स्मृतियों का आंगन

सुमन ने जब से होश संभाला था, अपने छोटे भाइयों, आलोक और सुमित के लिए वह बहन कम और माँ ज्यादा थी। माता-पिता के असमय निधन के बाद, सुमन ने अपनी पढ़ाई और अपनी खुशियों को ताक पर रखकर दोनों भाइयों को पाला। जब सुमन की शादी राजीव से हुई, तो उसे लगा कि भाइयों का प्यार कभी कम नहीं होगा। लेकिन वक्त के साथ, भाइयों की शादियां हुईं और नई भाभियों (रचना और मीनल) के आने के बाद घर के समीकरण बदल गए। व्यस्तताओं और छोटी-छोटी गलतफहमियों ने ऐसा घेरा डाला कि मायके से सुमन का बुलावा आना लगभग बंद ही हो गया। फोन पर होने वाली बातें भी अब केवल औपचारिकता तक सिमट गई थीं।

बरसों बाद, एक दिन अचानक छोटे भाई सुमित का फोन आया—”दीदी, घर में माता-पिता की बरसी पर शांति पाठ रखा है, आपका आना बहुत जरूरी है। हम टिकट भेज रहे हैं।” यह सुनकर सुमन की आंखें छलक पड़ीं। उसने अपनी सारी पुरानी शिकायतें भुला दीं। मायके जाने की खुशी में वह सब कुछ भूलकर अपने उस पुराने आंगन में पहुंच गई। भाइयों ने खूब आदर-सत्कार किया, भाभियों ने भी सम्मान दिया और बच्चों के साथ घर में फिर से पुरानी रौनक लौट आई।

लेकिन पूजा समाप्त होने के बाद, जो हुआ उसने सुमन के दिल को गहरी ठेस पहुंचाई। आलोक ने कुछ कानूनी कागजात उसके सामने रख दिए। “दीदी, हम सोच रहे हैं कि यह पुराना पुश्तैनी मकान बेच दें। शहर में बिजनेस बढ़ाने के लिए बड़ी पूंजी की जरूरत है। बस यहां एनओसी (NOC) पर आपके हस्ताक्षर चाहिए।”

सुमन ठगी सी रह गई। क्या इतने सालों बाद सिर्फ इस हस्ताक्षर के लिए उसे याद किया गया था? उसे दुख संपत्ति जाने का नहीं था, बल्कि उन दीवारों के बिकने का था जिनमें उसके माता-पिता की महक थी, जहां उसका बचपन बीता था। तभी एक भाभी धीरे से बुदबुदाई, “देखते हैं, प्रॉपर्टी के नाम पर अब दीदी क्या नाटक करती हैं। शायद हिस्सा मांगेंगी।”

यह सुनकर सुमन का दिल रो पड़ा, लेकिन वह चुपचाप उठी और पेन लेकर कागजों पर बिना कुछ पढ़े हस्ताक्षर कर दिए। उसने मुस्कुराते हुए भाइयों से कहा, “मेरे लिए यह मकान सिर्फ ईंट-पत्थर है, मेरा असली मायका तो तुम दोनों हो। अगर इसे बेचकर मेरे भाइयों की तरक्की होती है, तो मुझे कोई ऐतराज नहीं। बचपन में भी तो मैं अपने हिस्से की हर चीज तुम्हें दे देती थी, फिर आज क्यों पीछे हटूंगी? तुम खुश रहो, यही मेरी वसीयत है।”

यह सुनते ही आलोक और सुमित की आंखों के सामने वो दृश्य घूम गए जब सुमन खुद भूखी रहकर उन्हें खिलाती थी। उन्हें अपनी स्वार्थपरता पर भयानक ग्लानि हुई। आलोक ने झटके से वो कागज उठाए और फाड़ दिए। “नहीं दीदी, हम ये घर नहीं बेचेंगे। हम चंद पैसों के लिए अपनी उन यादों और उस बहन के प्यार का सौदा नहीं कर सकते, जिसने हमारे लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया।” भाभियों की आंखें भी शर्म और पश्चाताप से झुक गईं और उन्होंने भी आगे बढ़कर सुमन से माफी मांग ली। उस दिन वो पुराना घर बिकने से बच गया, और सालों से टूटते हुए रिश्ते बहन के निस्वार्थ प्रेम की वजह से हमेशा के लिए फिर से जुड़ गए।

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