विश्वास की छांव

ननद की खरी-खरी बात सुनकर कौशल्या जी का चेहरा फक पड़ गया। उन्होंने बिना कुछ कहे जल्दी से फोन काट दिया। सरोज की बातें तीर की तरह उनके सीने में चुभ रही थीं। वे सोफे पर बैठ गईं और शून्य में ताकने लगीं। क्या सच में वे गलत कर रही थीं? क्या बहू के प्रति उनका यह व्यवहार अनुचित था? मन में विचारों का बवंडर उठ ही रहा था कि तभी सामने से पायल की रुनझुन आवाज़ सुनाई दी।

सुबह की गुनगुनी धूप आंगन में तुलसी के चौरे पर पड़ रही थी। पंडित विश्वनाथ जी हाथ में चाय का प्याला लिए बरामदे की आरामकुर्सी पर बैठे थे। भीतर कमरे से उनकी धर्मपत्नी कौशल्या जी के बड़बड़ाने की आवाज आ रही थी। विश्वनाथ जी ने चश्मे के ऊपर से देखा तो पाया कि कौशल्या जी अलमारी की चाबियों का गुच्छा हाथ में घुमाते हुए बड़े रहस्यमयी अंदाज में बाहर निकल रही थीं। उनके चेहरे पर वही पुरानी उलझन और चौकन्नापन साफ झलक रहा था जो पिछले एक महीने से घर में पसरा हुआ था।

विश्वनाथ जी ने गहरी सांस ली और चाय की चुस्की लेते हुए बोले, “कौशल्या, रिश्तों की नींव केवल और केवल भरोसे पर टिकती है। कांच से भी ज्यादा नाजुक होता है यह विश्वास। तुम कब तक हर कोने में अपनी नई बहू के लिए जाल बिछाती रहोगी? कभी मेज पर जानबूझकर रुपए छोड़ देना, कभी आभूषणों के डिब्बे खुले रखना… आखिर ये शक की बीमारी तुम्हें कब छोड़ेगी?”

कौशल्या जी ने त्योरियां चढ़ा लीं। हाथ मटकाते हुए बोलीं, “अरे वाह! आप तो ऐसे बोल रहे हैं जैसे दुनिया का सारा तजुर्बा आपको ही है। आज की पीढ़ी की हवा आप नहीं जानते। कल की आई पराई लड़की के हाथ में इस पैंतीस साल की बनाई गृहस्थी की चाबियां यूं ही आंख मूंदकर कैसे सौंप दूं? जांचना, परखना और देखना तो पड़ता ही है। चार दिन बाद मुझे तीर्थ यात्रा पर जाना है, पूरा घर उसके भरोसे छोड़कर जाऊंगी तो तसल्ली तो होनी चाहिए न! आप रहने दीजिए, ये घर-संसार की बातें पुरुषों की समझ से परे होती हैं। आप अपना भजन-कीर्तन कीजिए।”

इतना कहकर कौशल्या जी पैर पटकती हुई बैठक में चली गईं। विश्वनाथ जी बस सिर हिलाकर मुस्कुरा दिए। वे जानते थे कि अपनी पत्नी की पुरानी आदत को तर्कों से बदलना नामुमकिन है।

तभी बैठक में रखे टेलीफोन की घंटी घनघना उठी। कौशल्या जी ने लपककर रिसीवर उठाया। दूसरी तरफ उनकी छोटी ननद सरोज थीं, जो पास के ही शहर में ब्याही थीं।

“प्रणाम भाभी! कैसी हैं आप? सुनाइए, घर में नई-नवेली बहू आ गई है, अब तो आपके खूब ठाठ होंगे? सारा काम बहू संभालती होगी और आप आराम फरमाती होंगी?” सरोज ने हंसते हुए पूछा।

कौशल्या जी ने आवाज़ को धीमा करते हुए कहा, “अरे सरोज, क्या बताऊं! रूप-रंग और काम-काज में तो कोई खोट नहीं है, नियत भी अब तक साफ ही दिख रही है। पर तुम्हें तो पता है, जब तक मैं खुद अपनी आंखों से किसी को तौल न लूं, मुझे चैन कहां पड़ता है! कल ही की बात ले लो, मैंने जानबूझकर सोफे के गद्दे के नीचे दो हजार का नोट दबाकर रख दिया और बहू से कहा कि ज़रा बैठक की झाड़-पोंछ कर दे। बहू ने सफाई करते ही तुरंत आकर नोट मेरे हाथ में रख दिया कि ‘मां जी, ये आपका गिरा हुआ था।’ फिर आज सुबह मैंने अपने सोने के झुमके ड्रेसिंग टेबल पर यूं ही छोड़ दिए थे, उसने बड़े सलीके से लाकर मुझे सौंप दिए। सच कहूं तो अब जाकर कलेजे को थोड़ी ठंडक मिली है कि लड़की लालची नहीं है।”

फोन के उस पार कुछ पलों के लिए गहरा सन्नाटा छा गया। फिर सरोज की गंभीर आवाज़ गूंजी, “भाभी, आप अपने घर में बहू लाई हैं या किसी बैंक की तिजोरी का सुरक्षाकर्मी? ये आप क्या कर रही हैं? इम्तिहान ले-लेकर कभी अपने नहीं बनाए जाते। रिश्ते तो प्रेम और सहज विश्वास से सींचे जाते हैं। अगर कभी उस बच्ची को पता चल गया कि उसकी हर सांस पर शक का पहरा बिठाया गया है, तो उसका कोमल मन टूटकर बिखर जाएगा। विश्वास का धागा इतना कच्चा होता है भाभी कि शक की ज़रा सी खरोंच से भी हमेशा के लिए टूट जाता है। आप उम्र में मुझसे बड़ी हैं, पर इतना ज़रूर कहूंगी कि बहू को दिल से अपनाइए, तराजू पर तौलना बंद कीजिए।”

ननद की खरी-खरी बात सुनकर कौशल्या जी का चेहरा फक पड़ गया। उन्होंने बिना कुछ कहे जल्दी से फोन काट दिया। सरोज की बातें तीर की तरह उनके सीने में चुभ रही थीं। वे सोफे पर बैठ गईं और शून्य में ताकने लगीं। क्या सच में वे गलत कर रही थीं? क्या बहू के प्रति उनका यह व्यवहार अनुचित था? मन में विचारों का बवंडर उठ ही रहा था कि तभी सामने से पायल की रुनझुन आवाज़ सुनाई दी।

बहू मानवी हाथ में एक मखमली लाल डिब्बा लिए सामने आकर खड़ी हो गई। मानवी का चेहरा बड़ा ही सौम्य और शांत था। उसने हल्के से सिर झुकाकर कहा, “मां जी, ये मेरे सारे जेवर हैं। शादी में मायके से जो भी गहने मिले थे, वो सब मैंने इस डिब्बे में रख दिए हैं। आप इन्हें अपनी बड़ी वाली तिजोरी में रख लीजिए।”

कौशल्या जी चौंक पड़ीं। उन्होंने अचरज से मानवी की ओर देखा और फिर उस भारी डिब्बे की ओर। उनका मन फिर से संशय के भंवर में फंसा, “लेकिन बहू, ये तो तुम्हारे अपने स्त्रीधन हैं। तुम्हारे माता-पिता ने बड़े अरमानों से तुम्हें दिए हैं। तुम्हारी अलमारी में भी तो छोटा लॉकर है, तुम वहां क्यों नहीं रखतीं? या फिर अपने मायके में ही अपनी मां के पास रखवा देतीं? तुम्हें मुझसे ज़रा भी डर नहीं लगता कि अगर मैंने ये गहने अपने पास रख लिए या अपनी बेटी को दे दिए, तो तुम क्या करोगी?”

मानवी के चेहरे पर कोई शिकन नहीं आई। उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में केवल अपार श्रद्धा और निश्चल अपनत्व था। वह आगे बढ़ी और कौशल्या जी के घुटनों के पास फर्श पर बैठ गई। उसने कौशल्या जी के दोनों हाथों को बड़ी नजाकत से अपने हाथों में थाम लिया।

मानवी ने बेहद कोमल स्वर में कहा, “मां जी, आप ये कैसी बातें कर रही हैं? जिस दिन मेरी डोली इस चौखट के अंदर आई थी, उसी दिन मेरी मां ने मुझसे कहा था कि आज से तुम्हारा असली घर वही है और कौशल्या जी ही तुम्हारी सगी मां हैं। मैंने आपको सिर्फ मुंह से मां नहीं कहा है, दिल की गहराइयों से आपको अपनी मां माना है। और मां के हाथों में कोई चीज़ असुरक्षित कैसे हो सकती है? अगर मेरी मां मेरी धरोहर नहीं संभालेगी तो कौन संभालेगा? और रही बात डर की… तो भला कोई बेटी अपनी ही मां से कभी डरती है क्या? अगर कल को आप ये गहने मुझे न भी दें, किसी और को दे दें, तब भी मुझे कोई मलाल नहीं होगा, क्योंकि इस घर की हर चीज़ पर पहला अधिकार आपका है।”

मानवी का एक-एक शब्द कौशल्या जी के अंतर्मन को झकझोर रहा था। मानवी की पवित्र आंखों में छल-कपट का कोई नामोनिशान नहीं था; वहां केवल एक मां के लिए असीम आदर और अटूट भरोसा था। कौशल्या जी को लगा जैसे किसी ने उनके मुंह पर ज़ोरदार तमाचा मार दिया हो। एक तरफ यह मासूम लड़की थी, जिसने बिना किसी शर्त, बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी सारी जमा-पूंजी और अपना पूरा अस्तित्व उन्हें सौंप दिया था। और दूसरी तरफ वे खुद थीं, जो हर कदम पर इस भोली बच्ची की वफादारी की परीक्षा ले रही थीं।

शर्म और आत्मग्लानि के मारे कौशल्या जी की पलकें झुक गईं। उनके गले में आंसुओं का एक गोला सा अटक गया। वे अपने भीतर के उस संकीर्ण सोच वाले इंसान को देखकर सिहर उठीं। उन्होंने दोनों हाथों से मानवी को उठाया और उसे सीने से भींच लिया।

कौशल्या जी की आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बह निकली। उनकी रुलाई फूट पड़ी, “मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची… मुझे माफ कर दे! तूने तो पहले ही दिन से मुझे अपनी सगी मां का दर्जा दे दिया था, लेकिन मेरी ही मति मारी गई थी जो मैं तुझे अपनी बेटी नहीं बना पा रही थी। मैं बूढ़ी होकर भी नादान बनी रही और तू इतनी छोटी होकर भी मुझे रिश्तों का सबसे बड़ा पाठ पढ़ा गई। तूने मुझ पर इतना अंधा भरोसा किया, और मैं अभागन हर पल तुझे शक के तराजू में तौलती रही।”

मानवी ने तुरंत अपनी सास के आंसू पोंछे और मुस्कुराते हुए बोली, “अरे मां जी, आप रो क्यों रही हैं? बड़ों का तो हक़ होता है बच्चों को परखना और सही राह दिखाना। आपने जो भी किया, वो इस घर की भलाई के लिए ही तो था। इसमें माफी जैसी कोई बात ही नहीं है।”

बरामदे के दरवाजे की ओट में खड़े विश्वनाथ जी यह पूरा दृश्य देख रहे थे। उनकी आंखों के कोर भी भीगे हुए थे, लेकिन उनके होठों पर एक गहरी और आश्वस्त मुस्कान तैर रही थी। वे आगे आए और खांसते हुए माहौल को हल्का करने के अंदाज में बोले, “अरे भई, अगर सास-बहू का यह भावुक मिलन समारोह समाप्त हो गया हो, तो इस बूढ़े को भी कोई पूछ ले? दोपहर के बारह बज चुके हैं, आज रसोई में कुछ पकेगा या हम दोनों की बातों से ही पेट भरना पड़ेगा?”

कौशल्या जी ने अपने आंसू पोंछते हुए एक तीखी लेकिन लाड़ भरी नज़र अपने पति पर डाली और मुस्कुरा दीं, “सुनिए जी, आज इस घर के चूल्हे को आराम मिलेगा। आज दोपहर का खाना हम बाहर किसी अच्छे रेस्टोरेंट में खाएंगे। और हां, खाना खाने के बाद हम सब सीधे मेरे मायके चलेंगे।”

विश्वनाथ जी ने आश्चर्य से पूछा, “मायके? अचानक मायके जाने की तैयारी कैसे हो गई?”

कौशल्या जी ने मानवी का हाथ अपने हाथों में कसकर थामते हुए गर्व से कहा, “हां, बिल्कुल मायके! मेरी इस लाडली बेटी को भी तो पता चले कि उसका ननिहाल कैसा है। मेरे भाइयों और भाभियों को भी तो अपनी इस प्यारी सी भांजी से मिलना चाहिए। अब तक तो यह सिर्फ बहू थी, लेकिन आज से यह इस घर की बेटी है। और बेटी का ननिहाल पर पूरा हक होता है।”

विश्वनाथ जी ठहाका मारकर हंस पड़े, “वाह भाई वाह! जब सास और बहू एक हो जाएं तो घर स्वर्ग बन जाता है। चलो, फिर मैं भी जल्दी से नए कुर्ते-पायजामे निकाल लेता हूं, आखिर मेरा भी तो ससुराल है!”

कमरे की चारों दीवारें तीनों के खिलखिलाते हुए कहकहों से गूंज उठीं। वो अविश्वास की ठंडी दीवार, जो पिछले कई दिनों से उस घर के माहौल को भारी बनाए हुए थी, धूप में बर्फ की तरह पिघल चुकी थी। अब वहां केवल अपनेपन की मिठास, प्रेम की सुगंध और अटूट विश्वास की पवित्र धूप फैली हुई थी।

रिश्ते कभी भी अनुबंधों या शर्तों पर नहीं चला करते। वे तो दिल की ज़मीन पर पनपने वाले वो पौधे हैं, जिन्हें अगर केवल प्रेम और विश्वास का जल दिया जाए, तो वे ज़िंदगी भर सुख और सुकून की शीतल छाया देते रहते हैं।

दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या आज के इस दौर में किसी नए रिश्ते पर आंख मूंदकर भरोसा करना सही है? क्या मानवी का यह निस्वार्थ समर्पण हर परिवार में सास-बहू के रिश्ते की परिभाषा बदल सकता है? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में लिखकर ज़रूर बताइएगा।

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मूल लेखिका : अनु अग्रवाल

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