फर्ज की दहलीज

 कल्याणी देवी ने मुंह बिचकाया, “रहने दो, ये डॉक्टरों के बनाए ढकोसले हैं ताकि अपनी जेबें भर सकें। जितना काम करोगी, शरीर उतना ही लचीला रहेगा। तुम्हारे बाबूजी ने कोई राजमहल तो दिया नहीं कि तुम यहां आकर महारानी बन जाओगी। अगर इतना ही नाजुक मिजाज है, तो अपने मायके चली जाओ। वहीं जाकर मां की छाती से लगकर लेटी रहो। यहां शाम को तुम्हारे ससुर जी आएंगे, उन्हें गरम फुल्के और दाल चाहिए। मेरा यह बूढ़ा शरीर अब दिन-भर चौके में खपने के लायक नहीं रहा। उठो और चुपचाप आटा लगाओ!”

कमरे की खिड़की से ढलते हुए सूरज की हल्की-पीली किरणें बिस्तर की चादर पर बिखर रही थीं। अनघा ने करवट बदली तो कमर में एक असहनीय टीस उठी। उसने होंठ भींचकर दर्द को दबाने की कोशिश की, मगर उसकी आंख के कोने से दो बूंद आंसू चुपचाप फिसलकर तकिए में जज्ब हो गए। शादी के आठ साल बीत चुके थे। इन आठ सालों में उसने पूजा-पाठ, मन्नतें, डॉक्टरों के चक्कर और जाने कितने ही रीति-रिवाजों की थकावट झेली थी। हर रिश्तेदार की नजर में उसके लिए एक ही सवाल तैरता था—’कोई खुशखबरी है या नहीं?’ वह सवाल नहीं, जैसे किसी नुकीले खंजर की तरह उसके सीने में उतरता था। और जब भी कोई नकारात्मक जवाब मिलता, ताने सीधे उसके गरीब पिता की परवरिश और उसकी किस्मत पर मढ़ दिए जाते।

लेकिन आज, जब आठ साल की लंबी तपस्या के बाद उसकी कोख में एक नन्ही जान ने आकार लेना शुरू किया था, तब भी उसके हिस्से में आराम और सुकून का एक पल नहीं था। डॉक्टर ने सख्त हिदायत दी थी कि गर्भ में कुछ गंभीर पेचीदगियां हैं, इसलिए पहले चार महीने पूरी तरह से केवल बिस्तर पर आराम करना होगा; हल्का सा भी तनाव या भारी काम सब कुछ हमेशा के लिए छीन सकता था।

कमरे का दरवाजा धीरे से खुला और सौरभ हाथ में दवाइयों का थैला और ताजे फलों की टोकरी लिए भीतर दाखिल हुआ। अनघा को तकिए पर चेहरा छुपाए देख वह सब कुछ समझ गया। वह पास आया, दवाइयां मेज पर रखीं और अनघा के सिर पर बेहद नर्मी से हाथ फेरा।

“फिर से रोना शुरू कर दिया अनघा? मैंने तुमसे कितनी बार कहा है कि अब तुम्हें खुद के लिए नहीं, हमारे उस अंश के लिए जीना और मुस्कुराना है, जिसका इंतजार हमने दिन-रात गिन-गिन कर किया है।” सौरभ की आवाज में एक गहरा संबल था।

अनघा की सिसकी फूट पड़ी। वह उठकर बैठने की कोशिश करने लगी, तो सौरभ ने सहारा देकर उसे सहारा दिया और पीठ के पीछे दूसरा तकिया लगा दिया। अनघा ने रुंधे गले से कहा, “सौरभ, मैं कैसे दिल को समझाऊं? मैं सुबह से बिस्तर पर हूं तो ऐसा लगता है जैसे कोई बड़ा अपराध कर रही हूं। जब भी बाहर से बर्तनों के पटकने की आवाज आती है या अम्मा जी की भारी सांसें सुनाई देती हैं, मेरा दम घुटने लगता है। वे बार-बार दरवाजे के पास आकर ऐसी बातें कहती हैं जो सीधे कलेजे को चीर देती हैं। मेरे पिताजी ने भले ही मुझे दहेज में गाड़ियां या सोने की ईंटें न दी हों, पर उन्होंने मुझे इज्जत से जीना सिखाया था। अब मुझसे रोज-रोज अपने मायके की गरीबी का उलाहना नहीं सहा जाता। मैं तो चाहती हूं कि उठकर चौके का सारा काम खुद करूं, पर क्या करूं, मेरे हाथ-पांव कांपने लगते हैं।”

सौरभ ने अपनी जेब से रुमाल निकाला और बड़े प्यार से अनघा के भीगे गालों को पोंछा। उसकी आंखों में एक दृढ़ संकल्प चमक रहा था, जो शायद पहले कभी नहीं दिखा था। उसने अनघा के दोनों हाथों को अपनी हथेलियों में थाम लिया और बोला, “अनघा, आज तक जो हुआ, उस हर एक ताने और हर एक आंसू का कसूरवार मैं खुद को मानता हूं। सालों तक समाज और परिवार की बनाई उस खोखली व्यवस्था के आगे मैं चुप रहा। मुझे लगता था कि बड़ों के आगे जुबान लड़ाना बदतमीजी है, लेकिन मैं भूल गया था कि मर्यादा की रक्षा के नाम पर पत्नी के आत्मसम्मान की बलि चढ़ाना भी तो कायरता है। जब समाज तुम्हें बांझ कहता था, तब अंदर से मैं जानता था कि इलाज मेरा चल रहा था, कमी मुझमें थी। मगर तुमने सारा दोष अपनी झोली में समेट लिया ताकि परिवार में मेरी पगड़ी पर कोई आंच न आए। तुमने मेरे मान के लिए दुनिया के कड़वे घूंट पिए हैं, तो क्या आज जब हमारी वर्षों की तपस्या रंग ला रही है, मैं सिर्फ एक मूकदर्शक बनकर खड़ा रहूंगा?”

सौरभ ने गहरी सांस ली और आगे कहा, “अब चाहे कोई मुझे दुनिया का सबसे बड़ा जोरू का गुलाम कहे या नालायक बेटा समझे, मैं सच के साथ खड़ा रहूंगा। एक बेटे का फर्ज मां-बाप की सेवा करना जरूर है, मगर एक पति का धर्म अपनी जीवनसंगिनी के अस्तित्व और उसके आत्मसम्मान की हिफाजत करना भी है। मेरे ननिहाल में भी कभी कोई कुबेर का खजाना नहीं था, फिर अम्मा तुम्हारे मायके को छोटा कैसे समझ सकती हैं? इंसान का बड़प्पन उसकी दौलत से नहीं, उसके विचारों और उसके संस्कारों से तय होता है। तुम बस आंखें बंद करके आराम करो। मैं तुम्हारे लिए गर्म दलिया और सूप बनवाकर लाता हूं।”

सौरभ अनघा को आश्वस्त कर नीचे की तरफ बढ़ा। अनघा ने गहरी सांस ली। मन में थोड़ी राहत तो थी, मगर सांसों में अभी भी डर का कांटा चुभ रहा था।

अभी सौरभ को नीचे गए कुछ ही मिनट हुए थे कि बाहर गलियारे में भारी कदमों की चाप सुनाई दी। कमरे का पर्दा झटके से हटा और अनघा की सास, कल्याणी देवी, तनी हुई भवों के साथ भीतर आ गईं। कल्याणी देवी का मिजाज हमेशा से सख्त और दबंग रहा था। घर में हर बात उनकी मर्जी के मुताबिक होनी चाहिए थी, जरा सी भी ढील उन्हें अपनी हुकूमत पर हमला लगती थी।

“अरे वाह महारानी! दिन के तीन बज रहे हैं और अभी तक पलंग तोड़ रही हो?” कल्याणी देवी की आवाज में तीखा व्यंग्य था। “हमने भी अपनी जवानी में चार-चार बच्चे जने हैं। कभी सिर पर पल्लू गिराए बिना कुएं से पानी खींचते थे, सिलबट्टे पर मसाले पीसते थे और पूरे कुनबे की रोटियां सेंकते थे। आज की बहुओं के तो नखरे ही नहीं खत्म होते। आठ साल बाद भगवान ने दया की, तो ऐसा लगता है जैसे स्वर्ग से अप्सरा उतर आई हो! डॉक्टर ने कह दिया आराम करो, तो बस पैर पसार कर हुकुम चलाना शुरू कर दिया।”

अनघा ने डरते-डरते हाथ जोड़ लिए, “अम्मा जी, डॉक्टर ने कहा है कि अगर मैं जरा सा भी झुकी या ज्यादा देर खड़ी रही, तो भारी ब्लीडिंग हो सकती है। बच्चे की धड़कन अभी बहुत नाजुक है। मुझे भी लेटे-लेटे अच्छा नहीं लगता, पर इस बार अगर कुछ अनहोनी हो गई तो मैं जिंदा नहीं बचूंगी।”

कल्याणी देवी ने मुंह बिचकाया, “रहने दो, ये डॉक्टरों के बनाए ढकोसले हैं ताकि अपनी जेबें भर सकें। जितना काम करोगी, शरीर उतना ही लचीला रहेगा। तुम्हारे बाबूजी ने कोई राजमहल तो दिया नहीं कि तुम यहां आकर महारानी बन जाओगी। अगर इतना ही नाजुक मिजाज है, तो अपने मायके चली जाओ। वहीं जाकर मां की छाती से लगकर लेटी रहो। यहां शाम को तुम्हारे ससुर जी आएंगे, उन्हें गरम फुल्के और दाल चाहिए। मेरा यह बूढ़ा शरीर अब दिन-भर चौके में खपने के लायक नहीं रहा। उठो और चुपचाप आटा लगाओ!”

अनघा का चेहरा पीला पड़ गया। उसकी आंखों से बेबसी के आंसू बहने लगे। वह कांपते हाथों से उठने का प्रयास करने ही वाली थी कि तभी दरवाजे पर सौरभ आकर खड़ा हो गया। उसके हाथ में सूप का कटोरा था। उसने अपनी मां की हर एक बात सुन ली थी।

सौरभ ने शांति से सूप मेज पर रखा और मुड़कर अपनी मां के सामने आ खड़ा हुआ। उसकी आवाज बेहद शांत थी, मगर उसमें गजब का ठहराव और गंभीरता थी।

“अम्मा, आप एक औरत हैं, एक मां हैं। क्या एक मां दूसरी औरत के कोख के दर्द को कभी महसूस नहीं कर सकती?” सौरभ ने सीधे अपनी मां की आंखों में देखा।

कल्याणी देवी सकपका गईं, पर फौरन त्योरियां चढ़ाते हुए बोलीं, “तू मुझे मां होने का मतलब सिखाएगा? पैदा किया है मैंने तुझे! अपनी जोरू के पल्लू में ऐसा बंध गया है कि अपनी मां की मेहनत और उम्र भूल गया?”

सौरभ ने संयम नहीं खोया। उसने हाथ जोड़कर कहा, “अम्मा, आपने मुझे जन्म दिया है, पाला-पोसा है, इसका अहसान मैं अपनी जान देकर भी नहीं चुका सकता। जिंदगी के आखिरी सांस तक आपकी और पिताजी की सेवा करना मेरा पहला फर्ज रहेगा। लेकिन अम्मा, अनघा को अपने घर की चौखट पर ब्याह कर लाने वाला भी मैं ही हूं। यह लड़की अपना भरा-पूरा घर, अपने मां-बाप और अपना बचपन छोड़कर सिर्फ मेरे भरोसे इस घर में आई थी। जब मैंने इसके साथ सात फेरे लिए थे, तो अग्नि को साक्षी मानकर यह वचन दिया था कि हर सुख-दुख और बीमारी में इसकी रक्षा करूंगा।”

सौरभ ने आगे बढ़कर कल्याणी देवी के कंधे पर हाथ रखा, “अम्मा, आप बार-बार इसे मायके भेजने की बात कहती हैं। पर आप भूल रही हैं कि शादी के बाद एक बेटी के लिए मायका पराया हो जाता है और ससुराल ही उसका अपना संसार बनता है। अगर ससुराल में भी उसे हर रोज यही ताना मिले कि ‘यह तेरा घर नहीं है’, तो बताइए वह अभागन जाए तो जाए कहां? और अम्मा, अगर कायदे से देखा जाए, तो मायका तो आपका भी यह घर नहीं है। आप भी तो कभी किसी दूसरे गांव से इस घर की बहू बनकर आई थीं। आज आप इस घर की सबसे बड़ी बुजुर्ग हैं, इसलिए आपका दर्जा सबसे ऊंचा है। क्या आपका यह फर्ज नहीं बनता कि अपने इस बड़प्पन से इस घर को प्यार की छांव दें?”

कल्याणी देवी के चेहरे का रंग बदलने लगा। बेटे के इस शांत और तार्किक प्रहार का उनके पास कोई जवाब नहीं था।

सौरभ ने अपनी बात जारी रखी, “अम्मा, आज से घर के काम के लिए मैं एक सहायिका रख रहा हूं। झाड़ू-पोछा, बर्तन और खाना बनाने में वह आपकी पूरी मदद करेगी। उसके खर्चे की जिम्मेदारी मेरी है। अनघा कहीं नहीं जाएगी, वह यहीं रहेगी और पूरे चार महीने तक जब तक डॉक्टर नहीं कहेंगे, वह सिर्फ आराम करेगी। और अगर आपको लगता है कि अनघा का यहां रहना आपको अखरता है, या मेरे द्वारा उसके हक में खड़ा होना आपको जोरू की गुलामी लगता है, तो अम्मा, बेहद दुखी मन से मुझे यह फैसला लेना पड़ेगा कि मैं अनघा को लेकर पास के ही किसी किराए के मकान में चला जाऊं। मैं आपकी सेवा में हर रोज आऊंगा, पर अपनी पत्नी और आने वाले बच्चे की जान को खतरे में नहीं डालूंगा।”

‘अलग घर’ का नाम सुनते ही कल्याणी देवी के पैरों तले जमीन खिसक गई। उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उनका सीधा, हर बात पर सिर झुका देने वाला बेटा कभी ऐसी बात भी कह सकता है। बुढ़ापे में बेटे-बहू से अलग होकर अकेले रहने का डर, समाज की बातें और अपने किए का आईना अचानक उनकी आंखों के सामने तैर गया। उन्हें याद आया कि जब वह खुद पहली बार गर्भवती हुई थीं, तो उनकी सास ने भी उनके साथ ऐसा ही कठोर व्यवहार किया था, और उस वक्त वह कितनी रोई थीं। आज वही कड़वाहट वह अनघा को लौटा रही थीं।

कल्याणी देवी की आंखों में पश्चाताप के आंसू छलक आए। इस बार वे आंसू किसी गुस्से के नहीं, बल्कि अपनी गलती के बोध के थे। उन्होंने देखा कि अनघा बिस्तर पर लेटी हाथ जोड़े कांप रही थी और सौरभ अपनी जिम्मेदारी के तराजू को दोनों तरफ से संतुलित रखने की हर मुमकिन कोशिश कर रहा था।

कल्याणी देवी ने आगे बढ़कर अनघा के हाथ पर अपना कांपता हुआ हाथ रख दिया। उनकी आवाज में पहली बार ममता की मिठास घुली थी, “मुझे माफ कर दे बहू… मैं भूल गई थी कि जो दर्द मैंने कभी सहा, वही दर्द मैं अपनी ही औलाद को दे रही थी। तू आराम कर, आज से जब तक तू पूरी तरह ठीक नहीं हो जाती, रसोई की फिक्र तुझे नहीं करनी। सौरभ, जा तू काम वाली का बंदोबस्त कर, और हां, अनघा के लिए वो सूप ठंडा हो रहा है, उसे पिला दे।”

अनघा ने अपनी सास के हाथों को चूम लिया और कमरे का वातावरण एक नई उम्मीद, विश्वास और सकारात्मकता की खुशबू से भर गया। जब एक पति अपनी पत्नी के आत्मसम्मान की ढाल बनता है और एक सास अपनी पुरानी बेड़ियों को तोड़कर मां का रूप धर लेती है, तभी कोई मकान सचमुच में ‘घर’ बनता है।

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 मूल लेखिका : ऋतु गुप्ता 

खुर्जा बुलन्दशहर

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