सिद्धार्थ ने अपनी माँ निर्मला देवी की तरफ देखा, जिनकी आंखों में आंसू थे। निर्मला देवी को भी अपनी गलती का अहसास हो रहा था। वो दौड़कर गायत्री के पास गईं और उसे गले लगा लिया। “मुझे माफ़ कर दे बेटी। मैं दुनिया के डर से एक माँ का फर्ज़ भूल गई थी।”
मीरा मुस्कराई और उसने गायत्री के सामने अपना सिर झुका दिया। गायत्री के कांपते हाथों ने मीरा का घूंघट उठाया। उसने अपने आंसुओं के बीच मुस्कुराते हुए मीरा का माथा चूमा और अपने गले से सोने की एक पुरानी चेन उतारकर मीरा को पहना दी।
शहनाई की मंगल ध्वनि से पूरा मोहल्ला गूंज रहा था। मुख्य द्वार पर गेंदे और गुलाब के फूलों की तोरण बांधी गई थी। आज इस घर के छोटे बेटे सिद्धार्थ की शादी होकर उसकी दुल्हन पहली बार घर आ रही थी। लाल जोड़े में सजी, भारी ज़ेवरों से लदी मीरा जैसे ही गाड़ी से उतरी, हवेली की औरतों ने मंगल गीत गाने शुरू कर दिए। सासू माँ निर्मला देवी ने आरती की थाल सजा रखी थी। मीरा ने अपने पैरों से चावल से भरे कलश को हल्के से धकेला और कुमकुम से भरी थाल में अपने कदम रखे। उसके आल्ता लगे लाल कदमों के निशान हवेली के सफेद संगमरमर पर छपते जा रहे थे, मानो घर में साक्षात लक्ष्मी का प्रवेश हो रहा हो।
चारों तरफ हंसी-ठिठोली का माहौल था। बुआ सास सावित्री देवी अपनी बहुओं को निर्देश दे रही थीं, तो सिद्धार्थ के दोस्त उस पर गुलाब की पंखुड़ियां बरसा रहे थे। मीरा के चेहरे पर एक नई ज़िंदगी की शुरुआत की चमक थी, लेकिन उसकी नज़रें हवेली के उस विशाल आंगन में किसी को ढूंढ रही थीं। उसने सिद्धार्थ से अपनी होने वाली जेठानी गायत्री के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था। सिद्धार्थ अक्सर कहता था कि जब उसके पिता का साया सिर से उठ गया था, तब बड़े भैया और गायत्री भाभी ने ही उसे अपने बच्चे की तरह पाला था। गायत्री भाभी घर की धड़कन हुआ करती थीं, जिनकी पायल की छमछम से हवेली का सवेरा होता था। लेकिन आज, जब घर में इतनी बड़ी खुशी का मौका था, वो चेहरा कहीं नज़र नहीं आ रहा था।
रस्मों का दौर चल रहा था। मीरा को आंगन के बीचों-बीच रखे एक बड़े से सोफे पर बैठाया गया। तभी उसकी नज़र ऊपर छज्जे पर गई। वहां एक खंभे की ओट में खड़ी एक परछाईं चुपचाप नीचे का नज़ारा देख रही थी। सफेद सूती साड़ी, बिखरे हुए बाल और चेहरे पर एक अजीब सी शून्यता। मीरा को समझने में देर नहीं लगी कि वही गायत्री जेठानी हैं। पर वो वहां छुपकर क्यों खड़ी थीं?
दरअसल, गायत्री की कहानी उस हवेली की सबसे गहरी और दर्दनाक सच्चाई थी। आज से तीन साल पहले तक गायत्री इस घर की जान थी। उसके पति, यानी सिद्धार्थ के बड़े भाई विक्रम, हवेली का कारोबार संभालते थे और गायत्री घर का कोना-कोना। दोनों की जोड़ी को देखकर लोग नज़र उतारते थे। लेकिन एक मनहूस रात शहर के बाहर वाले उनके कारखाने में भयंकर आग लग गई। विक्रम वहां फंसे मजदूरों को निकालने गए, लेकिन खुद उस आग का शिकार हो गए। विक्रम की चिता की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि समाज और रिश्तेदारों ने गायत्री को अपने तानों की आग में जलाना शुरू कर दिया।
“खा गई अपने सुहाग को,” “इसके कदम ही मनहूस हैं,” “जिस दिन से ब्याह कर आई थी, तभी से लग रहा था कि इसके माथे पर वैधव्य लिखा है”—ये वो शब्द थे जो उस बेचारी को रोज़ सुनने पड़ते थे। जो औरत अपने पति के जाने के गम से ही नहीं उबर पा रही थी, उसे इस समाज ने ‘अभागन’ का तमगा दे दिया। निर्मला देवी, जो खुद एक माँ थीं, समाज के इस दबाव के आगे टूट गईं और उन्होंने भी अपनी बड़ी बहू से दूरी बना ली। गायत्री ने धीरे-धीरे खुद को समेट लिया। उसने रंगीन कपड़े छोड़ दिए, गहने उतार दिए और हवेली के सबसे पिछले हिस्से के एक छोटे से कमरे में खुद को कैद कर लिया। घर में कोई भी शुभ कार्य होता, तो उसे वहां आने की मनाही थी, ताकि उसकी ‘अशुभ’ छाया किसी और पर न पड़े।
मीरा को जब यह सब पता चला था, तो उसका मन विद्रोह कर उठा था। लेकिन आज जब उसने उस देवी जैसी औरत को एक अपराधी की तरह छुपकर रोते देखा, तो उसके भीतर का स्त्रीत्व तिलमिला उठा।
शाम घिर आई थी। हवेली के बड़े से हॉल में महिलाओं का जमावड़ा लगा था। मीरा की मुंह दिखाई की रस्म होने वाली थी। एक-एक करके रिश्तेदार औरतें आ रही थीं, मीरा का घूंघट उठातीं, उसे सोने-चांदी के उपहार देतीं और आशीर्वाद देकर चली जातीं। सावित्री बुआ ने एक भारी सा हार मीरा के गले में पहनाते हुए कहा, “सदा सुहागन रहो बहू। तुम्हारा भाग्य तेज़ है, जो इस घर में राज करोगी।”
तभी मीरा ने अपना घूंघट खुद ही पीछे हटा लिया। हॉल में अचानक सन्नाटा छा गया। नई दुल्हन का यूं सबके सामने घूंघट हटाना उस घर की परंपरा के खिलाफ था।
“क्या हुआ बहू? किसी चीज़ की ज़रूरत है?” निर्मला देवी ने घबराते हुए पूछा।
मीरा अपनी जगह से खड़ी हो गई। उसने बहुत ही शांत लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा, “माँ जी, मेरी मुंह दिखाई की रस्म अभी अधूरी है। इस घर की बड़ी बहू, मेरी जेठानी जी ने अभी तक मुझे आशीर्वाद नहीं दिया है। उनके बिना मैं यह रस्म पूरी नहीं करूंगी।”
यह सुनते ही जैसे हॉल में किसी ने बम फोड़ दिया हो। औरतों में कानाफूसी शुरू हो गई। सावित्री बुआ ने नाक सिकोड़ते हुए कहा, “अरे बहू, तुम अभी नई हो, इस घर के नियम नहीं जानती। वो विधवा है, अभागन है। शुभ काम में उसका आना ठीक नहीं। उसकी तो परछाईं भी तुम्हारे सुहाग के लिए अमंगल हो सकती है।”
मीरा की आंखें क्रोध और करुणा से भर गईं। “बुआ जी, मंगल और अमंगल किसी के कपड़ों के रंग या उसके अकेलेपन से तय नहीं होता। जिस औरत ने इस घर को अपना खून-पसीना दिया, जिसने सिद्धार्थ को अपने बेटे की तरह पाला, उसकी परछाईं अमंगल कैसे हो सकती है? जो स्त्री प्रेम और त्याग की मूरत हो, वो अशुभ कैसे हो सकती है?”
निर्मला देवी ने मीरा का हाथ पकड़ कर उसे बिठाना चाहा, “ज़िद मत कर मीरा। समाज क्या कहेगा? गायत्री खुद भी नहीं आना चाहती।”
“अगर वो नहीं आएंगी, तो मैं खुद उनके पास जाऊंगी,” यह कहकर मीरा अपने भारी लहंगे को संभालते हुए तेज़ी से हॉल से बाहर निकल गई। सिद्धार्थ, जो दूर खड़ा यह सब देख रहा था, अपनी पत्नी के इस कदम से हैरान भी था और भीतर ही भीतर खुश भी।
मीरा हवेली के उस सुनसान गलियारे से होती हुई उस छोटे से कमरे तक पहुंची। अंदर घुप्प अंधेरा था। एक कोने में ज़मीन पर चटाई बिछी थी, जिस पर गायत्री घुटनों में सिर दिए बैठी थी। बाहर का कोलाहल सुनकर वह और भी सिकुड़ गई थी।
मीरा ने कमरे की बत्ती जलाई। अचानक हुई रोशनी से गायत्री ने आंखें मूंद लीं। उसने जब सामने नई नवेली दुल्हन को देखा, तो वह बुरी तरह घबरा गई और पीछे खिसकने लगी।
“तुम… तुम यहाँ क्यों आ गई मीरा? बाहर जाओ! मेरे ऊपर मत पड़ने दो अपनी नज़र। मैं अभागन हूँ, मेरी वजह से तुम्हारे जीवन में भी…” गायत्री के शब्द आंसुओं में डूब गए।
मीरा ने आगे बढ़कर गायत्री के दोनों हाथ पकड़ लिए। वे हाथ खुरदरे और ठंडे हो चुके थे। “भाभी, आप अभागन नहीं हैं। अभागा तो यह समाज है जिसकी सोच इतनी छोटी है। अभागे वो लोग हैं जो एक स्त्री का दर्द नहीं समझ सकते। आपने भैया को खोया है, इसका मतलब यह नहीं कि आपने अपनी ज़िंदगी जीने का हक़ खो दिया है।”
गायत्री तड़प उठी, “नहीं मीरा, मैं इस घर के लिए मनहूस हूँ। मेरे कदम बाहर पड़ेंगे तो अपशकुन होगा। तुम जाओ यहाँ से।”
मीरा ने गायत्री को कसकर गले लगा लिया। गायत्री का बरसों का जमा हुआ दर्द एक बांध की तरह टूट पड़ा। वह मीरा के कंधे पर सिर रखकर फूट-फूट कर रोने लगी। मीरा उसकी पीठ सहलाती रही।
“भाभी, क्या आप जानती हैं कि सिद्धार्थ आज भी जब खाना खाता है, तो उसे आपके हाथ का स्वाद याद आता है? क्या आप जानती हैं कि इस घर की दीवारें आपकी पायल की आवाज़ को तरस गई हैं? आप कोई अभिशाप नहीं हैं। आप इस घर की नींव हैं। और आज, आपकी यह देवरानी अपनी मुंह दिखाई की रस्म तब तक पूरी नहीं करेगी, जब तक आप खुद अपने हाथों से उसका घूंघट नहीं उठाएंगी।”
मीरा ने गायत्री की अलमारी खोली और उसमें से एक सुंदर सी रेशमी साड़ी निकाली, जो शायद विक्रम के समय की थी। “आपको यह पहननी होगी भाभी। मेरे लिए। सिद्धार्थ के लिए। और अपने लिए।”
करीब आधे घंटे बाद, जब हॉल में मेहमानों की बेचैनी बढ़ने लगी थी, तब दरवाज़े पर एक ऐसा दृश्य दिखा जिसने सबकी सांसें थाम लीं। लाल जोड़े में सजी मीरा के साथ गायत्री अंदर आ रही थी। गायत्री ने वो रेशमी साड़ी पहनी थी, बाल सलीके से बंधे थे और चेहरे पर एक संकोच के साथ-साथ एक अजीब सी शांति थी।
सावित्री बुआ चिल्ला उठीं, “यह क्या अनर्थ कर रही है बहू? इस विधवा को मंगल कार्य में खींच लाई?”
इससे पहले कि मीरा कुछ बोलती, सिद्धार्थ आगे आ गया। उसने बुआ की तरफ देखते हुए कहा, “बुआ जी, अनर्थ आज नहीं, बल्कि तीन साल पहले हुआ था, जब हमने अपनी भाभी को उनके दुख में अकेला छोड़ दिया था। जो भाभी मेरे लिए माँ समान हैं, उनका आशीर्वाद मेरे लिए दुनिया का सबसे बड़ा शगुन है।”
सिद्धार्थ ने अपनी माँ निर्मला देवी की तरफ देखा, जिनकी आंखों में आंसू थे। निर्मला देवी को भी अपनी गलती का अहसास हो रहा था। वो दौड़कर गायत्री के पास गईं और उसे गले लगा लिया। “मुझे माफ़ कर दे बेटी। मैं दुनिया के डर से एक माँ का फर्ज़ भूल गई थी।”
मीरा मुस्कराई और उसने गायत्री के सामने अपना सिर झुका दिया। गायत्री के कांपते हाथों ने मीरा का घूंघट उठाया। उसने अपने आंसुओं के बीच मुस्कुराते हुए मीरा का माथा चूमा और अपने गले से सोने की एक पुरानी चेन उतारकर मीरा को पहना दी।
“तूने आज मुझे सिर्फ बंद कमरे से बाहर नहीं निकाला मीरा, तूने मुझे वापस मेरी ज़िंदगी लौटा दी है। तू सच में इस घर की लक्ष्मी है,” गायत्री ने रुंधे हुए गले से कहा।
उस रात हवेली में कोई भी अपशकुन नहीं हुआ। बल्कि उस रात हवेली के एक कोने में पसरा हुआ बरसों का अंधेरा हमेशा के लिए मिट गया। मीरा ने सिर्फ एक नई दुल्हन के रूप में घर में प्रवेश नहीं किया था, बल्कि उसने एक नई सोच, एक नई रोशनी का गृह प्रवेश करवाया था। उसने समाज के उस घिनौने चेहरे से पर्दा उठा दिया था जो एक अकेली स्त्री को ज़िंदा लाश बना देता है।
समय के साथ हवेली की रौनक लौट आई। गायत्री अब फिर से घर की ज़िम्मेदारियां संभालने लगी थी। उसके चेहरे पर अब वो शून्यता नहीं थी, बल्कि एक आत्मविश्वास था। मीरा और गायत्री अब सिर्फ देवरानी-जेठानी नहीं, बल्कि एक-दूसरे की सबसे बड़ी ताकत बन चुकी थीं। समाज के जो लोग कल तक गायत्री को अभागन कहते थे, आज वो उन दोनों की मिसालें देते नहीं थकते थे।
क्या आपको भी लगता है कि हमारे समाज में आज भी विधवाओं को लेकर ऐसी कुप्रथाएं मौजूद हैं जिन्हें जड़ से उखाड़ फेंकने की ज़रूरत है? क्या मीरा का अपनी जेठानी के लिए स्टैंड लेना सही था? अपने विचार कमेंट में ज़रूर बताएं।
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