रोशनी की तलाश

कबीर ने सोहम को ऊपर से नीचे तक देखा। सोहम के पास न तो कोई खिलौना था, न ही कोई महँगे कपड़े। कबीर के मन में एक गहरा सवाल कौंधा। वह खुद को रोक नहीं पाया और संकोच करते हुए पूछ बैठा, “सोहम… तुम्हें दुख नहीं होता कि तुम इस दुनिया को नहीं देख सकते? … Read more

देवी का सच्चा दरबार

 वंदना ने झुककर एक-एक बच्ची के नन्हे-मुन्ने पाँव पीतल की परात में रखे, अपने हाथों से गंगाजल से उनके चरण धोए, उन पर महावर और रोली का लेप लगाया और झुककर उनके पाँव छुए। उन बच्चियों के चेहरों पर जो निश्छल, पवित्र और बेदाग आनंद था, वह किसी भी सांसारिक वैभव से परे था। बच्चियों … Read more

खून का मोल

फ्लैट की बालकनी में टहलते हुए सिद्धांत की नजर बार-बार कमरे के भीतर जाती, जहां प्रिया पलंग पर सिरहाने के सहारे बैठी गहरी-गहरी सांसें ले रही थी। डॉक्टर ने साफ कह दिया था कि नौवां महीना लग चुका है और किसी भी दिन खुशखबरी आ सकती है। सिद्धांत के चेहरे पर खुशी की जगह बेचैनी … Read more

जीवन संध्या की सुनहरी धूप

 “लेकिन बेटा, असली अग्निपरीक्षा तो तब शुरू हुई जब मेरे ससुर जी का अचानक निधन हो गया,” आंटी की आवाज थोड़ी भारी हो गई। “ससुर जी के जाने के बाद मेरी सास बिल्कुल अकेली हो गईं। वे स्वभाव से बेहद अधिकारवादी, तेज-तर्रार और दबंग महिला थीं। सत्यप्रकाश अपने भाइयों में सबसे सीधे और अपनी माँ … Read more

चक्रव्यूह से मुक्ति की भोर

विवाह को अभी मुश्किल से चालीस दिन ही हुए थे कि एक दोपहर वर्तिका ने अपने सारे कीमती जेवर और कपड़े सूटकेस में भरे और मुख्य द्वार की ओर बढ़ चली। कौशल्या जी ने घबराकर पूछा, “अरे बहू, यह क्या? अचानक कहाँ की तैयारी है?” वर्तिका ने मुड़कर देखे बिना रूखेपन से कहा, “बाजार तक … Read more

पुण्य की पूँजी

यशोदा के भीतर एक ऐसा आत्मसम्मान था जो कभी झुकना नहीं जानता था। गाँव में अगर कोई उन पर दया दिखाता या तरस खाकर यूँ ही बिना कुछ लिए पैसे देने की कोशिश करता, तो यशोदा का चेहरा सख्त हो जाता था। वे तुरंत कहतीं, “बेटा, जब तक विधाता ने इन हाथों में जान दी … Read more

मातृत्व की अधूरी प्यास

तीन होनहार बेटों और भरे-पूरे संसार के बीच जब एक माँ ने अचानक अनाथालय से नन्हीं जान को गोद लेने की ज़िद ठानी, तो पूरा परिवार स्तब्ध रह गया; पर उसके पीछे की जो वजह सामने आई, उसने हर किसी की आँखें नम कर दीं। शाम की हल्की ढलती धूप जब विशाल बैठक के बड़े … Read more

नींव का मौन पत्थर

सरिता की आँखों से एक बूँद आँसू छलक कर गाल पर ढुलक गया। आज उसके भीतर बरसों से जमी बर्फ पिघलने लगी थी। उसने अपने काँपते होठों को संभाला और बहुत ही संयमित आवाज़ में कहा, “दिनेश जी, शादी के बाद इस घर को संभालना और अपना पूरा जीवन इस चौखट पर न्योछावर करना मेरी … Read more

आईने का सच

 गरिमा ने अपनी आवाज को थोड़ा ऊँचा करते हुए कहा, “माँ जी, इसमें बेहूदगी कैसी? शादी के तीन साल हो गए मुझे इस घर में रहते हुए। अब मैं इस पुराने ढर्रे और संयुक्त परिवार की रोज-रोज की बंदिशों से तंग आ चुकी हूँ। सुबह से शाम तक बस परिवार की खिदमत करो, सबकी पसंद-नापसंद … Read more

किस्मत का फैसला

 मान्या ने अपना घूंघट पीछे किया। उसकी आँखों में आंसू नहीं, बल्कि एक अजीब सी दृढ़ता थी। उसने विक्रम की आँखों में देखते हुए कहा, “विक्रम जी, मैं जानती हूँ कि आप खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं, और आपका गुस्सा पूरी तरह जायज़ है। स्नेहा ने जो किया, वह गलत था। लेकिन … Read more

error: Content is protected !!