“हेलो… दीदी! कैसी हैं आप?” फोन के दूसरी तरफ से आती उस जानी-पहचानी आवाज़ को सुनकर सविता के हाथ से सब्जी काटने वाला चाकू छूटते-छूटते बचा। यह आवाज़ उसके छोटे भाई अमित की थी। पूरे पाँच साल बाद आज अमित ने उसे फोन किया था। सविता की आँखें छलक आईं और गला रुँध गया। वह कुछ बोल पाती, उससे पहले ही अमित फिर बोला, “दीदी, रो रही हो क्या? माना कि बहुत दिनों बाद फोन किया है, पर ऐसे स्वागत करोगी अपने भाई का?”
सविता ने अपने आँसू पोंछते हुए कहा, “अरे नहीं पागल, प्याज काट रही थी तो आँखों में पानी आ गया। तू बता, तू कैसा है? राहुल कैसा है? बहुएँ और बच्चे कैसे हैं? तुम लोगों को कभी अपनी इस दीदी की याद नहीं आती क्या?”
अमित ने थोड़ी झिझक के साथ कहा, “दीदी, हम तो रोज याद करते हैं। बस काम-धंधे की उलझनों में वक्त ही नहीं मिलता। अच्छा सुनो, अगले रविवार को बाबूजी की बरसी है। इस बार हम दोनों भाइयों ने सोचा है कि घर पर एक शांति पाठ रखा जाए। आपको और जीजाजी को जरूर आना है। कोई बहाना नहीं चलेगा।”
सविता का रोम-रोम पुलकित हो उठा। मायके से बुलावा आए और एक बेटी न जाए, ऐसा कैसे हो सकता है। माता-पिता के गुजर जाने के बाद तो जैसे मायके के दरवाजे उसके लिए बंद ही हो गए थे। शुरुआत में वह खुद ही हर त्योहार पर मायके पहुँच जाया करती थी, लेकिन जब दोनों भाइयों की शादियाँ हुईं, तो भाभियों—नेहा और प्रिया—को अपनी ननद का घर में बार-बार आना और पुरानी यादों को ताज़ा करना कुछ खास पसंद नहीं आया। उनके रूखे व्यवहार और उपेक्षा ने सविता के कदमों को रोक दिया। धीरे-धीरे भाइयों ने भी फोन करना कम कर दिया। सविता मन ही मन घुटती रहती थी, लेकिन आज इतने सालों बाद भाई के मुंह से अपनापन सुनकर वह सारे गिले-शिकवे भूल गई।
शाम को जब सविता के पति, विकास, ऑफिस से लौटे तो सविता ने चहकते हुए उन्हें यह बात बताई। विकास एक सुलझे हुए इंसान थे। उन्होंने सविता की चमकती आँखों को देखकर कहा, “सविता, मुझे तुम्हारे जाने से कोई ऐतराज नहीं है, लेकिन एक बात याद रखना। इतने सालों तक जिन्हें तुम्हारी याद नहीं आई, उन्होंने अचानक बरसी के बहाने तुम्हें बुलाया है। हो सकता है इसके पीछे कोई स्वार्थ हो। तुम खुद को भावनात्मक रूप से थोड़ा मजबूत रखना, ताकि बाद में तुम्हें ठेस न पहुँचे।”
सविता ने विकास की बात को हँसकर टाल दिया। “आप भी ना, हमेशा हर चीज़ में दिमाग लगाते हैं। मेरे भाई हैं वो। माना थोड़े लापरवाह हैं, पर उनके मन में मेरे लिए कोई खोट नहीं है। खून का रिश्ता है हमारा, कोई व्यापार थोड़े ही है।”
रविवार की सुबह सविता ढेरों उपहार, बच्चों के लिए कपड़े और भाइयों की पसंद की मिठाइयाँ लेकर अपने पुश्तैनी घर पहुँची। घर के उस पुराने लोहे के गेट को देखते ही उसकी आँखों के सामने अपना पूरा बचपन घूम गया। वह नीम का पेड़ जिसे बाबूजी ने लगाया था, वह आँगन जहाँ माँ सर्दियों में धूप सेंका करती थी, सब कुछ वैसा ही था।
घर के अंदर पहुँचते ही भाइयों ने आगे बढ़कर उसके पैर छुए। भाभियों ने भी मुस्कुराकर स्वागत किया। पूरा दिन पूजा-पाठ और मेहमानों की आवाजाही में बीत गया। सविता ने घर के हर कोने को अपनी आँखों में बसा लिया। उसे लग रहा था जैसे आज वह फिर से अपनी माँ के आँचल में लौट आई हो।
रात का समय था। सारे रिश्तेदार जा चुके थे। घर के बीच वाले कमरे में सब लोग बैठे थे। तभी बड़ा भाई राहुल अपने कमरे से एक फाइल लेकर आया और सविता के सामने बैठ गया।
“दीदी,” राहुल ने गला साफ करते हुए कहा, “दरअसल… वो… हमने आपको एक और जरूरी काम से बुलाया था।”
सविता ने प्यार से पूछा, “क्या बात है राहुल? कोई परेशानी है क्या? बेझिझक बता।”
अमित भी पास खिसक कर आ गया और बोला, “दीदी, बात यह है कि इस पुराने घर को संभालने में बहुत खर्च आता है। वैसे भी अब हम दोनों भाइयों का काम शहर में बढ़ गया है। बच्चों को भी अच्छे स्कूल में पढ़ाना है। इसलिए हम सोच रहे हैं कि इस पुश्तैनी घर को बेचकर शहर में दो अच्छे फ्लैट ले लें।”
सविता को लगा जैसे किसी ने उसके सिर पर हथौड़ा मार दिया हो। “घर बेच रहे हो? यह घर जहाँ बाबूजी की साँसें बसी हैं? जहाँ माँ की यादें हैं?”
तभी बड़ी भाभी नेहा बीच में बोल पड़ी, “देखिए दीदी, यादों से तो पेट नहीं भरता ना। आज के जमाने में प्रैक्टिकल होना पड़ता है। घर का सौदा पक्का हो गया है। बस हमें आपकी नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) पर साइन चाहिए। वकील ने कहा है कि बिना आपकी रजामंदी के घर नहीं बिक सकता।”
सविता के कानों में विकास के कहे हुए शब्द गूँजने लगे। तो क्या सच में उसे सिर्फ इन कागजों पर दस्तखत करने के लिए बुलाया गया था? क्या उसके प्यार, उसकी यादों और उसके मायके की कीमत सिर्फ ये चंद पन्ने थे?
सविता चुपचाप बैठी रही। उसके हाथ काँप रहे थे। तभी छोटी भाभी प्रिया ने व्यंग्य कसते हुए कहा, “अरे दीदी, आप इतना सोच क्यों रही हैं? कहीं आपको यह तो नहीं लग रहा कि हम आपको आपका हिस्सा नहीं देंगे? आप चिंता मत कीजिए, घर बिकने के बाद जो भी पैसे आएँगे, उसमें से आपके हिस्से की रकम आपके अकाउंट में ट्रांसफर कर दी जाएगी। आप बस यहाँ साइन कर दीजिए।”
यह सुनना था कि सविता के सब्र का बाँध टूट गया। उसे प्रॉपर्टी या पैसों का कोई लालच नहीं था। उसे इस बात का दुख था कि उसके अपनों ने उसे इतना पराया समझ लिया कि उसके प्यार को पैसों के तराजू में तौलने लगे। वह बिना कुछ कहे वहां से उठी और सीधे उस कमरे में चली गई, जो कभी उसका हुआ करता था।
कमरे में जाकर सविता खूब रोई। उसने फैसला कर लिया था कि वह सुबह होते ही इन कागजों पर साइन करेगी और हमेशा के लिए इस घर, इन रिश्तों से दूर चली जाएगी। लेकिन फिर उसकी नज़र कमरे में रखी एक पुरानी अलमारी पर पड़ी। यह वही अलमारी थी जिसमें उसकी माँ अपना सामान रखती थी। सविता ने अलमारी खोली। वहां एक पुरानी लकड़ी की संदूकची रखी थी। यह संदूकची सविता की थी, जिसे वह शादी के बाद यहीं छोड़ गई थी।
अगली सुबह, नाश्ते की टेबल पर एक अजीब सा सन्नाटा था। राहुल और अमित अपनी बहन से नज़रें नहीं मिला पा रहे थे। भाभियों के चेहरों पर एक अजीब सी खीज थी, उन्हें लग रहा था कि सविता अपना हिस्सा ज्यादा माँगने के लिए कोई नया नाटक करेगी।
सविता अपने हाथ में वह प्रॉपर्टी की फाइल और वह पुरानी संदूकची लेकर बाहर आई। उसने चुपचाप फाइल मेज पर रखी। राहुल ने देखा, सभी कागजों पर सविता के दस्तखत थे। भाभियों के चेहरे पर एक विजयी मुस्कान आ गई।
“दीदी, आपने यह बिल्कुल सही किया। मैं आज ही आपके बैंक की डिटेल्स वकील को दे दूँगा,” राहुल ने कहा।
सविता ने एक गहरी साँस ली और वह लकड़ी की संदूकची मेज पर रख दी। “मुझे कोई हिस्सा नहीं चाहिए राहुल। बाबूजी ने इस घर को ईंट-गारे से नहीं, प्यार और मेहनत से बनाया था। मैं इस घर को बिकता हुआ नहीं देख सकती, लेकिन अगर तुम लोगों की तरक्की इसी में है, तो मुझे मंजूर है। पर जाने से पहले, मैं तुम्हें यह संदूकची देना चाहती हूँ।”
अमित ने झिझकते हुए संदूकची खोली। उसमें कुछ पुराने मिट्टी के गुल्लक के टुकड़े, कुछ सूती हाथ से बुने हुए स्वेटर, और चांदी के दो छोटे-छोटे सिक्के रखे थे, जिन पर राहुल और अमित का नाम गुदा हुआ था।
सविता मुस्कुराई, पर उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे। “तुम्हें याद है राहुल, जब तुम छोटे थे और तुम्हें वह नई साइकिल चाहिए थी? बाबूजी के पास पैसे नहीं थे। तब मैंने अपने तीन साल के पॉकेट मनी का यह गुल्लक फोड़कर तुम्हें पैसे दिए थे। और अमित, तू सर्दियों में अक्सर बीमार पड़ जाता था, तो मैं रात-रात भर जागकर तेरे लिए यह स्वेटर बुनती थी। ये चांदी के सिक्के माँ ने मुझे मेरी शादी पर दिए थे, यह कहकर कि जब भी मुझे पैसों की जरूरत हो, इन्हें बेच दूँ। लेकिन मैंने इन्हें कभी नहीं बेचा। मैंने इन्हें बचा कर रखा कि कल को जब मेरे भाइयों को अपना व्यापार बढ़ाना होगा, तो शायद यह उनके काम आ जाए।”
सविता की बातें सुनकर पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया। भाभियों की नजरें शर्म से झुक गईं।
सविता ने आगे कहा, “प्रिया कह रही थी न कि मुझे मेरा हिस्सा चाहिए? मेरा हिस्सा तो तुम लोगों की खुशी में था। एक बहन अपने मायके से सिर्फ प्यार, सम्मान और वो हक़ चाहती है कि वह कभी भी सीना तानकर अपने बाबुल के घर आ सके। तुमने मुझे साइन करने के लिए बुलाया, मुझे इसका दुख नहीं है। मुझे दुख इस बात का है कि तुमने यह सोच लिया कि तुम्हारी दीदी तुम लोगों के रास्ते की रुकावट बनेगी या पैसों के लिए तुमसे लड़ेगी।”
इतना कहकर सविता ने अपना बैग उठाया और दरवाजे की तरफ मुड़ गई।
तभी राहुल की आँखों से आँसुओं की धारा फूट पड़ी। वह दौड़कर आगे बढ़ा और उसने अपनी दीदी का हाथ पकड़ लिया। “रुक जाइए दीदी! मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई।”
अमित ने भी मेज पर रखे उन दस्तखत किए हुए कागजों को उठाया और सबके सामने फाड़ कर टुकड़े-टुकड़े कर दिया।
“यह क्या कर रहे हो तुम लोग?” नेहा ने हैरानी से पूछा।
राहुल ने अपनी पत्नी की तरफ सख्त लहजे में देखते हुए कहा, “वही कर रहा हूँ, जो मुझे बहुत पहले करना चाहिए था। यह घर सिर्फ ईंट-पत्थर का मकान नहीं है नेहा, यह हमारी दीदी का मंदिर है। जिस बहन ने हमारे बचपन की हर खुशी के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया, आज हम उसी से उसका मायका छीनने जा रहे थे? चंद रुपयों के लिए हम अपनी उन यादों का सौदा कर रहे थे, जो हमारी असली दौलत हैं।”
अमित सविता के पैरों में गिर पड़ा और रोते हुए बोला, “हमें माफ़ कर दो दीदी। शहर की इस अंधी दौड़ में हम भूल गए थे कि रिश्ते पैसों से नहीं, भावनाओं से सींचे जाते हैं। हम यह घर नहीं बेचेंगे। हम शहर में किराए पर रह लेंगे, मेहनत करेंगे, लेकिन इस आँगन को कभी नीलाम नहीं होने देंगे। और आज के बाद, आपको इस घर में आने के लिए किसी निमंत्रण की जरूरत नहीं है। यह घर जितना हमारा है, उतना ही आपका भी है।”
भाभियों को भी अपनी गलती का गहरा अहसास हुआ। नेहा और प्रिया दोनों ने आगे बढ़कर सविता के हाथ जोड़ लिए। “दीदी, हमें क्षमा कर दीजिए। हम अपनी नासमझी में यह भूल गई थीं कि ननद भी उसी माँ की बेटी होती है, जिस माँ ने हमारे पतियों को जन्म दिया है। आज से इस घर में आपका पूरा हक़ है। आप जब चाहें, जैसे चाहें यहाँ आ सकती हैं।”
सविता ने रोते हुए अपने दोनों भाइयों को गले से लगा लिया। सालों से जमे हुए बर्फ के पहाड़ आज पिघल गए थे। उस पुराने घर के आँगन में खड़ा नीम का पेड़ भी जैसे आज ठंडी हवा के झोंके के साथ खुशी से झूम उठा था। विकास की कही बात गलत साबित हो गई थी—आखिरकार, खून के रिश्तों ने अपनी अहमियत साबित कर दी थी। मायके की वो चौखट आज फिर से सविता के लिए सिर्फ एक मकान का हिस्सा नहीं, बल्कि प्यार और सम्मान का वो अटूट बंधन बन गई थी, जिसे अब कोई कागज़ का टुकड़ा या कोई बँटवारा कभी नहीं तोड़ सकता था।
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