भैया ने मेरे सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, “क्योंकि मुझे तुम्हारी पसंद पर और तुम्हारी भाभी की समझदारी पर पूरा भरोसा था। लेकिन मैं इंतजार कर रहा था कि सिद्धार्थ अपने पैरों पर खड़ा हो जाए, ताकि मैं ताऊजी और पिताजी के सामने उसका पक्ष मजबूती से रख सकूं। तुम्हारी भाभी ने जो चाल चली, वो हम दोनों की मिलीभगत थी।”
मैं अवाक रह गई। मेरी आंखों से खुशी के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। एक तरफ मेरी सबसे अच्छी दोस्त मेरी ढाल बनकर खड़ी थी, तो दूसरी तरफ मेरा भाई मेरे प्यार का रक्षक बन गया था। मैंने अपने भैया और भाभी को कसकर गले लगा लिया। परिवार की जिन रूढ़िवादी जंजीरों से मैं डरा करती थी, प्यार और समझदारी ने उन जंजीरों को फूलों की माला में बदल दिया था।
मैं मीरा, एक ऐसे संयुक्त परिवार में पली-बढ़ी जहाँ लड़कियों का जोर से हंसना भी बड़ों की आंखों में खटक जाता था। बारहवीं कक्षा तक तो मैं लड़कियों के स्कूल में पढ़ी थी, लेकिन जब ग्रेजुएशन के लिए मेरा दाखिला एक को-एड (सह-शिक्षा) कॉलेज में करवाया गया, तो घर में जैसे हिदायतों का अंबार लग गया। ताऊजी, चाचाजी, बुआ और पिताजी—सबने मुझे बिठाकर ऐसे समझाया जैसे मैं कॉलेज नहीं, किसी युद्ध के मैदान में जा रही हूँ। “मीरा, ध्यान रखना, वहां लड़के भी पढ़ते हैं। अपनी नजरें नीची रखना। परिवार की इज्जत तुम्हारे हाथ में है, कोई ऊंच-नीच नहीं होनी चाहिए।”
उनका वह ‘ऊंच-नीच’ शब्द मेरे कानों में किसी खतरे की घंटी की तरह गूंजता रहता था। कॉलेज का पहला दिन था और मैं डर के मारे पसीने से तर-बतर हो रही थी। क्लासरूम के बाहर खड़ी मैं अंदर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी कि तभी एक लड़की मेरे पास आई। उसने बड़ी सी मुस्कान के साथ अपना हाथ मेरी तरफ बढ़ाया और बोली, “हेलो! मैं अनन्या हूँ, और तुम?”
“मी… मीरा,” मैंने घबराहट में अपना नाम बताया।
उसकी वह बेबाक और प्यारी सी मुस्कान देखकर मेरे दिल का डर थोड़ा कम हुआ। अनन्या बहुत ही सुलझी हुई और बिंदास लड़की थी। बातों-बातों में उसने मुझे बताया कि वह इसी कॉलेज से जुड़ी हुई है और उसे यहां के चप्पे-चप्पे की जानकारी है। “मीरा, चलो मैं तुम्हें पूरा कैंपस दिखाती हूँ,” उसने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे लाइब्रेरी से लेकर कैंटीन तक सब दिखा दिया।
मुझे यह जानकर हैरानी हुई कि अनन्या को कॉलेज के लगभग हर स्टूडेंट और प्रोफेसर्स के बारे में पता था। उसने मुझे बताया कि उसकी मां की तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो गई थी, जिसके कारण उसे एक साल के लिए अपनी पढ़ाई रोकनी पड़ी थी, इसलिए वह मुझसे एक बैच सीनियर होने के बावजूद मेरी क्लास में थी।
वक्त बीतता गया और अनन्या मेरी सबसे अच्छी दोस्त बन गई। वह मेरे लिए एक ढाल की तरह थी। कॉलेज में कोई लड़का अगर ज्यादा बात करने की कोशिश करता, तो अनन्या उसे दूर से ही घूर कर भगा देती। मेरी रूढ़िवादी सोच वाली जो घबराहट थी, वह अनन्या के साथ रहकर काफी हद तक कम हो गई थी। मैं अब खुलकर जीने लगी थी, लेकिन मैंने कभी अपनी हदों को पार नहीं किया था।
ग्रेजुएशन के दूसरे साल में सब कुछ बहुत सामान्य चल रहा था कि तभी हमारी क्लास में एक नए लड़के ने दाखिला लिया। उसका नाम सिद्धार्थ था। सिद्धार्थ सिर्फ दिखने में ही आकर्षक नहीं था, बल्कि उसकी शख्सियत में एक अजीब सा ठहराव था। वह कॉलेज के हर डिबेट कॉम्पिटिशन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेता था।
मैंने पहली बार उसे कॉलेज के एक एनुअल फेस्ट में गिटार बजाते हुए देखा था। वह मंच पर बैठा था और उसकी उंगलियां तारों पर जादू कर रही थीं। उस दिन न जाने क्या हुआ, मैं खुद को उसे देखने से रोक नहीं पाई। मैं जो फिल्मों की प्रेम कहानियां देखकर अक्सर सोचा करती थी कि अगर मुझे प्यार हो गया तो मेरा परिवार मुझे जिंदा नहीं छोड़ेगा, वही मैं, उस दिन सिद्धार्थ को अपना दिल दे बैठी।
हमारी पहली बातचीत लाइब्रेरी में एक किताब को लेकर हुई थी। फिर धीरे-धीरे ये बातचीत कैंटीन तक पहुंची और फिर फोन कॉल्स तक। सिद्धार्थ भी मुझे पसंद करने लगा था। हम अक्सर कॉलेज के पीछे वाले गार्डन में मिला करते थे। जब यह बात अनन्या को पता चली तो वह बहुत घबरा गई।
“मीरा, तू पागल हो गई है क्या?” अनन्या ने एक दिन मुझे डांटते हुए कहा, “तुझे अपने परिवार के बारे में पता है न? अगर तेरे ताऊजी या पिताजी को भनक भी लग गई कि तू किसी लड़के के चक्कर में है, तो तेरी पढ़ाई उसी दिन छुड़वा देंगे। घर से बाहर निकलना बंद हो जाएगा तेरा।”
मैं अनन्या के गले लगकर रोने लगी। “मैं क्या करूँ अनन्या? मुझे नहीं पता था कि प्यार ऐसे हो जाता है। मैं सिद्धार्थ के बिना अपने भविष्य की कल्पना भी नहीं कर सकती। वह बहुत अच्छा है, वह मेरा सम्मान करता है।”
अनन्या ने मेरे आंसू पोछे और गहरी सांस लेते हुए कहा, “मैं जानती हूँ वह अच्छा है, लेकिन क्या तेरे घरवाले इस बात को समझेंगे? हमें कोई न कोई रास्ता निकालना होगा, लेकिन तब तक तुझे बहुत संभलकर रहना होगा।”
ग्रेजुएशन का तीसरा साल भी खत्म हो गया। कॉलेज के आखिरी दिन सिद्धार्थ और मैंने एक-दूसरे से वादा किया कि चाहे जो हो जाए, हम एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ेंगे। सिद्धार्थ सरकारी नौकरी की तैयारी करने के लिए दिल्ली चला गया और मैं अपने घर की चारदीवारी में वापस कैद हो गई। अब मेरा और सिद्धार्थ का मिलना पूरी तरह से बंद हो गया था। फोन पर भी बात करना बहुत मुश्किल होता था क्योंकि घर में हर वक्त किसी न किसी की नजर मुझ पर रहती थी। अनन्या से मेरी बात होती थी, लेकिन सिर्फ पढ़ाई और सामान्य चीजों के बारे में।
कुछ महीनों बाद, घर में अचानक हलचल तेज हो गई। मेरे बड़े भाई, रोहित की शादी की बातें चलने लगीं। एक दिन मां ने मेरे कमरे में आकर बड़ी खुशी से कहा, “मीरा, हमने रोहित के लिए एक लड़की पसंद कर ली है। बहुत ही संस्कारी और प्यारी बच्ची है। कल हम सगाई के लिए जा रहे हैं। तू जल्दी से अपने लिए कोई अच्छी सी साड़ी निकाल ले। हम सादगी से मंदिर में रोका करेंगे और शादी धूमधाम से करेंगे।”
मैं भी खुश थी कि चलो घर में कोई फंक्शन आ रहा है। अगले दिन हम सब तैयार होकर शहर के एक बड़े मंदिर में पहुंचे। वहां लड़की वाले पहले से मौजूद थे। जैसे ही मैं मंदिर की सीढ़ियां चढ़कर मंडप के पास पहुंची, मेरी नजर दुल्हन की तरह सजी उस लड़की पर पड़ी। मैं वहीं जड़ हो गई। मेरे पैरों तले से जमीन खिसक गई।
वह कोई और नहीं, बल्कि मेरी सबसे अच्छी दोस्त अनन्या थी!
अनन्या ने भी जब मुझे देखा तो उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं। हम दोनों कुछ पल के लिए बुत बने एक-दूसरे को देखते रहे और फिर हमारे चेहरों पर एक बड़ी सी मुस्कान आ गई। किसी को शक न हो, इसलिए हम दोनों ने एक-दूसरे को ऐसे गले लगाया जैसे हम बस होने वाली ननद-भाभी के रूप में मिल रहे हों।
“अरे वाह, तुम मेरी ननद बनने वाली हो!” अनन्या ने मेरे कान में फुसफुसाते हुए कहा। मैं बहुत खुश थी, लेकिन उस खुशी के पीछे एक बहुत बड़ा डर छिप गया था। मेरे दिमाग में सिर्फ एक ही बात घूम रही थी—”अगर अनन्या ने रोहित भैया या किसी और को मेरे और सिद्धार्थ के बारे में बता दिया तो क्या होगा?”
शादी बहुत धूमधाम से हुई और अनन्या मेरे घर की बहू बनकर आ गई। घर में सब उसकी बहुत इज्जत करते थे। वह जितनी अच्छी दोस्त थी, उतनी ही बेहतरीन बहू भी साबित हुई। लेकिन मैं जानबूझकर उससे कटने लगी थी। मुझे डर था कि कहीं बातों-बातों में सिद्धार्थ का जिक्र न आ जाए। मैं उससे नजरें चुराने लगी थी।
एक दोपहर, जब घर के सभी बड़े सो रहे थे, अनन्या मेरे कमरे में आई और उसने अंदर से कुंडी लगा दी।
“मीरा, क्या बात है? तू मुझसे इतनी दूर-दूर क्यों भाग रही है? क्या तुझे मेरा इस घर में आना पसंद नहीं आया?” अनन्या ने मेरे पास बैठकर पूछा।
मैं अपनी नजरें झुकाए बैठी रही। “ऐसी बात नहीं है भाभी… बस मुझे डर लग रहा है।”
“कैसा डर?”
“यही कि… कहीं तुम भैया को सिद्धार्थ के बारे में न बता दो। मुझे बहुत डर लगता है अनन्या, अगर भैया को पता चल गया तो वो मुझे कभी माफ नहीं करेंगे।” मेरी आंखों से आंसू बहने लगे।
अनन्या ने मुझे गले से लगा लिया और मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए बोली, “तू पागल है क्या मीरा? मैं तेरी भाभी बाद में हूँ, पहले तेरी सबसे अच्छी दोस्त हूँ। मैंने कॉलेज में भी तेरा साथ दिया था और अब तो मैं इस घर का हिस्सा हूँ। अगर तुम्हारा प्यार सच्चा है और सिद्धार्थ एक काबिल इंसान बनता है, तो देखना, मैं खुद तुम दोनों को मिलाऊंगी। ये मेरा वादा है तुझसे।”
अनन्या की बातें सुनकर मेरे दिल का सारा बोझ हल्का हो गया। मैंने राहत की एक लंबी सांस ली।
दिन बीतते गए। लगभग एक साल बाद, एक दिन सिद्धार्थ का मेरे पास फोन आया। उसकी आवाज में एक अजीब सी खुशी और उत्तेजना थी। “मीरा! मेरा सिलेक्शन हो गया है। मुझे सिविल सर्विसेज में अच्छी रैंक मिली है। अब मैं तुम्हारे परिवार के सामने सीना तानकर खड़ा हो सकता हूँ!”
मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। मैंने फोन रखते ही दौड़कर अनन्या को सारी बात बताई।
“वाह! अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे। अब सारा काम मुझ पर छोड़ दे,” अनन्या ने एक शरारती मुस्कान के साथ कहा।
अगले ही हफ्ते अनन्या कुछ दिनों के लिए अपने मायके गई। वहां से उसने मेरी मां को फोन किया।
“मां जी, मैंने मीरा के लिए एक बहुत ही बेहतरीन लड़का देखा है। लड़का सिविल सर्विसेज में है, बहुत ही संस्कारी और ऊंचे खानदान का है। अगर आप कहें तो मैं उनके परिवार से बात चलाऊं?” अनन्या ने बहुत ही सूझबूझ से मां के सामने प्रस्ताव रखा।
मां ने खुश होते हुए कहा, “बेटा, अगर लड़का इतना ही अच्छा है तो हमें क्या ऐतराज होगा। बात चलाकर देख, लेकिन मीरा को भी तो पसंद आना चाहिए।”
अनन्या ने हंसते हुए जवाब दिया, “अरे मां जी, आप उसकी फिक्र मत कीजिए। मेरी और मीरा की पसंद बिल्कुल एक जैसी है। उसे लड़का जरूर पसंद आएगा।”
अनन्या ने दोनों परिवारों के बीच बात शुरू कर दी। चूंकि प्रस्ताव घर की बहू की तरफ से आया था और लड़का एक बड़ा अफसर बन चुका था, इसलिए ताऊजी और पिताजी भी तुरंत मान गए। उन्होंने बिना किसी शक के सिद्धार्थ के परिवार को मिलने के लिए घर बुला लिया।
जिस दिन सिद्धार्थ का परिवार हमारे घर आने वाला था, अनन्या ने मेरी पूरी जिम्मेदारी अपने सिर ले ली। मेरे कपड़े, मेरा मेकअप, मेरा हेयर स्टाइल—सब कुछ उसने खुद अपने हाथों से तैयार किया।
“आज मेरी ननद रानी दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की लगनी चाहिए,” अनन्या मुझे आईने के सामने देखते हुए बोली।
थोड़ी देर बाद, मुझे ड्रॉइंग रूम में ले जाया गया। सामने सिद्धार्थ बैठा था। उसकी आंखों में मुझे देखकर जो चमक थी, उसे मैं कभी नहीं भूल सकती। परिवार के बड़ों ने आपस में बात की और रिश्ता उसी दिन पक्का कर दिया गया। सब कुछ इतनी आसानी से हो गया कि मुझे किसी सपने जैसा लग रहा था।
उसी शाम एक छोटा सा रोका समारोह रखा गया। सिद्धार्थ ने मुस्कुराते हुए मेरे हाथ में सगाई की अंगूठी पहना दी और मैंने उसके हाथ में। मेरा प्यार, जिसके लिए मैं रातों को रोया करती थी, आज पूरे परिवार के आशीर्वाद के साथ मुझे मिल गया था।
समारोह के बाद, जब सब मेहमान चले गए, मैं अनन्या के गले लगकर फूट-फूट कर रोने लगी। “थैंक यू सो मच अनन्या! अगर तुम नहीं होती तो मेरी जिंदगी बर्बाद हो जाती। तुम दुनिया की सबसे अच्छी भाभी हो।”
तभी पीछे से मेरे भैया रोहित की आवाज आई, “और तुम्हारा ये भाई, क्या वो अच्छा नहीं है?”
मैं घबराकर पलटी। भैया मुस्कुरा रहे थे। “मुझे बहुत पहले से सब कुछ पता था मीरा। तुम्हारी भाभी ने शादी के कुछ महीनों बाद ही मुझे तुम्हारे और सिद्धार्थ के बारे में बता दिया था।”
“क्या?” मैं हक्की-बक्की रह गई। “फिर आपने मुझे डांटा क्यों नहीं?”
भैया ने मेरे सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, “क्योंकि मुझे तुम्हारी पसंद पर और तुम्हारी भाभी की समझदारी पर पूरा भरोसा था। लेकिन मैं इंतजार कर रहा था कि सिद्धार्थ अपने पैरों पर खड़ा हो जाए, ताकि मैं ताऊजी और पिताजी के सामने उसका पक्ष मजबूती से रख सकूं। तुम्हारी भाभी ने जो चाल चली, वो हम दोनों की मिलीभगत थी।”
मैं अवाक रह गई। मेरी आंखों से खुशी के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। एक तरफ मेरी सबसे अच्छी दोस्त मेरी ढाल बनकर खड़ी थी, तो दूसरी तरफ मेरा भाई मेरे प्यार का रक्षक बन गया था। मैंने अपने भैया और भाभी को कसकर गले लगा लिया। परिवार की जिन रूढ़िवादी जंजीरों से मैं डरा करती थी, प्यार और समझदारी ने उन जंजीरों को फूलों की माला में बदल दिया था।
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मूल लेखिका : सीमा प्रियदर्शिनी सहाय