दर्द की इंतहा – सुदर्शन सचदेवा

रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे। शहर अब भी जाग रहा था—कहीं ट्रैफिक की आवाज़, कहीं मोबाइल की घंटियाँ, कहीं देर रात तक जलती खिड़कियाँ। मगर उस ऊँची इमारत की सोलहवीं मंज़िल पर बैठी अनाया के कमरे में एक ऐसी ख़ामोशी थी, जो किसी शोर से भी ज़्यादा भारी थी। उसके हाथ में मोबाइल … Read more

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