान … Read more

ममता का स्पर्श

“पगली, किसने कह दिया कि तेरा मायका लुट गया? क्या मायका सिर्फ मां-बाप के जीवित रहने तक ही होता है? सुन बिटिया, मां-बाप शरीर से चले जाते हैं, पर उनका आशीष और उनकी आत्मा इसी चौखट, इसी आंगन और इसी मिट्टी में रची-बसी रहती है। तूने सोचा कि भाभी ने कमरा बदल दिया तो अपनापन … Read more

जड़ों की पुकार

“अरे मेरी सबसे सुंदर दादी जान! हमें बहुत तेज भूख लगी है, प्लीज अपने हाथों से हमें वो खीर और चूरमा खिला दो ना… हम बहुत भूखे हैं,” अयान ने एक मासूम पोते की तरह लाड़ जताते हुए कहा। कायरा ने देवकी जी के गाल चूमते हुए कहा, “दादी, हमें माफ कर दीजिए। हम अपनी … Read more

नेमप्लेट

  “हँस इसलिए रही हूँ सिद्धार्थ, क्योंकि आज मुझे समझ आया कि तुम जैसे लोग प्रेम की नहीं, केवल अपनी सत्ता की भाषा समझते हो। तुमने समझा था कि तुमने मुझे इस घर के पिंजरे में ऐसा कैद कर दिया है कि मैं अपनी आवाज़ ही भूल गई हूँ। पर तुमने गलत समझा था। तख्ती पर … Read more

उम्मीदों की नई कोपल

सुखिया की बात सुनकर दीनदयाल के पैरों तले से जमीन खिसक गई। “हे मेरे मालिक!” बस यही दो शब्द उसके कांपते होठों से निकले और वह निढाल होकर चौखट पर ही बैठ गया। उसका पूरा शरीर सुन्न पड़ चुका था। एक अनजाना, भयानक डर उसके दिलो-दिमाग पर छा गया। जानकी रोने लगी और सहमी हुई … Read more

विश्वास की छांव

ननद की खरी-खरी बात सुनकर कौशल्या जी का चेहरा फक पड़ गया। उन्होंने बिना कुछ कहे जल्दी से फोन काट दिया। सरोज की बातें तीर की तरह उनके सीने में चुभ रही थीं। वे सोफे पर बैठ गईं और शून्य में ताकने लगीं। क्या सच में वे गलत कर रही थीं? क्या बहू के प्रति … Read more

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