रिश्तों की जमा-पूंजी

“भाई साहब, अगले ही दिन मैंने छुट्टी ली और अपनी पत्नी सरिता के मायके पहुंच गया। वो मुझे देखकर बहुत हैरान और नाराज थी। उसने मुझसे बात तक नहीं की। जब वो खाना खाने बैठी, तो मैं चुपचाप उसके पास जाकर बैठ गया। मैंने उसकी प्लेट से एक रोटी उठाई और कहा, ‘क्या जिंदगी भर मुझे अपने साथ खाना खिलाओगी? मैं अकेले खाते-खाते थक गया हूं।’ मेरी ये बात सुनकर वो फूट-फूट कर रोने लगी। उसका सारा गुस्सा पिघल गया। वो उसी दिन बच्चों को लेकर मेरे साथ वापस घर आ गई।”

  मेरे बचपन के मित्र सुमित के पिताजी को दिल का दौरा पड़ा था और उन्हें एक निजी अस्पताल में बायपास सर्जरी के लिए भर्ती कराया गया था। सुमित आर्थिक रूप से बहुत सक्षम नहीं था, इसलिए उसे राज्य सरकार की स्वास्थ्य योजना के तहत सब्सिडी की आवश्यकता थी। इस पूरी प्रक्रिया में केवल एक ही अड़चन थी—सरकारी अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक कार्यालय से एक अंतिम हस्ताक्षर और मुहर। हम सुबह आठ बजे से उस कतार में खड़े थे। पसीने से लथपथ, प्यास से सूखे गले और मन में अनगिनत चिंताओं के साथ हम बस अपने नंबर के आने का इंतजार कर रहे थे।

दोपहर के दो बजने वाले थे। कतार धीरे-धीरे खिसक रही थी। खिड़की के उस पार बैठे अधिकारी, जिनका नाम नेमप्लेट पर ‘प्रमोद श्रीवास्तव’ लिखा था, का चेहरा गुस्से और चिड़चिड़ाहट से भरा हुआ था। वे हर आने वाले व्यक्ति पर झुंझला रहे थे। आखिरकार हमारा नंबर आया। सुमित ने कांपते हाथों से अपनी फाइल आगे बढ़ाई और विनम्रता से कहा, “सर, पिताजी की सर्जरी कल सुबह है, बस आपके हस्ताक्षर चाहिए।” प्रमोद जी ने फाइल को सरसरी निगाह से देखा, घड़ी की तरफ घूरा और फाइल को खिड़की से बाहर खिसकाते हुए रूखे स्वर में बोले, “समय खत्म हो गया है। लंच का टाइम है। अब कल आना।”

सुमित की आंखों में आंसू आ गए। उसने गिड़गिड़ाते हुए कहा, “सर, प्लीज! हम सुबह से खड़े हैं। कल सुबह तो ऑपरेशन है, अगर ये आज जमा नहीं हुआ तो पिताजी का इलाज रुक जाएगा। मेरी जिंदगी भर की कमाई लग जाएगी, सर कृपया कर दीजिए।”

प्रमोद जी का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। वे झल्लाते हुए बोले, “तो मैं क्या करूं? क्या मैं इंसान नहीं हूं? मशीन हूं क्या जो बिना खाए-पिए काम करता रहूं? जाकर सरकार से कहो कि और कर्मचारी रखे। एक तो मैं सुबह से तुम लोगों की खट-खट सुन रहा हूं, ऊपर से एहसान फरामोशी। मुझे लंच करने जाना है, हटो यहां से!” उन्होंने खटाक से खिड़की बंद कर दी।

सुमित हताश होकर वहीं बेंच पर बैठ गया और रोने लगा। मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा, “सुमित, तू हिम्मत मत हार। तू यहीं बैठ, मैं एक आखिरी कोशिश करता हूं।”

प्रमोद जी अपना टिफिन वाला थैला लेकर कार्यालय से बाहर निकले। मैं बिना कुछ कहे, खामोशी से उनके पीछे-पीछे चल दिया। अस्पताल के पीछे एक पुराना बरगद का पेड़ था, जिसके नीचे कुछ सीमेंट की बेंच बनी हुई थीं। वहां कोई भीड़ नहीं थी। प्रमोद जी वहां जाकर एक बेंच पर बैठ गए। उन्होंने अपने थैले से एक स्टील का टिफिन निकाला और बड़े ही उदास मन से उसे खोलने लगे। उनके चेहरे पर जो ऑफिस में गुस्सा था, वह अब एक अजीब सी मायूसी में बदल गया था।

मैं धीरे से गया और उनके ठीक सामने वाली बेंच पर बैठ गया। उन्होंने मुझे देखा, उनकी त्योरियां चढ़ गईं, लेकिन इससे पहले कि वे कुछ कहते, मैंने बहुत ही शांत और मधुर स्वर में कहा, “प्रमोद जी, आपके पास तो बहुत काम रहता है। रोज न जाने कितने परेशान, गरीब और जरूरतमंद लोग आपके पास आते होंगे। आपकी कुर्सी कितनी महत्वपूर्ण है।”

उन्होंने थोड़ा हैरान होकर मुझे देखा और व्यंग्यात्मक लहजे में बोले, “हां, बहुत महत्वपूर्ण है! रोज बड़े-बड़े नेताओं के फोन आते हैं, रसूखदार लोग आते हैं। मेरी इस कुर्सी के आगे अच्छे-अच्छों को हाथ बांधकर खड़ा रहना पड़ता है। लेकिन तुम्हें क्या? तुम मेरा पीछा करते हुए यहां क्यों आए हो? मैंने कहा ना कल आना।”

मैंने उनकी बात को नजरअंदाज करते हुए उनके टिफिन की तरफ देखा। टिफिन में सूखी रोटियां और आलू की साधारण सी सब्जी थी। मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “सुबह से अपने दोस्त के साथ अस्पताल के चक्कर काट रहा हूं, भूख बहुत तेज लगी है। क्या मैं आपकी प्लेट से एक रोटी खा सकता हूं?”

प्रमोद जी स्तब्ध रह गए। शायद उन्हें किसी ने इस तरह से कभी कुछ नहीं कहा था। उन्होंने झिझकते हुए हामी भर दी। मैंने उनके टिफिन से एक रोटी उठाई, थोड़ी सी सब्जी ली और खाने लगा। खाते हुए मैंने कहा, “सब्जी बहुत स्वादिष्ट बनी है। आपकी पत्नी के हाथों में तो जादू है।”

यह सुनते ही प्रमोद जी का चेहरा उतर गया। वे रोटी का निवाला चबाना भूल गए। मैंने अपनी बात जारी रखी, “आप बहुत भाग्यशाली हैं प्रमोद जी। भगवान ने आपको ऐसी कुर्सी पर बैठाया है जहां से आप रोज सैकड़ों लोगों की दुआएं कमा सकते हैं। लेकिन आप अपने पद की, अपनी ताकत की इज्जत नहीं करते।”

वे भड़क उठे, “तुम होते कौन हो मुझे यह बताने वाले कि मैं अपनी कुर्सी की इज्जत करता हूं या नहीं? तुम मेरी रोटी खा रहे हो और मुझे ही ज्ञान दे रहे हो?”

मैंने बहुत ही नरमी से उनके कंधे पर हाथ रखा और कहा, “अगर आप अपनी जिम्मेदारी की इज्जत करते, तो आप इतने रूखे और निराश नहीं होते। जरा खुद को देखिए। आपके पास इतनी ताकत है, फिर भी आप यहां इस पेड़ के नीचे अकेले खाना खा रहे हैं। आपका कोई दोस्त नहीं है जो आपके साथ बैठकर दो पल हंस सके। जो लोग दूर-दराज के गांवों से, अपनी बीमारी और गरीबी से लड़कर आपके पास उम्मीद लेकर आते हैं, आप उनकी मदद करने के बजाय उन्हें दुत्कार देते हैं। आप कहते हैं कि सरकार और लोग रखे… अरे, अगर कल को सरकार ने इस काम के लिए कंप्यूटर लगा दिया या किसी और को बैठा दिया, तो आपकी क्या अहमियत रह जाएगी?”

मैंने आगे कहा, “ईश्वर ने आपको मौका दिया था लोगों के दिलों में जगह बनाने का, उनके आंसू पोंछने का, लेकिन आप अपने अहंकार में उन रिश्तों को बिगाड़ रहे हैं। जो लोग आज आपसे दुत्कार कर जा रहे हैं, वे आपको मन ही मन कोसते हैं। मेरा क्या है? मैं तो अपने दोस्त के लिए आया हूं। मैं कल फिर आ जाऊंगा। लेकिन आपके पास मौका था किसी को जिंदगी भर के लिए अपना अहसानमंद बनाने का, और आपने वो मौका अपनी चिड़चिड़ाहट के कारण खो दिया। पैसे तो आप शायद बहुत कमा रहे होंगे, शोहरत भी होगी, लेकिन अगर आपने लोगों से रिश्ते नहीं कमाए, दुआएं नहीं कमाईं, तो सब मिट्टी है। मुझे तो लगता है कि आप अपने इस बर्ताव के कारण अपने घर में भी अकेले ही होंगे।”

मेरी आखिरी बात ने जैसे उनके दिल के किसी बहुत नाजुक तार को छेड़ दिया। प्रमोद जी की आंखों में अचानक आंसू छलक आए। उनका सारा गुस्सा, सारा अहंकार आंसुओं में बहने लगा। उन्होंने रुंधे हुए गले से कहा, “आप सच कह रहे हैं भाई साहब। मैं अंदर से बिल्कुल खोखला हो चुका हूं। मेरी पत्नी मुझे छोड़कर अपने मायके चली गई है। मेरे दोनों बच्चे मुझसे बात करना पसंद नहीं करते। घर में सिर्फ मेरी बूढ़ी मां है, जो सुबह उठकर ये चार रोटियां बना देती है। मैं रोज रात को एक खाली घर में जाता हूं। मुझे समझ ही नहीं आता कि मेरी जिंदगी में इतनी कड़वाहट कहां से आ गई। मैं सबसे लड़ता हूं, सबसे चिढ़ता हूं।”

मैंने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा, “कड़वाहट बाहर से नहीं, हमारे अंदर से आती है। जब हम खुद को सबसे ऊपर समझने लगते हैं, तो हम अपनों से कट जाते हैं। खुद को लोगों से जोड़िए प्रमोद जी। किसी की बिना स्वार्थ के मदद करके देखिए, जो सुकून मिलेगा, वो दुनिया की किसी दौलत में नहीं है। आज मैं यहां अपने लिए नहीं, अपने दोस्त सुमित के लिए धूप में धक्के खा रहा हूं। मैंने उसके लिए आपके ताने भी सुने। ऐसा इसलिए क्योंकि मैंने उससे रिश्ता कमाया है। निस्वार्थ दोस्ती कमाई है। इसलिए मेरे पास दोस्त हैं, और आपके पास नहीं।”

प्रमोद जी कुछ देर चुपचाप बैठे रहे। फिर उन्होंने अपना टिफिन बंद किया, आंसू पोंछे और खड़े हो गए। उन्होंने मेरी तरफ देखा और बोले, “चलिए मेरे साथ।”

वे मुझे वापस कार्यालय ले गए। उन्होंने अपनी बंद खिड़की खोली। बाहर सुमित अभी भी हताश बैठा था। प्रमोद जी ने सुमित को आवाज दी, “अरे भाई, फाइल लाओ इधर।” सुमित ने दौड़कर फाइल दी। प्रमोद जी ने बिना एक शब्द कहे फाइल पर अपने हस्ताक्षर किए, मुहर लगाई और बहुत ही विनम्रता से फाइल सुमित को सौंपते हुए कहा, “ईश्वर आपके पिताजी को जल्दी स्वस्थ करे। घबराइए मत, सब ठीक हो जाएगा।”

सुमित की आंखों में कृतज्ञता के आंसू थे। उसने प्रमोद जी के हाथ जोड़ लिए। चलते समय प्रमोद जी ने मुझसे मेरा मोबाइल नंबर मांगा। मैंने उन्हें अपना नंबर दे दिया और हम वहां से चले गए। सुमित के पिताजी का ऑपरेशन सफल रहा और जिंदगी अपनी रफ्तार से आगे बढ़ गई।

इस घटना को बीते लगभग चार साल हो चुके थे। मैं उस दिन को लगभग भूल ही चुका था। इस साल दिवाली की शाम थी। मेरे घर में पूजा की तैयारी चल रही थी, तभी मेरे फोन की घंटी बजी। एक अनजान नंबर था। मैंने फोन उठाया, “हैलो?”

उधर से एक बहुत ही खनकती और खुशमिजाज आवाज आई, “नमस्ते भाई साहब! पहचाना मुझे? मैं भोपाल अस्पताल से प्रमोद श्रीवास्तव बोल रहा हूं।”

मेरा दिमाग एकदम से चार साल पीछे चला गया। “अरे प्रमोद जी! कैसे हैं आप? बहुत खुशी हुई आपकी आवाज सुनकर।”

प्रमोद जी ने हंसते हुए कहा, “मैं बहुत अच्छा हूं भाई साहब, और ये सब आपकी वजह से है। आपको याद है, उस दिन आपने मेरी प्लेट से रोटी खाई थी और मुझसे कहा था कि पैसे और रुतबे की जगह रिश्ते कमाओ। उस दिन के बाद मैं बहुत बेचैन रहा। मुझे लगा कि इंसान पैसे तो कमा लेता है, रुतबा भी पा लेता है, लेकिन जब वो खाना खाने बैठता है और उसके साथ निवाला बांटने वाला कोई नहीं होता, तो वो दुनिया का सबसे गरीब इंसान होता है।”

मैंने पूछा, “फिर आपने क्या किया?”

“भाई साहब, अगले ही दिन मैंने छुट्टी ली और अपनी पत्नी सरिता के मायके पहुंच गया। वो मुझे देखकर बहुत हैरान और नाराज थी। उसने मुझसे बात तक नहीं की। जब वो खाना खाने बैठी, तो मैं चुपचाप उसके पास जाकर बैठ गया। मैंने उसकी प्लेट से एक रोटी उठाई और कहा, ‘क्या जिंदगी भर मुझे अपने साथ खाना खिलाओगी? मैं अकेले खाते-खाते थक गया हूं।’ मेरी ये बात सुनकर वो फूट-फूट कर रोने लगी। उसका सारा गुस्सा पिघल गया। वो उसी दिन बच्चों को लेकर मेरे साथ वापस घर आ गई।”

प्रमोद जी बिना रुके बोलते जा रहे थे, उनके शब्दों में असीम खुशी थी, “भाई साहब, अब मैं अस्पताल में किसी पर नहीं झल्लाता। मैं अब पैसे या रुतबा नहीं कमाता, मैं सिर्फ रिश्ते कमाता हूं। जो भी परेशान व्यक्ति मेरी खिड़की पर आता है, मैं कोशिश करता हूं कि उसका काम तुरंत हो जाए। लोगों की जो दुआएं मुझे मिलती हैं, उससे मेरे घर में बरकत और शांति आ गई है।”

उन्होंने आगे कहा, “आज मैंने आपको सिर्फ दिवाली की बधाई देने के लिए फोन नहीं किया है। अगले महीने मेरे बड़े बेटे की शादी है। आपको सपरिवार आना है। आपने ही मेरे परिवार का रिश्ता दोबारा जोड़ा था, अगर आप नहीं आएंगे तो मेरा ये जश्न अधूरा रहेगा।”

मैं उनकी बातें सुनता जा रहा था और मेरी आंखें खुशी से भीग रही थीं। मैंने उन्हें वचन दिया कि मैं शादी में जरूर आऊंगा। फोन रखने के बाद मैंने सोचा कि इंसान अपनी पूरी जिंदगी भौतिक सुख-सुविधाओं और अहंकार के पीछे भागता रहता है, लेकिन असल में इंसान की सबसे बड़ी जरूरत प्यार और अपनेपन के दो शब्द होते हैं। रिश्ते वो जादुई चाबी हैं जो हर मुश्किल ताले को खोल सकते हैं। एक छोटी सी पहल, थोड़ा सा झुक जाना और थोड़ी सी हमदर्दी किसी की भी जिंदगी में चमत्कार कर सकती है। मुझे इस बात का गर्व था कि मैं भले ही दुनिया की नजर में एक साधारण इंसान हूं, लेकिन मेरे पास रिश्तों की वो जमा-पूंजी है, जो किसी भी बैंक बैलेंस से कहीं ज्यादा कीमती है।

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