तीन दिन बाद जब सावित्री देवी को अस्पताल से छुट्टी मिली, तो अनुराग ने खुद अपनी गोद में उठाकर मां को कार की आगे वाली सीट पर बैठाया। उसने अपनी सास को फोन किया, जिन्होंने फिर से किसी पार्टी में चलने की बात छेड़ी थी। अनुराग ने बहुत ही विनम्र लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, “सासू मां, आपका सम्मान मेरे सिर-माथे पर है और हमेशा रहेगा। लेकिन अब से मेरी पहली जिम्मेदारी मेरी अपनी मां है। जिस घर में जन्म देने वाली मां आंसू बहाए, उस घर के दामाद का कहीं और मान-सम्मान पाना सिर्फ एक छलावा है। मैं अपनी मां की सेवा करूंगा, क्योंकि यही मेरा सबसे बड़ा धर्म है।”
सत्तर साल की सावित्री देवी पुरानी चारपाई पर लेटी हुई थीं। जाड़े की ठंडी हवाएं खिड़की की दरारों से भीतर आ रही थीं और उनके घुटनों का दर्द अब असहनीय हो चला था। पिछले तीन दिनों से उन्हें तेज बुखार था, पर मुंह से आह तक निकालने की हिम्मत नहीं हो रही थी। वजह थी उनके बेटे अनुराग का मिजाज। अनुराग शहर की एक बड़ी कंपनी में ऊंचे ओहदे पर था, आलीशान गाड़ी थी, चमक-दमक भरी जिंदगी थी, लेकिन उस चमक में उसकी अपनी मां कहीं खो चुकी थी।
सावित्री देवी ने कांपते हाथों से पास रखी लोहे की छड़ी उठाई और फर्श पर दो बार ठक-ठक किया। उन्हें उम्मीद थी कि शायद बहू या बेटा पानी का एक घूंट ही दे जाए। तभी बाहर बैठक से अनुराग की ऊंची, खिलखिलाती हुई आवाज गूंजी। वह फोन पर अपनी सास से बड़े अदब से बात कर रहा था।
“अरे सासू मां! सादर प्रणाम… आपकी आवाज इतनी भारी क्यों लग रही है? क्या कहा… हल्का सा सिरदर्द है और हरारत महसूस हो रही है? अरे रे! यह तो बहुत गलत बात है। अब मैं जानता हूं आपके लाड़ले बेटे यानी मेरे साले साहब को… वो तो अपने ससुराल के चक्करों से ही फुर्सत नहीं पाते। आप क्यों बेकार की फिक्र करती हैं? आपका यह दामाद किस दिन काम आएगा? मैं बस पंद्रह मिनट में गाड़ी निकाल कर आपके पास पहुंच रहा हूं। शहर के सबसे बड़े स्पेशलिस्ट डॉक्टर से आपका चेकअप करवाऊंगा।”
सावित्री देवी ने जब यह सुना तो उनकी सूखी आंखों में एक उम्मीद जगी। उन्होंने सोचा कि अनुराग जब बाहर जा ही रहा है, तो शायद रास्ते में उन्हें भी किसी दवाखाने में दिखा देगा। उन्होंने अपनी सारी बची-खुची ताकत जुटाई और दीवार का सहारा लेकर लड़खड़ाते कदमों से बैठक के दरवाजे तक पहुंचीं।
अनुराग फोन पर आगे कह रहा था, “क्या? आप मेरी मां के बारे में पूछ रही हैं? अरे छोड़िए भी सासू मां, वो तो अब पुरानी आदत से मजबूर हैं। दिन भर कुछ न कुछ दर्द का बहाना बनाती रहती हैं। वो खुद ही पास वाले सरकारी डिस्पेंसरी में पैदल चली जाएंगी। सच कहूं तो मुझे उस बूढ़ी को अपनी चमचमाती कार में बैठाकर सरकारी अस्पताल ले जाना बहुत अजीब लगता है। सोसायटी में चार लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे? न जाने कब पीछा छूटेगा इन रोज-रोज की बीमारियों से! आप यह सब छोड़िए, मैं तुरंत पहुंच रहा हूं। मुझे तो आपकी प्यारी पूडल डॉगी ‘टॉफी’ को भी तो पेट क्लिनिक ले जाना है। बेचारी सुबह से सुस्त पड़ी है… हां-हां, बस मैं निकला!”
सावित्री देवी के पांव वहीं चौखट पर जम गए। बेटे के एक-एक शब्द ने उनके कलेजे को छलनी कर दिया था। जिस बेटे को उन्होंने अपने पति की मौत के बाद सिलाई-कढ़ाई करके, भूखे पेट रहकर पाला-पोसा था, आज उसी बेटे को अपनी मां को गाड़ी में बैठाने में शर्म महसूस हो रही थी। अपनी ही जन्मदात्री से ‘पीछा छूटने’ की दुआएं वह हंस-हंसकर कर रहा था।
अनुराग कमरे से बाहर निकला। हाथ में कार की चाबी थी और चेहरे पर एक दिखावटी मुस्कान। उसने दरवाजे पर खड़ी कांपती हुई मां को देखा, तो उसकी त्योरियां चढ़ गईं। “मां! तुम यहां क्या कर रही हो? रास्ते में क्यों खड़ी हो? मुझे देर हो रही है। तुम्हारे घुटने में दर्द है तो भीतर जाकर लेटो, ये नाटक यहां मत फैलाओ।”
सावित्री देवी ने धीमे स्वर में कहा, “बेटा… सीने में बहुत जकड़न है, बुखार भी नहीं उतर रहा… अगर रास्ते में कोई क्लिनिक पड़े तो मुझे एक बार…”
अनुराग ने झुंझलाकर हाथ झटक दिया, “ओह हो! मां, तुम्हारे ड्रामे कभी खत्म नहीं होते। अभी मेरे पास बिल्कुल वक्त नहीं है। पैसे मेज पर रखे हैं, दोपहर में पड़ोस वाले रिक्शे वाले को बुलाकर चली जाना। मेरी गाड़ी में धूल मत उड़ाओ।” इतना कहकर अनुराग ने जूते पहने, परफ्यूम छिड़का और बाहर निकल गया। कुछ ही पलों में उसकी सेडान कार तेज रफ्तार से गेट से बाहर निकल गई। कार के पहियों से उड़ी धूल आंगन में फैल गई और उस धूल के बीच सावित्री देवी वहीं फर्श पर बैठ गईं। आंखों से बेबसी के आंसू टपक रहे थे, पर दिल से फिर भी बेटे के लिए कोई बददुआ नहीं निकली। एक मां का दिल शायद पत्थर की चोट सहकर भी केवल दुआएं ही दे सकता है।
अनुराग अपनी ससुराल पहुंचा। वहां उसका स्वागत किसी राजा की तरह हुआ। सासू मां के सिर पर हल्का सा बाम लगा हुआ था। अनुराग ने उनके पांव छुए, उन्हें फल और मेवे दिए और फिर उनके साथ बैठकर चाय की चुस्कियां लीं। इसके बाद उसने सास को निजी अस्पताल के वीआईपी वार्ड में ले जाकर दिखाया, जहां डॉक्टर ने बताया कि सिर्फ मौसम का असर है, कोई गंभीर बात नहीं। फिर उसने बड़े लाड़-प्यार से उनकी पालतू डॉगी टॉफी को कार की पिछली सीट पर रेशमी चादर बिछाकर बैठाया और शहर के सबसे महंगे वेटरनरी हॉस्पिटल ले गया। वहां उसने घंटों लाइन में खड़े होकर उसका चेकअप करवाया, दवाइयां लीं और शाम ढलने तक सास की तीमारदारी में लगा रहा। सासू मां उसकी तारीफों के पुल बांध रही थीं, “दामाद हो तो अनुराग जैसा, अपने सगे बेटे भी इतना ख्याल नहीं रखते।” अनुराग का सीना गर्व से फूल गया था। वह खुद को दुनिया का सबसे सुलझा हुआ और आधुनिक इंसान समझ रहा था।
शाम के करीब सात बज चुके थे। सर्दियों की रात तेजी से घिर आई थी। अनुराग अपनी ससुराल से विदा लेकर घर की ओर रवाना हुआ। रास्ते में एक व्यस्त चौराहे पर अचानक ट्रैफिक जाम लग गया। लोगों की भारी भीड़ जमा थी और सायरन बजाती हुई एक एम्बुलेंस रास्ते में फंसी हुई थी। अनुराग ने अपनी गाड़ी का शीशा नीचे किया और बाहर झांका।
चौराहे पर एक बुजुर्ग ठेले वाला बदहवास हालत में लोगों से हाथ जोड़कर रास्ता मांग रहा था। उसके ठेले पर एक मैली-कुचैली चादर में लिपटी एक वृद्ध महिला पड़ी थी, जो बेसुध थी। पास खड़े लोग तमाशबीन बने हुए थे, कोई वीडियो बना रहा था तो कोई ट्रैफिक पुलिस को कोस रहा था। अनुराग को चिढ़ हुई कि इन गरीबों की वजह से सड़क जाम हो गई है और उसे घर पहुंचने में देर हो रही है। उसने जोर-जोर से हॉर्न बजाना शुरू किया।
तभी ठेले वाले की नजर अनुराग की कार पर पड़ी। वह दौड़ता हुआ अनुराग की खिड़की के पास आया और रोते हुए गिड़गिड़ाया, “साहब… बाबूजी! मेरी मदद कर दीजिए। यह अम्मा जी सड़क के किनारे गिर पड़ी थीं। बहुत तेज बुखार में तप रही हैं, सांस नहीं आ रही है। डिस्पेंसरी वालों ने बड़े अस्पताल ले जाने को कहा है। एम्बुलेंस जाम में फंसी है। अगर कोई इन्हें अपनी गाड़ी में अस्पताल पहुंचा दे तो इनकी जान बच जाएगी। बाबूजी, भगवान आपका भला करेगा, गाड़ी का शीशा खोलिए साहब!”
अनुराग ने नफरत से मुंह फेरते हुए कहा, “हट यहां से! मेरी नई गाड़ी की सीटें खराब कर देगा क्या? पुलिस को फोन कर, मुझे क्यों परेशान कर रहा है?”
ठेले वाले ने रोते हुए कहा, “साहब, ये कोई पराई नहीं लगतीं, इनके हाथ में जो पर्ची है, उस पर इसी इलाके का पता लिखा है। शायद आपके पड़ोस की ही हैं।”
अनुराग के माथे पर सिलवटें पड़ीं। एक अजीब सी बेचैनी उसके दिल में कौंधी। उसने गाड़ी का दरवाजा खोला और भारी मन से ठेले की ओर बढ़ा। जैसे ही उसने ठेले पर पड़ी उस बेसुध काया का चेहरा देखा, उसके पैरों तले से जमीन खिसक गई।
वह कोई और नहीं, उसकी अपनी मां सावित्री देवी थीं।
उनके होंठ नीले पड़ चुके थे, शरीर बर्फ की तरह ठंडा था और हाथ में मुड़ी-तुड़ी वही पर्ची थी जिस पर अनुराग के घर का पता और उसका फोन नंबर लिखा था। वे दोपहर में अकेले ही दवा लेने निकली थीं और रास्ते में चक्कर खाकर गिर पड़ी थीं।
अनुराग की आंखें फटी की फटी रह गईं। “मां!” उसके मुंह से एक भयानक चीख निकली। वह घुटनों के बल सड़क की धूल में गिर पड़ा। जिस मां को उसने अपनी कार की सीट पर बैठाना ‘अजीब’ समझा था, जिस मां से वह पीछा छुड़ाने की बात कर रहा था, वह इस वक्त सड़क पर धूल और धुएं के बीच जिंदगी और मौत से लड़ रही थी।
“मां… आंखें खोलो मां! देखो तुम्हारा अनुराग आया है!” उसने कांपते हाथों से मां का सिर अपनी गोद में उठाया। मां की सांसें बहुत धीमी और उखड़ती हुई चल रही थीं। अनुराग का सारा घमंड, सारा दिखावा, सारी झूठी प्रतिष्ठा उस सड़क पर बिखर कर चकनाचूर हो चुकी थी। उसे याद आया कि कैसे उसने अपनी सास के मामूली सिरदर्द के लिए पूरा दिन कुर्बान कर दिया, एक कुत्ते की छींक पर वह तड़प उठा, लेकिन जिस मां ने उसे नौ महीने अपनी कोख में रखकर जिंदगी दी, उसी की जान की उसने रत्ती भर परवाह नहीं की।
उसने बिना किसी हिचकिचाहट के, अपनी महंगी सफेद कमीज और कार की परवाह किए बिना, मां को अपने दोनों हाथों में उठाया और दौड़कर अपनी कार की पिछली सीट पर लिटाया। उसने गाड़ी को हवा की रफ्तार से दौड़ा दिया। रास्ते भर वह एक हाथ से स्टीयरिंग संभालता और दूसरे हाथ से मां के ठंडे पैर सहलाता। उसकी आंखों से आंसुओं का सैलाब बह रहा था।
“हे भगवान! मुझे सजा दे दे, पर मेरी मां को कुछ मत होने देना… मैंने बहुत बड़ा पाप किया है भगवान, मुझे माफ कर दे!” अनुराग पहली बार अपनी अंतरात्मा के सामने नंगा खड़ा था।
अस्पताल पहुंचते ही डॉक्टरों की टीम सावित्री देवी को आईसीयू में ले गई। डॉक्टर ने जांच के बाद गंभीर चेहरे से कहा, “हालत बहुत नाजुक है। निमोनिया बिगड़ चुका है और डिहाइड्रेशन भी है। अगर आधे घंटे की और देर हो जाती, तो इन्हें बचाना नामुमकिन था। अगले चौबीस घंटे बहुत अहम हैं।”
अनुराग आईसीयू के कांच के बाहर खड़ा अपनी मां को देख रहा था। उनके चेहरे पर ऑक्सीजन मास्क लगा था, नसों में सुइयां चुभी थीं। अनुराग वहीं दीवार से टिककर फर्श पर बैठ गया और बच्चों की तरह फफक-फफक कर रोने लगा। रात भर वह जागता रहा। उसने अपनी पूरी जिंदगी को पलट कर देखा। उसे याद आया कि जब वह बचपन में बीमार पड़ता था, तो मां कैसे पूरी-पूरी रात जागकर उसके माथे पर गीली पट्टियां रखती थीं। जब उसे चोट लगती थी, तो मां का कलेजा कांप जाता था। उसने कभी किसी चीज की कमी अनुराग को महसूस नहीं होने दी थी। और बदले में उसने क्या दिया? तिरस्कार, उपेक्षा और कड़वे बोल।
अगली सुबह, जब सूरज की किरणें आईसीयू की खिड़की से अंदर आईं, तो डॉक्टर बाहर निकले। उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी। “मिस्टर अनुराग, बधाई हो। आपकी मां की हालत अब खतरे से बाहर है। उनकी इच्छाशक्ति बहुत मजबूत है। आप उनसे मिल सकते हैं।”
अनुराग लड़खड़ाते कदमों से आईसीयू के भीतर गया। सावित्री देवी ने धीरे से अपनी कमजोर आंखें खोलीं। सामने अपने बेटे को रोता हुआ, बिखरे बालों और सूजी आंखों के साथ देखा। अनुराग ने बिना कुछ सोचे अपना सिर अपनी मां के सीने पर रख दिया और फफक पड़ा।
“मां… मुझे माफ कर दो मां! मैं बहुत गिर गया था। मैंने तुम्हारे साथ जो किया, उसके लिए मैं नर्क का भागीदार हूं। मैंने तुम्हारा दिल दुखाया, तुम्हें बेसहारा छोड़ दिया… मां, मुझे सजा दो, मुझे मार लो, पर मुझसे मुंह मत मोड़ो मां!” अनुराग के आंसू सावित्री देवी की चादर को भिगो रहे थे।
सावित्री देवी के कांपते हुए कमजोर हाथ उठे और धीरे से अनुराग के सिर पर टिक गए। एक मां के दिल में अपने बच्चे के लिए नफरत कभी ठहर ही नहीं सकती। उनके आंसुओं ने बेटे के सारे गुनाह धो दिए थे। उन्होंने बहुत धीमी आवाज में कहा, “बेटा… रो मत। तू आ गया ना… मुझे कुछ नहीं हुआ। तू खुश रहे, बस यही चाहती हूं।”
मां के इन शब्दों ने अनुराग के भीतर के सारे अहंकार को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया। उसने उसी वक्त अपने मन में एक दृढ़ संकल्प लिया।
तीन दिन बाद जब सावित्री देवी को अस्पताल से छुट्टी मिली, तो अनुराग ने खुद अपनी गोद में उठाकर मां को कार की आगे वाली सीट पर बैठाया। उसने अपनी सास को फोन किया, जिन्होंने फिर से किसी पार्टी में चलने की बात छेड़ी थी। अनुराग ने बहुत ही विनम्र लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, “सासू मां, आपका सम्मान मेरे सिर-माथे पर है और हमेशा रहेगा। लेकिन अब से मेरी पहली जिम्मेदारी मेरी अपनी मां है। जिस घर में जन्म देने वाली मां आंसू बहाए, उस घर के दामाद का कहीं और मान-सम्मान पाना सिर्फ एक छलावा है। मैं अपनी मां की सेवा करूंगा, क्योंकि यही मेरा सबसे बड़ा धर्म है।”
घर पहुंचकर अनुराग ने मां को अपने हाथों से दलिया खिलाया, उनके पैरों में तेल की मालिश की और उनके कमरे को घर का सबसे सुंदर और हवादार कमरा बना दिया। उस दिन के बाद से घर का माहौल पूरी तरह बदल गया था। अनुराग अब सिर्फ एक सफल अधिकारी नहीं, बल्कि एक सच्चा और समर्पित बेटा बन चुका था। आंगन में खिली धूप अब सावित्री देवी के कमरे में भी पूरी गर्माहट के साथ उतरती थी, क्योंकि अब उस घर के दिलों की खिड़कियां खुल चुकी थीं।
आपके विचार हमारे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:
क्या आज के दौर में दिखावे और बाहरी रिश्तों को निभाने की होड़ में हम अपने बुजुर्ग माता-पिता की मूक तकलीफों को नजरअंदाज कर रहे हैं? एक संतान के रूप में माता-पिता और ससुराल के प्रति हमारे कर्तव्यों में सही संतुलन क्या होना चाहिए? अपनी राय और अनुभव कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें, धन्यवाद।
मूल लेखक : अरविंद दीक्षित